भोपाल ध्यप्रदेश सरकार और उसका सिस्टम भी गजब है, जहां एक तरफ नौनिहालों के भविष्य को गढ़ने वाले शाला भवन जर्जर हालत में पहुंच चुके है, वहीं दूसरी तरफ राजधानी में माननीय के महलनुमा भवनों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए साज सज्जा के नाम पर खर्च किए जा रहे हैं। ताजा उदाहरण प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का वह निवास है, जिसे ‘मामा का घर’ कहा जाता है। इस बंगले पर हमेशा कुछ ना कुछ काम निरंतर चलता ही रहता है, जिस पर उनके मुख्यमंत्री काल से लेकर अभी तक 5 करोड़ से अधिक खर्च किए जा चुके हैं। यह सिलसिला यहीं तक नहीं रुकता हाल ही में उनके बंगले के रिनोवेशन के नाम पर फिर डेढ़ करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं। जिसके टेंडर जारी हो चुके हैं।
देश में शिक्षा का बुनियादी ढांचा जर्जर स्थिति में पहुंच चुका है। इसकी चिंता सरकार और उसके सिस्टम में बैठे नुमाइंदों को नहीं है। जिसकी तस्वीर वर्तमान में शाला भवनों की जर्जर हालत में दिखाई पड़ रही है। सरकारी स्कूलों के अधिकांश शाला भवन जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं, जो हमेशा समाभार पत्रों की सुर्खियों में तो बने ही बकते हैं। बच्चों के पालक भी शिकायत के माध्यम से शासन-प्रशासन की समय-समय पर अवगत कराते रहते हैं। लेकिन इसके बाद भी इन शाला भवनों के सुधारों के नाम पर कुछ भी नहीं किया जा रहा है। शाला भवनों की दयनीय स्थिति होने के कारण बच्चों की सुरक्षा का खतद बना रहता है। खस्ताहाल भवनों में कहीं छत से पानी टपकता है तो कहीं प्लास्टर गिरने की खबरे आए दिन आती राखाती है। जिससे अभिभावकों में चिंता की स्थिति बनी रहती है। विगत दिनों राजस्थान के शाला भवन में हुए हादसे ने प्रदेश के अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। समस्या इतनी विकराल होती जा रही है कि पालक बच्चों को स्कूल भेजने से करने लगे हैं। ऐसी स्थिति में नौनिहालों का भविष्य खराब होने को स्थिति में है। जो चिंता का विषय है। प्रदेश में 92429 शासकीय विद्यालय चल संचालित हो रहे हैं। जिसमें आधे से ज्यादा शाला भवनों की स्थिति दयनीय है। हाल ही में ऐसा सरकारी आंकड़ों से भी मालूम होता है। बजट सत्र में एक सदस्य के उत्तर के स्वयं प्रदेश के शिक्षा मंत्री ने इस बात को स्वीकार किया है कि शाला भवनों की स्थिति ठीक नहीं है।
प्रदेश सरकार की महत्वकांक्षी योजना सीएम राईज स्कूल की घोषणा के समय बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन वह योजना भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई है। इस योजना के तहत प्रदेश भर में 9200 स्कूलों के भवनों का नवनिर्माण किया जाना था। पहले चरण में 274 साला भवनों का नव निर्माण करने का काम शुरू किया गया था। लेकिन वर्तमान स्थिति यह है कि उसमें से अधिकांश भवनों का निर्माण अभी भी अधूरा पड़ा हुआ है। बात अगर शिक्षा के बजट की हो तो वर्ष 2025-26 के लिए सरकार ने 36582 करोड़ की राशि का प्रावधान रखा था। लेकिन इसमें इस बात का कहीं स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था कि जर्जर या खंडहर स्थिति में तब्दील हो चुके भवनों के सुधार पर इतनी राशि खर्च की जाना है।
कब संवरेंगे शासकीय जर्जर स्कूल भवन
सरकार और उसके सिस्टम में बैठे नुमाइंदे और अफसर स्कूलों, शिक्षा के मंदिरों के उद्धार और उत्थान से ज्यादा अपनी सुख-सुविधाओं के लिए विचलित रहते हैं। ऐसा उनके सरकारी आवास की साज-सज्जा साज- पर किए जाने वाले खर्च से स्पष्ट होता है। स्थिति यह है कि जिन शासकीय बंगलों में यह माननीय रहते हैं। उन पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च किया जा रहा है। ऐसा कोई बिरला ही मंत्री होगा जिसके बगले पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से करोड़ों रुपए खर्च नहीं किए जा रहे हों। इसी तरह का एक ऐसा बंगला भी है जो 74 बंगले में स्थित है, जिसे मामा कर घर नाम से नई पहचान दी गई है। इस बंगले पर मरम्मत के काम का सिलसिला डेढ़ दशक से निरंतर चल रहा है। इसके बाद भी काम पूरा नहीं हो पा रहा है। हाल ही में इसकी साज-सजता के नाम पर लौक निर्माण विभाग ने डेढ़ करोड़ का टेंडर जारी किया है।
भोपाल में पीएमश्री एमएलबी स्कूल की क्लास में गिरा छत का प्लास्टर, दो छात्राएं घायल
भोपाल के एक पीएमबी स्कूल में चलती कक्षा के दौरान छत का प्लास्टर गिरने से दो छात्राएं घायल हो गई। स्कूल की कक्षाओं में वर्षा के बाद से ही सीलन की समस्या बनी हुई है। इस घटना के बाद स्कूल प्रबंधन ने जिला शिक्षा अधिकारी को शिकायत पत्र लिखा है और जर्जर कक्षाओं में कक्षा नहीं लगाने के आदेश दिए गए है।

