प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई का निधन हो गया है। उनका जन्म गुजरात में हुआ था। वह लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर थे। उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। देसाई को लॉर्ड की उपाधि भी मिली थी। शिक्षा और राजनीति में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनके निधन से एक युग का अंत हो गया है।
नई दिल्ली: जाने-माने अर्थशास्त्री और हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य मेघनाद देसाई का मंगलवार को निधन हो गया। उनका जन्म गुजरात में हुआ था। उन्होंने न सिर्फ अकादमिक जगत में अपनी गहरी छाप छोड़ी बल्कि राजनीति में भी उनकी आवाज बुलंद रही। 84 साल की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। इससे अर्थशास्त्र और राजनीति दोनों क्षेत्रों में एक बड़ा नुकसान हुआ है।
मेघनाद देसाई लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में अर्थशास्त्र के एमेरिटस प्रोफेसर थे। उन्होंने 1965 से 2003 तक वहां पढ़ाया। उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय (अब मुंबई) से मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्हें 1960 में यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया में पढ़ने का मौका मिला। वहां उन्होंने तीन साल बाद पीएचडी पूरी की। उन्हें 30 अप्रैल, 1991 को लॉर्ड देसाई ऑफ सेंट क्लेमेंट डेन्स बनाया गया था। एलएसई के प्रोफेसर, लेबर राजनेता और नेशनल सेक्युलर सोसाइटी के मानद सहयोगी के रूप में देसाई का ब्रिटेन के शैक्षणिक और राजनीतिक क्षेत्रों में बहुत प्रभाव रहा।
मेघनाद देसाई जाने माने अर्थशास्त्री थे। उन्होंने शिक्षा और राजनीति में बहुत योगदान दिया। उनका निधन एक बड़ी क्षति है। 1992 में देसाई ने एलएसई में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ग्लोबल गवर्नेंस की स्थापना की। 1990 से 1995 तक वह एलएसई के डेवलपमेंट स्टडीज इंस्टीट्यूट के निदेशक और संस्थापक सदस्य थे। देसाई का शोध 50 सालों से अधिक समय तक चला। उन्होंने निजी क्षेत्र और राज्य के विकास और मार्क्सवादी अर्थशास्त्र पर प्रभाव से संबंधित विषयों पर काम किया। इसमें वैश्वीकरण और बाजार उदारीकरण शामिल हैं।
एक से बढ़कर एक किताबें लिखीं
देसाई ने अपने पूरे करियर में अर्थशास्त्र, इतिहास और संस्कृति पर कई प्रभावशाली किताबें लिखीं। इनमें ‘मार्क्स रिवेंज’ और ‘द रीडिस्कवरी ऑफ इंडिया’ प्रमुख हैं। उनके विचारों ने दुनिया भर के छात्रों और शोधकर्ताओं को प्रेरित किया। देसाई ने 1970 के दशक की शुरुआत में मार्क्सवादी आर्थिक सिद्धांत के बारे में लिखना शुरू किया था। फिर उन्होंने इकॉनोमेट्रिक्स, मुद्रावाद और आर्थिक विकास में भी दिलचस्पी दिखाई। उनकी किताबें जैसे ‘मार्क्सियन इकोनॉमिक थ्योरी’, ‘मार्क्स रिवेंज: द रिसर्जेंस ऑफ कैपिटलिज्म एंड द डेथ ऑफ स्टेटिस्ट सोशलिज्म, द रीडिस्कवरी ऑफ इंडिया, हू रोट द भगवदगीता और नेहरूज हीरो दिलीप कुमार सुर्खियों में रहीं। उन्होंने 200 से ज्यादा अकादमिक लेख भी लिखे।
उनकी किताब ‘मार्क्सियन इकोनॉमिक थ्योरी’ मार्क्सवादी अर्थशास्त्र को समझने में मदद करती है। ‘मार्क्स रिवेंज: द रिसर्जेंस ऑफ कैपिटलिज्म एंड द डेथ ऑफ स्टेटिस्ट सोशलिज्म’ में उन्होंने बताया कि कैसे पूंजीवाद फिर से उभरा। ‘द रीडिस्कवरी ऑफ इंडिया’ भारत की खोज पर आधारित है। ‘नेहरूज हीरो दिलीप कुमार’ दिलीप कुमार के बारे में है, जिन्हें नेहरू अपना हीरो मानते थे

