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*सर्वे: बिहार में दलितों को चुनाव आयोग पर कम भरोसा ,SIR को लेकर बहुत डर*

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नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइजेशन्स (NACDAOR) और द कन्वर्जेंट मीडिया (TCM) ने बिहार के दलित समुदाय के बीच अब तक का सबसे व्यापक सर्वेक्षण किया है। 18,581 सैंपल साइज के साथ यह सर्वे बिहार को छह क्षेत्रों में बांटकर किया गया – कोसी, मिथिलांचल, सीमांचल, भोजपुर, चंपारण, और मगध-पाटलिपुत्र। सर्वे प्रदेश की 49 विधानसभा सीटों पर किया गया, जिनमें 11 अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित सीटें शामिल हैं।  यह सर्वे दलित कार्यकर्ताओं द्वारा दलित समुदाय के बीच किया गया। विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की कसौटी पर सटीक इस सर्वे में बिहार की सभी 23 दलित जातियां शामिल हुईं। इनमें 9 प्रमुख जातियां (97.8% आबादी) शामिल हैं जिनमें दुसाध (31%), रविदास (30.72%), और मुसहर (17.08%) प्रमुख हैं। सर्वे में उम्मीदवार (44.66%) और पार्टी (32.51%) को मतदान का आधार बताया गया, जबकि जाति (10.09%) का प्रभाव सीमित है। हालांकि पसंद की उम्मीदवार का आधार जातिगत हो सकता है।   यह सर्वे बिहार की राजनीति में दलित समुदाय की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करता है। महागठबंधन की बढ़ती लोकप्रियता, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी का प्रभाव, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों का उभरना नीति निर्माताओं और राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। नैकडोर के चेयरमेन अशोक भारती और टीसीएम के डायरेक्टर प्रेम कुमार एवं रंजन कुमार ने 18 जुलाई को पटना में एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स करके इस सर्वे के परिणाम जारी किए और दावा किया कि यह पहल दलित कार्यकर्ताओं द्वारा दलित समुदाय की राय को सामने लाने की अनूठी कोशिश है। इसके लिए 98 कार्यकर्ताओं को पटना, बेगूसराय और दरभंगा में चार प्रशिक्षण शिविरों में प्रशिक्षित किया गया। प्रशिक्षण और सर्वेक्षण का काम 10 जून से 4 जुलाई तक 25 दिन चला।

प्रमुख निष्कर्ष:

सर्वे की विशिष्टता: यह सर्वे दलित कार्यकर्ताओं द्वारा दलित समुदाय के बीच किया गया। विश्वसनीयता और प्रामाणिकता की कसौटी पर सटीक इस सर्वे में बिहार की सभी 23 दलित जातियां शामिल हुईं। इनमें 9 प्रमुख जातियां (97.8% आबादी) शामिल हैं जिनमें दुसाध (31%), रविदास (30.72%), और मुसहर (17.08%) प्रमुख हैं। 

सर्वे में उम्मीदवार (44.66%) और पार्टी (32.51%) को मतदान का आधार बताया गया, जबकि जाति (10.09%) का प्रभाव सीमित है। हालांकि पसंद की उम्मीदवार का आधार जातिगत हो सकता है।  

राजनीतिक निहितार्थ : यह सर्वे बिहार की राजनीति में दलित समुदाय की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करता है। महागठबंधन की बढ़ती लोकप्रियता, तेजस्वी यादव और राहुल गांधी का प्रभाव, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों का उभरना नीति निर्माताओं और राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश है। 

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