(10) हेमंत मालवीय के साथ क्या हुआ? सीमित प्रसार संख्या में उसने कार्टून बनाया। हमारे प्रधानमंत्री को गरिमा के मामले में उनके चाटुकारों द्वारा ऐसा क्यों बनाया जाता है जैसे छुई मुई। उस पौधे पर उंगली रखो। वह शरमा कर सिकुड़ जाता है। साहित्य, पत्रकारिता, कार्टून, अन्य किसी भी अभिव्यक्ति में अश्लीलता है। इसका फैसला संविधान से अपरिचित थानेदार कैसे कर सकता है? मगर करता है। कर रहा है। करता रहेगा। अजीब देश है। जहां जजों तक को अभिव्यक्ति की तयशुदा समझ नहीं है। वहां थानेदार का विवेक है। मुझसे पाप हुआ कि हेमन्त के कहने पर उसके लिए सुप्रीम कोर्ट में वकीलों से मैंने अनुरोध किया। वृन्दा ग्रोवर ने पहले भी हमारे साथ काम किया है। जिस जज ने कर्नाटक में स्कूली छात्राओं के सिर से हिजाब हटाए जाने का आदेश रद्द किया था, उससे मुझे बहुत उम्मीद थी। लेकिन……

(11) इलेक्ट्राॅनिक मीडिया से भी लेकिन अपने दम पर कुछ पत्रकारों ने जनअभिव्यक्ति का जरिया बनाया। मालिक से ठन गई। मालिक ने उन्हें निकाला। आज जन पत्रकारिता से जुडे़े रवीश कुमार, संदीप चौधरी, सिद्धार्थ वर्दराजन, पुण्य प्रसून बाजपेयी, अभिसार शर्मा, प्रणंजय ठाकुर गुहार्ता, आशुतोष, आरफा खानम शेरवानी, शीतल पी. सिंह, राणा अयूब, दीपक शर्मा, अम्बरीश कुमार, उर्मिलेश और भी अन्य कई लोग हैं। ऐसे लोग नहीं हों तो अंधेरा हमें ओढ़ ले। न्यूज़ क्लिक की घटना में उर्मिलेश सहित जिस तरह से पत्रकारों के साथ बदसलूकी की गई। उसे तो सुप्रीम कोर्ट ने ही देखा।
(12) जिस विचारधारा की सरकार दिल्ली और छत्तीसगढ़ में भी है। प्रेस की आज़ादी का सबसे पहला सवाल देश में जिसने उठाया। उसके ही वंशजों की सरकार दिल्ली और छत्तीसगढ़ दोनों जगह है। तब की केन्द्र सरकार ने ईस्ट पंजाब सेफ्टी बिल के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखबार ‘मदरलैंड‘ को हिदायत दी थी कि प्रकाशन के पहले ड्राफ्ट को सरकार के अधिकारी को दिखाए। ‘मदरलैंड‘ के प्रकाशक ब्रजभूषण और संपादक के0 आर0 मलकानी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। उसी समय प्रसिद्ध पत्रकार रमेश थापर ने अपनी पत्रिका क्राॅसरोड्स को मद्रास सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के खिलाफ याचिका लगाई। दोनों याचिकाओं को स्वीकार करते सुप्रीम कोर्ट ने प्रेस की आज़ादी को प्रतिबंधित करने वाले सरकारी आदेशों को खारिज कर दिया। मौजूदा छत्तीसगढ़ सरकार अपने पुरखों से सबक सीख ले तो उसके ही पुरखों की स्मृति का भला हो जाए।
यहां तो पत्रकार मेकाहारा सरकारी अस्पताल में घुसने के लिए एक नासमझ अफसर के आदेश के कारण कहते हैं जन सम्पर्क अधिकारी से मिलें। फिर पिछली सरकार के समय से ही कुछ मुस्टंडे गुंडे जो मंत्रियों के हमकदम रहे हैं। क्या उनसे पिटते हुए मरीज की चिंता करने अपनी ड्यूटी करें। पत्रकार पर प्रतिबंध अनुच्छेद 419 के तहत हो तो साथ साथ मरीज के जीने का अधिकार अनुच्छेद 21 में छीना जा रहा है। जितने मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ में हुए हैं। सबसे आप प्रेस सुरक्षा का कानून बनाने की मांग करते रहे हैं। मैं खुला आॅफर देता हूं कि प्रेस की सुरक्षा के कानून रचने का मामला मेरे सुपुर्द कर दिया जाए। तो एक सप्ताह के अंदर मैं प्रेस के भाईयों और संविधान को संतुष्ट करते हुए प्रेस सुरक्षा कानून ड्राफ्ट कर दूंगा।
(13) मैंने कहीं पढ़ा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि हमें अच्छे अच्छे सुशासन याने ‘गुड नवर्नेंस‘ को हुकूमतशाही में लागू करना चाहिए क्योंकि संविधान ने ऐसा ही कहा है। लोग नहीं जानते। संविधान सभा में अम्बेडकर की सहायता के लिए चार ऐसे सदस्य थे जो पूरी कांग्रेस पार्टी के मुकाबले कहीं कानूनी ज्ञान में ज्यादा आलिम फाज़िल थे। उन्होंने good governance लाने के नाम पर उसी तरह पैरवी की थी जैसी प्रधानमंत्री अभी कह गए। ये थे सर अलादि कृष्णा स्वामी अय्यर। सर एन गोपाल स्वामी आयंगर। सर वी टी कृष्णमाचारी और संवैधानिक सलाहकार सर बी0 एन0 राव। ये सबके सब सर थे। अर्थात् अंगरेजी अकीदत के पदाधिकारी। यही कोटरी थी जिसने संविधान में हुकूूमतशाही का वायरस ठूंस दिया। नागरिक आज़ादी को कुंठित करने के लिए कहा गया कि केन्द्र सरकार जो कानून बनाएगी। वही नागरिक आज़ादी को नियंत्रित करेगा। याद रहे अकेले बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था उनकी बात को नहीं माना गया। उन्होंने कहा था कि नागरिक आज़ादी पर प्रतिबंध केवल ड्यू प्रोसेस आॅफ लाॅ यानी कानूनी संवैधानिक प्रक्रिया ही करेगी। लेकिन संविधान सलाहकार बी. एन. राव के कहने पर अमेरिकन जज फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की सलाह पर लिखा गया प्रोसीजर इस्टेबलिष्ड बाई लाॅ। अम्बेडकर ने कहा था कि अगर बहुमत मेरे साथ नहीं है। तो इस संबंध में मेरी कोई राय नहीं है। इधर कुआं है और उधर खाई है। पांच छह मंत्री कुछ भी तय करेंगे कि कोई राय जनमत के खिलाफ और दूसरी ओर पांच छह जज काले कोट पहनकर कोई फैसला करेंगे। मैं दोनों को नागरिक आज़ादी का निर्णायक नहीं मानता। अम्बेडकर ने कोई राय नहीं दी थी। भारत में आज हमारी नागरिक आज़ादी सरकारी फरमान के रहमोकरम पर है। अन्यथा नागरिक आजा़दी जनता के अधिकारों के साथ खिलवाड़ नहीं कर पाती।
(14) आप लोकतंत्र तलाश करने आए हैं। कहां है लोकतंत्र? दुनिया के सबसे गरीब मुल्क का प्रधानमंत्री साढे़ आठ हजार करोड़ के हवाई जहाज में विश्व भ्रमण करने का एकाधिकार रखता है। उतना महंगा हवाई जहाज दुनिया के सबसे अमीर मुल्क के प्रेसिडेंट का ही है। जहां सौ से अधिक कमरों के राजभवन में राष्ट्रपति का निवास है। जो अमेरिका के राष्ट्रपति के सरकारी आवास व्हाइट हाउस से कहीं गुना बड़ा है। जिस देश में 85 करोड़ लोग पांच किलो महीने के राशन पर ज़िंदा हैं। जिस देश में दुनिया के सबसे ज़्यादा दिल के मरीज़ हैं। तपेदिक के बीमार हैं। एड्स के मरीज़ हैं। कुष्ठ रोग के मरीज हैं। वेश्याएं हैं। परित्यक्ताएं हैं। विधवाएं हैं। मानसिक रोग के मरीज़ हैं। सबसे ज़्यादा वकील हैं और सबसे ज़्यादा भ्रष्ट अधिकारी हैं। जो देश, दुनिया में अभिव्यक्ति की आजा़दी के नाम पर संसार के सबसे पिछड़े देशों में हैं। जिसमें एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का नया सरकारी आवास ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के सरकारी आवास 10 डाउनिंग स्ट्रीट से कहीं बड़ा है। शरद जोशी कहते थे। ओलंपिक नाम उस जगह का है जहां जाकर भारतीय टीम हारती है। लगता है सुप्रीम कोर्ट वह जगह है। जहां जाकर जनता लगातार हारती है। क्या यही लोकतंत्र है? आप जानते हैं देश में साॅर्वभौम सावरेन कौन है? राष्ट्रपति सार्वभौम नहीं है। प्रधानमंत्री नहीं है। राज्यपाल नहीं है। मुख्यमंत्री नहीं है। कोई संवैधानिक पदाधिकारी नहीं है। यहां तक कि संविधान भी सार्वभौम नहीं है। इस देश में सार्वभौम हैं ‘हम भारत के लोग याने जनता। यह बात आपके द्वारा एक एक नागरिक तक क्यों नहीं पहुंचाई जाती?
(15) प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के लिए सरकारी विज्ञापन देना अपनी इमेज को चमकाने का एक गैरकानूनी अधिकार है। इस देश की किसी भी सरकार को जब तक विधायिका अधिनियम नहीं बनाए। खर्च करने का अधिकार नहीं है। ये रुपया उस किसान और मजदूर का है जो खेतों, कारखानों में पसीना बहाते अपनी ज़िंदगी खपा रहा है। उस सैनिक का है जो देश की हिफाज़त के लिए अपने परिवार को यतीम बनाते खून का आखिरी कतरा तक बहा देता है। बिना संविधान की मंजूरी के और प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ये रुपया हड़प लेते हैं। अपनी राजनीति चमकाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। जो पूरी तौर पर गलत है। आप लोग चुप क्यों हैं? जब छत्तीसगढ़ के सबसे बडे़ समाचार पत्र का जब अवैध ढंग से विज्ञापन रोका गया। तब उसका मुकदमा मैंने ही हाई कोर्ट में लड़ा और जीता। यह अलग बात है कि उस समय मुझे फीस के तौर पर एक रुपया भी नहीं दिया गया जबकि वह सबसे बड़ा अखबार है।
(16) पत्रकारों की सुरक्षा और उन पर नज़र रखने के लिए प्रेस काउंसिल बनी है। वह एक सरकारी झुनझुना है। उसे सरकार को निर्देश देने के अधिकार तक नहीं हैं। इसके बरक्स वह प्रेस को धमकाती रहती है। इस बेमतलब की संस्था में सुप्रीम कोर्ट का रिटायर्ड जज ही अध्यक्ष होता है। ये सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज देश में संविधान की प्रतिष्ठा के लिए बहुत कुछ बनते रहते हैं। राज्यपाल बनते हैं। राज्यसभा सदस्य होते हैं। तमाम सरकारी पदों पर बैठते हैं। भले ही पत्रकारिता के बारे में कुछ नहीं जानते। उनको भी प्रेस काउंसिल में अध्यक्ष बनाया जा सकता है। देश का सबसे बेहतरीन पत्रकार इस पद पर क्यों नहीं बैठ सकता? आप सबको इस मामले में आवाज उठानी चाहिए। वह आवाज मुझको उठती हुई नहीं दिखाई देती।