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धरसेन सागरजी मुनिमहाराज द्वारा गिरनार तीर्थ की 1008 वंदना सम्पन्न

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गिरनार। । प्रशान्तमूर्ति आचार्य शांतिसागरजी महाराज (छाणी) परम्परा के चतुर्थ पट्टाचार्य गिरनार गौरव जैनाचार्य श्री निर्मलसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती सुयोग्य शिष्य महातपस्वी मुनिश्री धरसेन सागरजी महाराज ने अपने मुनि दीक्षा के साढ़े चार वर्ष के अल्प समय में तीर्थक्षेत्र गिरनार सिद्धक्षेत्र पर्वत की सेसावन सहित पाँचों टोंकों की आज 5 फरवरी 2021 को 1008 वन्दना एवं पूर्ण की। इन्होंने अपने दीक्षागुरु गिरनार गौरव आचार्यश्री 108 निर्मलसागरजी महाराज से गिरनार वंदना का जो संकल्प लिया था वह आज की वंदना के साथ 1008 यात्रायें पूर्ण हुई। जिनशासन में शायद ये प्रथम अवसर है जब 69 वर्ष के एक दिगम्बर मुनिराज ने इतने अल्प समय में प्रतिदिन करीब 21 हजार सीड़ियां चढ़-उतर कर 1008 वन्दना पूर्ण करके इतिहास रच दिया। ये चतुर्दिक् संघ एवं सम्पूर्ण दिगम्बर जैन समाज के लिए गौरव की बात है। निर्मलध्यान केन्द्र के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी सुमत भैया ने विद्वत् परिषद् के राष्ट्रीय महामंत्री डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ को बताया कि आज ज्यों ही मुनिश्री अपनी 1008 वीं वंदना करके पर्वत से नीचे आ रहे थे तब क्षेत्र पर विराजमार मुनि श्री नयनसागरजी, मुनि श्री विश्वविजयसागर जी महाराज की अगुवाई में नगरजन व संस्थाओं के पदाधिकारी जन एकत्रित होकर पहाड़ के नीचे से गाजे-बाजे, शोभा यात्रा के साथ प्रवास स्थल निर्मलध्यान केन्द्र समोशरण तक लाये। मुनि श्री धरसेनसागर जी की मुनिदीक्षा 9 जुलाई 2016 को गिरनार तीर्थक्षेत्र पर नेमिनाथ मोक्षकल्याणक लड्डू महोत्सव के पावन अवसर पर गिरनार गौरव आचार्य श्री 108 निर्मलसागरजी महाराज के कर कमलों द्वारा की गयी थी। दीक्षा लेने के बाद गुरु आज्ञा से आपने गिरनार क्षेत्र की यात्रा प्रारम्भ करने का संकल्प किया। तदनुसार 1 जनवरी 2017 से गिरनार यात्रा प्रारम्भ की। प्रातः ठीक 4: 30 बजे गिरनार पर्वत यात्रा प्रारम्भ करते हैं पाँचों टौंकों के दर्शन कर सहसावन स्थित चरणों के दर्शन कर करीब 9ः00 बजे तक समोसरण मंदिर तलटी में नीचे  पहुंच जाते हैं। करीब 4 या 5 घंटे में यात्रा पूर्ण कर लेते हैं। आचार्यश्री को नमोस्तु करते, शुद्धि का आहार लेते फिर आत्म ज्ञान- स्वाध्याय, सामायिक में लीन हो जाते हैं। सदैव हंसमुख प्रसन्न रहते हैं। प्रतिदिन करीब 21000 सीड़िया चढ़ने उतरने में कोई रूकावट नहीं। पहाड़ पर रहने वाले सभी साधु संत, डोलीवाले तथा निवासी लोग मुनिश्री को अच्छी तरह से जानते हैं। 

डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’

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