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ऑक्सफैम रिपोर्ट:साल 2025 तक अरबपतियों की संपत्ति 1660 लाख करोड़ रुपये

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स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 56वीं वार्षिक बैठक में, ऑक्सफैम ने Resisting the Rule of the Rich: Protecting Freedom from Billionaire Power नामक एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है. रिपोर्ट के अनुसार, अरबपति आम लोगों की तुलना में 4000 गुना अधिक संभावना रखते हैं कि वे किसी राजनीतिक पद पर पहुँचें. आंकड़ों के मुताबिक, साल 2025 तक अरबपतियों की संपत्ति पिछले पाँच सालों की औसत वृद्धि की तुलना में तीन गुना तेजी से बढ़कर रिकॉर्ड 18.3 ट्रिलियन डॉलर (भारत के 1660 लाख करोड़ रुपये के बराबर) तक पहुँचने का अनुमान है.

ऑक्सफैम की हालिया रिपोर्ट बताती है कि 2025 में अरबपतियों की संपत्ति रिकॉर्ड स्तर (18.3 ट्रिलियन डॉलर) पर पहुंच गई, जो पिछले पांच सालों की तुलना में तीन गुना तेजी से बढ़ी है और इससे अमीर-गरीब की खाई गहरी हुई है; साथ ही, अरबपतियों के राजनीतिक पद संभालने की संभावना आम लोगों से 4,000 गुना ज़्यादा है, जिससे वे अपनी संपत्ति के हिसाब से नीतियां बनाने में कामयाब हो रहे हैं और लोकतंत्र कमजोर हो रहा है, हालांकि भारत की आरक्षण प्रणाली को सशक्तिकरण का एक मॉडल बताया गया है। 

मुख्य निष्कर्ष:

चिंताएं:

अत्यधिक धन और राजनीतिक शक्ति का केंद्रीकरण लोकतंत्र और सामाजिक स्थिरता के लिए खतरा है।

अरबपति अपने फायदे के लिए अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज को प्रभावित कर रहे हैं।

यह रिपोर्ट वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की दावोस बैठक के दौरान जारी की गई, जिससे वैश्विक असमानता और अरबपतियों के बढ़ते दबदबे पर बहस छिड़ गई है। 

अरबपतियों के सियासी वर्चस्व के बीच भारत बना मिसाल

वैश्विक स्तर पर राजनीति में बढ़ते अरबपतियों के प्रभाव पर चिंता जताते हुए अंतरराष्ट्रीय अधिकार समूह ऑक्सफैम ने भारत की आरक्षण प्रणाली को लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का एक प्रभावशाली और ठोस उदाहरण बताया है। यह टिप्पणी विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक के पहले दिन जारी की गई ऑक्सफैम की नई असमानता रिपोर्ट में की गई।ऑक्सफैम इंटरनेशनल की रिपोर्ट ‘रेसिस्टिंग द रूल ऑफ द रिच: प्रोटेक्टिंग फ्रीडम फॉर बिल्यनेर पावर’ में कहा गया है कि दुनिया भर में अरबपति आम नागरिकों की तुलना में 4,000 गुना अधिक राजनीतिक पदों पर काबिज होने की संभावना रखते हैं, जिससे लोकतंत्र पर असमान प्रभाव पड़ रहा है।

भारत की आरक्षण व्यवस्था की सराहना
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य वंचित वर्गों के लिए राजनीतिक आरक्षण व्यवस्था ने उन समुदायों को प्रतिनिधित्व का अवसर दिया है, जिन्हें लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिये पर रखा गया। ऑक्सफैम के अनुसार भारत में राजनीतिक आरक्षण ने आर्थिक रूप से कमजोर और सामाजिक रूप से बहिष्कृत वर्गों को विधायी प्रतिनिधित्व दिलाने और पुनर्वितरण नीतियों को आगे बढ़ाने का मंच दिया है। भारत में जनसंख्या के अनुपात में एस-एसटी के लिए आरक्षण के साथ-साथ हाल ही में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा भी की गई है। इसके अलावा शिक्षा और सरकारी नौकरियों में भी कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था मौजूद है।

लोकतंत्र में ‘बहुसंख्यक शक्ति’ की जरूरत
ऑक्सफैम ने कहा कि आम नागरिक तभी सशक्त होते हैं जब राजनीतिक, संस्थागत और सामाजिक परिस्थितियां उन्हें निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर देती हैं। इसके लिए संस्थागत समावेशन, जवाबदेह राजनीति, सामूहिक संगठन और सुशासन जरूरी हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नागरिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों और जमीनी आंदोलनों की भूमिका लोकतंत्र को मजबूत करने में अहम है।

ब्राजील का उदाहरण भी शामिल
भारत के अलावा ऑक्सफैम ने ब्राजील के ‘पार्टिसिपेटरी बजटिंग’ मॉडल का भी जिक्र किया। 1990 के दशक में शुरू हुई इस प्रणाली के तहत पोर्टो एलेग्रे शहर में नागरिकों को नगर बजट के एक हिस्से पर सीधे फैसला लेने का अधिकार दिया गया, जिसे सहभागी लोकतंत्र का अंतरराष्ट्रीय उदाहरण माना जाता है। रिपोर्ट में सरकारों से अपील की गई है कि वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन, संगठन बनाने के अधिकार और पारदर्शिता को सुनिश्चित करें। साथ ही, नागरिकों और संगठनों को सूचना और संसाधनों तक पहुंच देना भी जरूरी बताया गया है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

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