अमेरिका की लाख कोशिशों के बावजूद भारत-रूस की दोस्ती में कोई कमी नहीं आई है. जहां एक तरफ भारत को रूस से सस्ता तेल मिल रहा है, वहीं अब रूस भारत को एक बड़ा ‘रिटर्न गिफ्ट’ देने की तैयारी में है. मनी कंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, दशकों के सबसे भीषण लेबर संकट से जूझ रहा रूस अब मध्य एशिया के देशों के बजाय भारत की ओर देख रहा है. मॉस्को की सड़कों पर बर्फ हटाने से लेकर बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स, रेस्टोरेंट्स और वेल्डिंग केंद्रों तक अब भारतीयों का दबदबा बढ़ने वाला है. दिसंबर में राष्ट्रपति पुतिन की भारत यात्रा के दौरान हुए समझौतों ने हजारों भारतीयों के लिए रूस में मोटी कमाई के रास्ते खोल दिए हैं.
सवाल-जवाब से समझिए रूस में भारतीयों के रोजगार क्रांति की पूरी कहानी
रूस में अचानक भारतीयों की मांग क्यों बढ़ गई है?
रूस इस समय लेबर संकट से जूझ रहा है. युद्ध और गिरती जन्मदर के कारण वहां काम करने वाले लोगों की भारी कमी है. रूस को दशक के अंत तक लगभग 1.1 करोड़ अतिरिक्त श्रमिकों की आवश्यकता है.
क्या भारत और रूस के बीच इसे लेकर कोई आधिकारिक समझौता हुआ है?
हां, दिसंबर 2025 में राष्ट्रपति पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अस्थायी लेबर माइग्रेशन की प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं
पिछले कुछ वर्षों में कितने भारतीयों को रूस का वर्क परमिट मिला है?
आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 2021 में जहां केवल 5,000 भारतीयों को परमिट मिला था, वहीं पिछले साल यह संख्या बढ़कर 56,000 से अधिक हो गई है.
भारतीय श्रमिक रूस में मुख्य रूप से किस तरह के काम कर रहे हैं?
भारतीय श्रमिक नगर निगम के कामों (जैसे बर्फ हटाना), निर्माण स्थलों , रेस्टोरेंट्स और वेल्डिंग जैसे तकनीकी कार्यों में लगाए जा रहे हैं.
रूस मध्य एशिया के देशों जैसे ताजिकिस्तान के बजाय भारत को प्राथमिकता क्यों दे रहा है?
मध्य एशिया के लोग बिना वीजा के आते हैं और अक्सर काम बदल लेते हैं. भारतीय श्रमिक अनुबंध (Contract) और वीजा से बंधे होते हैं, जिससे कंपनियों को काम की निरंतरता का भरोसा मिलता है.
क्या भारतीयों को रूस भेजने के लिए कोई विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है?
हां, चेन्नई में ‘रूसी वेल्डर्स एसोसिएशन’ के साथ मिलकर एक ट्रेनिंग सेंटर खोला गया है, जहाँ वेल्डरों को रूस भेजने से पहले प्रशिक्षित और परखा जाता है.
भाषा की समस्या से निपटने के लिए क्या इंतजाम हैं?
कई एजेंसियां होटल और सेवा क्षेत्र के लिए रूसी भाषा के ‘क्रैश कोर्स’ चला रही हैं. निर्माण क्षेत्र में ऐसे मैनेजर रखे जा रहे हैं जो रूसी और भारतीय भाषा (जैसे हिंदी) दोनों जानते हों.
रूस के किन इलाकों में भारतीयों की भर्ती की जा रही है?
शुरुआत में केवल मॉस्को क्षेत्र के लिए भर्ती हुई थी, लेकिन अब रूस के सुदूर पूर्व जैसे व्लादिवोस्तोक और सखालिन द्वीप के लिए भी भारतीयों को बुलाया जा रहा है.
युद्ध का रूसी लेबर मार्केट पर क्या असर पड़ा है?
युद्ध के कारण लाखों युवा सेना में चले गए हैं या सैन्य उद्योगों में लग गए हैं. साथ ही, लगभग 5 से 8 लाख रूसी नागरिक युद्ध के विरोध या लामबंदी से बचने के लिए देश छोड़ चुके हैं.
रूसी कंपनियां इस समय कितनी किल्लत महसूस कर रही हैं?
रूस की सबसे बड़ी माइनिंग कंपनी ‘नॉरिल्स्क निकल’ को 10,000 कर्मचारियों की कमी थी. वहीं जहाजों का निर्माण करने वाली कंपनी ‘Ak Bars’ केवल आधे क्षमता पर काम कर पा रही है क्योंकि उनके पास 2,000 लोगों की कमी है.
क्या भारतीयों को नौकरी देना रूसी कंपनियों के लिए सस्ता पड़ता है?
हां, विज्ञापनों के अनुसार, एक कुशल भारतीय इलेक्ट्रीशियन को रूसी श्रमिकों की तुलना में लगभग 25% कम वेतन पर रखा जा सकता है, जो नियोक्ताओं के लिए फायदेमंद है.
क्या रूस अन्य देशों से भी लोग बुला रहा है?
हां, भारत के अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार और उत्तर कोरिया से भी श्रमिकों को बुलाने की प्रक्रिया तेज की गई है.
उत्तर कोरिया से कितने श्रमिक आने की उम्मीद है?
अनुमान है कि 2025 के अंत तक केवल रूसी निर्माण स्थलों पर ही लगभग 50,000 उत्तर कोरियाई श्रमिक तैनात होंगे.
चीन के श्रमिकों की भूमिका वहां कैसी है?
चीनी नागरिक ज्यादातर अपनी खुद की कंपनियों, रेस्टोरेंट्स, लॉजिस्टिक्स और थोक व्यापार में सक्रिय हैं, वे स्थानीय रूसी कंपनियों में श्रमिक के तौर पर कम जाते हैं.
क्या यह लेबर संकट अस्थायी है?
नहीं, जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की जनसंख्या बूढ़ी हो रही है और युवाओं की संख्या कम हो रही है. यह संकट आने वाले कई दशकों तक बना रहेगा, जिसे भारत जैसे युवा आबादी वाले देश पूरा कर सकते हैं.

