मुनीन्द्र पुरानिया मडावरा (ललितपुर) – महर्षि दयानन्द सरस्वती योग संस्थान आर्य समाज महरौनी के तत्वाधान में महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनन्य भक्त,अनेक क्रांतिकारियों के प्रेरण स्रोत,अमर बलिदानी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल की 125 वी जयंती वैदिक रीति के साथ मनाई गई ।आर्य समाज के मंत्री शिक्षक लखन लाल आर्य ने कहा कि पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल 11 जून 1897 को उत्तर प्रदेश के शाहजंहापुर में पिता मुरलीधर व माता मूलमती के घर जन्मे थे।वेदांशी आर्या ब्रह्मचारणी श्रीमद दयानन्द कन्या गुरुकुल अमरोहा ने कहा कि आर्य समाज से जुड़कर व अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश को पढ़कर देश को आजाद कराने का संकल्प अपने प्राणों की आहुति देकर के पूर्ण किया।काव्य आर्या ब्रह्मचारी गुरुकुल कुरुक्षेत्र ने कहा कि काकोरी कांड लूट कांड के हीरो पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल ने स्व लिखित पुस्तक सरफरोशी की तमन्ना में फांसी से पहले अपने साथियों को 16 दिसम्बर 1927 ई. को यह पंक्तियां लिखी– “यदि देश हित मरना पड़े मुझको सहस्रो बार भी,तो भी न मैं इस कष्ट को निज ध्यान में लॉऊ कभी। हे ईश ! भारत वर्ष में शतबार मेरा जन्म हो कारण सदा ही मृत्यु का देशोपकरक कर्म हो।
अदिति आर्या ने कहा कि सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल का जज्बा लिए उनके अंतिम शब्द थे कि मुझे फाँसी पर लटकने की तारीख 19 दिसम्बर 1927 तय हो गयी है मुझे मृत्यु का डर नही है मेरा यह पूर्ण विश्वास है कि शीघ्र ही नवीन शरीर धारण कर आऊंगा और भारत माता को अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्त कराने के लिए फिर संघर्ष करूंगा । ईश्वर से प्रार्थना है कि मेरा इसी देश मे हर बार जन्म हो ताकि वेद वाणी मनुष्य मात्र के कानों तक पहुंचाने में आर्य समाज के प्रचार प्रसार करने में समर्थ हो सकू देश वासियों से यही अंतिम विनय है जो कुछ भी करे सब मिलकर करें। सब देश की भलाई के लिए करे इसी से सबका भला होगा।
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल की 125 वीं जयंती मनाई गई

