अग्नि आलोक

*मध्य प्रदेश में 24 परिवार ऐसे जहां केवल मातम और अंधेरा*

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छिंदवाड़ा: आज दिवाली है, राम के चौदह वर्ष के वनवास से लौटने का जश्न। पूरा देश रोशनी में डूबा है, मगर कुछ घर ऐसे हैं जहां सिर्फ अंधेरा है। उनका क्या, जिनके मासूम सपने दिवाली से ठीक पहले जिंदगी देने वाली दवा (कफ सिरप कोल्ड्रिफ) के जहर से उजड़ (24 बच्चों की मौत) गए? जिनकी मां की कोख सूनी हो गई और जिनके पिता की गोद में बच्चों ने तड़पकर दम तोड़ा? अपने इन मासूमों के लिए लगातार आंसू बहा रहे मां-बाप किससे लड़ें? उस भ्रष्ट मेडिकल सिस्टम से, जिसे ‘धरती का भगवान’ माना गया है? या उन असंवेदनशील सरकारों से जो बार-बार ऐसा होने देती हैं? नवभारत टाइम्स इस दिवाली पर उन परिवारों के साथ खड़ा है, जिनके घर के चिराग रोशन होने से पहले ही बुझ गए। रोशनी का यह त्योहार उनके लिए अनंत मातम का प्रतीक ‘ब्लैक दिवाली’ बन गया है। दीपावली से एक दिन पहले हमने इन घरों में जाकर उनके परिजनों का हालचाल जाना, उनके आंसू पोंछने की कोशिश की है।

सत्या पवार (8 साल) :  मां ने मंगलसूत्र बेचकर इलाज कराया, पर नहीं बचा बेटा

चौरई के आमाझिरी गांव की मां ने अपने 8 साल के इकलौते बेटे सत्या पवार को खो दिया। सत्या की मां ने कहा, ‘पूरा देश जब दिवाली मनाएगा। लोगों के घरों में दीप जलेंगे, हमारे घर में आंसुओं की बारिश होगी।’ एक मज़दूर परिवार ने इलाज के लिए मंगलसूत्र, नथ, करधनी तक बेच दी। सत्या अपनी मां से कहता था, ‘जब मैं बड़ा हो जाऊंगा न तो आप दोनों को काम नहीं करने दूंगा।’ उसकी एक बड़ी बहन डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है, जो बार-बार पूछती है, ‘मम्मी भैया कहां गया।’

दुखों का पहाड़ गरीब-बेबस परिवार पर ही क्यों टूटा?

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर चौरई तहसील में बसा छोटा-सा गांव आमाझिरी है। कच्ची दीवारों वाले घर के बाहर कोई नहीं था। आवाज लगाने पर सत्या की दादी बाहर आईं। उन्होंने बरामदे के पास (बैठक) बैठाया। अंदर जाने वाले दरवाजे के बगल में सत्या की माला चढ़ी तस्वीर टंगी है। नीचे रखी है एक पुरानी खाट। प्लास्टिक की दो कुर्सियां। घर की छत के निचले भाग को प्लास्टिक (पन्नी) से कवर किया गया है। ये सब देखने पर मन सोचने लगता है… हे ईश्वर। दुखों का ये पहाड़ इस गरीब-बेबस परिवार पर ही क्यों टूटा? मैं दादी से बात करने लगता हूं। उनके दिल में गुस्से का गुबार है। पोते को छीन लिया। वह साफ शब्दों में कहते गईं- गलत दवाई-गोली देने वालों की ऐसी गत होनी चाहिए कि पुश्तें याद रखें। त्योहार आ रहा है। कहता था पापा-चाचू मेरे लिए ये पटाखा लाना, वो पटाखे लाना। किसके लिए लाएंगे हम अब पटाखे। हमारी छाती फटी जा रही है। बारह महीने का त्योहार आ रहा है।

गांव में अंतहीन मातम, बिलखता परिवार… सबकुछ लुटाया, चंदा भी मांगा, फिर भी नहीं बची शिवम की जान

शिवम राठौर को बचाने के लिए पिता सुनील ने सब कुछ लुटा दिया, बेबसी ऐसी कि चंदा भी मांगा, लेकिन जहरीले कफ सिरप ने जान ले ली। अब आर्थिक रूप से उनकी कमर तो टूटी ही है, साथ ही बेटे के जाने से दुनिया भी उजड़ गई है।

 बम फूट रहा है पापा, बम फूट रहा है पापा, पिछली दिवाली पर यही तो कहता था शिवम… चार साल के शिवम राठौर को याद करते हुए पिता सुनील राठौर रो पड़ते हैं। जितनी बार आंसू पोछते हैं उतनी बार और तेज रोना आता है। जैसे आंखों से आंसू का एक-एक कतरा आज बह जाना चाहता है। शिवम उन 24 बच्चों में से एक है, जिनकी मौत कफ सिरप पीने की वजह से हुई है। जब पूरा देश इस समय दिवाली की खुशियां मना रहा है, तब इस बाघबर्दिया गांव में मातम पसरा हुआ है। आसपास के कई गांवों में सन्नाटा है। दिवाली की कोई रौनक नहीं, जैसे इन गांवों के लोगों ने अपना खुद का बच्चा खो दिया है।

‘नवभारत टाइम्स’ की टीम को शिवम का घर ढूंढने में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। उसका घर गांव के उन घरों में शामिल है, जहां आकर रास्ता भी खत्म हो जाता है। कच्चा आंगन। खपरैल वाला पुराना घर। गाय-बकरियां-मुर्गी के चूजे और इन सबके बीच बिलखता परिवार… छिंदवाड़ा से परासिया जाने वाली सड़क पर कुछ किलोमीटर चलने के बाद एक रास्ता कटता है, जो बाघबर्दिया गांव की तरफ जाता है। बीच में थोड़ा बहुत रास्ता पक्का भी है। शायद प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत बना है। यहां ज्यादातर गांव बेहद छोटी आबादी के हैं। 40-50 परिवार और एक आंगनबाड़ी। कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामले को लेकर बाघबर्दिया के लोगों में बहुत गुस्सा है।

चार साल का शिवम राठौर… मेरे पहुंचने पर गांव के कुछ लोग इकट्ठा हो गए। सब अचरज में हैं। क्या वाकई दिल्ली से कोई आया है। रो-रोकर परिवार के लोगों की आवाज बैठ गई है। शिवम के अंतिम शब्दों को याद करते हुए सुनील बताते हैं- दादा, दादी का लाड़ला था मेरा बेटा। जब उसे नागपुर लेकर जा रहे थे तो कह रहा था सेब खाऊंगा पापा। सैनिकों से बहुत प्रभावित था। कहता- खूब पढ़ूंगा पापा, मिलिट्री में जाऊंगा। सेना में जाऊंगा पापा… मैं शिवम की मम्मी से बात करने की कोशिश करता हूं। वो दहाड़ मारकर रोने लगती हैं। मां के कलेजे से निकली चीखें सुनकर मेरी हिम्मत जवाब दे जाती है। बड़ी मुश्किल से दादा बात करने के लिए तैयार होते हैं।

दिव्यांश (7 साल) की बची हुई गुजिया: बहन पूछती है- भाई गुजिया खाने कब आएगा? 

परासिया के दिव्यांश यदुवंशी (7 साल) की मौत के बाद उसकी बहन इशिका ने उसके लिए गुजिया बचाकर रखी है, जिसे वह अस्पताल जाने से पहले मांगकर गया था। इशिका कहती है कि वह गुजिया खाने अब कभी नहीं आएगा। दिव्यांश की मां लीमा यदुवंशी को सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि अधिकारी मदद मांगने पर उन्हें यह कहकर टाल देते थे कि ‘लिस्ट में आपका नाम नहीं है।’ बेटे के इलाज के लिए सारा पैसा और उधार भी खत्म हो गया था और अंततः बच्चे को डिस्चार्ज कराने के बाद उसने गोदी में ही दम तोड़ दिया।

दिव्यांश की मासूम बहन, जिससे वो कहकर गया था कि गुजिया बचाकर रखना।

 मैंने उसके खिलौने, उसकी कॉपी किताबें, उसकी सारी यादें उसके साथ ही दफन कर दीं… किसी मां के मुंह से अपने बेटे के लिए ये शब्द दिल-दिमा को कचोटने लगते हैं। सिर भन्ना उठता है, आखिर क्यों? एक मां अपने बच्चे की यादें क्यों मिटाना चाहती है? लेकिन उस मां के दर्द की सीमा को महसूस करना नामुमकिन है, जिसने कुछ दिनों पहले ही अपना 3 साल का इकलौता बेटा खो दिया। दिवाली पर इन परिवारों का दर्द जानने नवभारत टाइम्स की टीम इनके घर पहुंची। दुनिया को जगमग करने वाले त्योहार पर इन घरों में अंधेरा छाया हुआ है।

दिव्यांश उइके (3 साल)… कफ सिरप से जान गंवाने वालों में इकलहरा का दिव्यांश भी शामिल था। दर्द की सीमा जब सहनशीलता से बाहर हो जाती है तो चेहरा पथरा जाता है। दिव्यांश की मां दीपिका का चेहरा इस वक्त ऐसा ही है… भावशून्य। दीपिका अपने बेटे के जन्मदिन को याद करते हुए कहती हैं। जब उसने दुनिया छोड़ी (4 सितंबर) तो ठीक 19 दिन बाद उसका बर्थडे था। एक महीने पहले से बर्थडे की रट लगाने लगा था। मम्मी इस बार बर्थडे गिफ्ट में साइकिल लूंगा। उसमें बैठकर ही स्कूल जाऊंगा। बार-बार याद दिलाता रहता था। अब किसे साइकिल दिलाऊं? खिलौनों से लेकर कॉपी-किताब तक मैंने तो उसकी सारी यादें उसके साथ ही दफन कर दीं। दादू से बहुत लाड़ करता था। वो भी कहीं जाते तो दिव्यांश को ले जाना साथ ले जाना कभी नहीं भूलते थे। अब रोज उसकी फोटो देखकर बस रोते रहते हैं। खुद को संभाल ही नहीं पा रहे हैं।

योजिता (2 साल) के पिता का बलिदान: PF का पूरा पैसा तक लुटा दिया, लेकिन… (पूरी खबर यहां पढ़ें)

परासिया के सुशांत ने अपनी इकलौती बेटी योजिता (2 साल) को खो दिया। योजिता की यादें उनके घर के सर्वेंट क्वार्टर में आज भी जिंदा हैं – दीवार पर उसकी प्यारी तस्वीर और पलंग पर रखी उसकी छोटी साइकिल, जिस पर बैठकर वह पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाती थी। योजिता रोज सुबह अपने पिता को गले लगाकर ‘गुड मॉर्निंग’ कहती थी और उनकी गाड़ी की आवाज़ सुनते ही ‘पापा आ गए’ चिल्लाती थी। सुशांत ने अपनी बेटी को बचाने के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया: ‘जितना भी पीएफ या जो भी पैसा था, सब निकालकर लगा दिया।’ यहाँ तक कि इस परिवार ने न्याय और अन्य बच्चों की जान बचाने के लिए, अंतिम संस्कार के बाद भी अपनी बेटी का शव निकलवाकर पोस्टमार्टम करवाया।

छिंदवाड़ा, परासिया (चांदामेटा): स्कूल का सर्वेंट क्वार्टर, अंदर घुसते ही सामने वाली दीवार पर एक बड़ी-सी तस्वीर नजर आती है। तस्वीर में दो साल की प्यारी सी बिटिया गुब्बारे से खेल रही है। पलंग पर छोटे बच्चों की साइकिल रखी है। किसी और घर में आपको शायद पलंग पर साइकिल रखी न मिले। कोई रख देता तो उसके डांट खाने की आशंका भी होती, लेकिन यहां साइकिल का पलंग पर होना हैरान नहीं करता, क्योंकि अब वो सिर्फ साइकिल नहीं, बल्कि दुनिया को अलविदा कह चुकी 2 साल की योजिता को अपने आसपास महसूस करने का जरिया भी है। इसी साइकिल पर बैठकर योजिता पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाती थी। अब साइकिल तो है, लेकिन धमाचौकड़ी मचाने वाला जा चुका है। जहरीले कफ सिरप को अमृत (दवा) समझकर पीने वाले बच्चों में योजिता भी शामिल थी।

मैं (नवभारत टाइम्स का रिपोर्टर) इंतजार करता हूं। योजिता के पापा (सुशांत) 5-10 मिनट में आने वाले हैं। मैं बच्ची के दादा से बात करने लगता हूं। वो डॉक्टरों की लापरवाही के बारे में बताते हैं। बच्ची नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में बहुत परेशान हुई। कोई देखने वाला नहीं, कोई पूछने वाला नहीं। डॉक्टर के पास जाओ तो ऐसे दुत्कारते थे, जैसे हमने यहां आकर कोई गुनाह किया है। इस बीच सुशांत आ जाते हैं। दर्द बांटने का सिलसिला शुरू होता है। कई ऐसे मौके आते हैं, जब सुशांत आंसू बहाने लगते हैं, लेकिन खुद को संभालते हुए वह बताना जारी रखते हैं। सुशांत आश्चर्य जताते हैं कि पहले तो मीडिया वाले खूब आते थे, लेकिन अब ये मुद्दा गायब होता जा रहा है। गुनाहगारों को सजा कब मिलेगी?

हेतांश (4 साल) की अधूरी इच्छा: जन्मदिन से 11 दिन पहले मौत, बर्थडे गिफ्ट में साइकिल चाहता था

उमरेठ के हेतांश सोनी (4 साल) की मौत उसके जन्मदिन से 11 दिन पहले हुई। वह बर्थडे गिफ्ट में एक साइकिल चाहता था। उसकी मौत के दिन, 9 साल के उसके बड़े भाई ने उसकी तस्वीर के सामने एक प्लास्टिक की साइकिल लाकर उसकी अंतिम इच्छा पूरी की। हेतांश अकेले रहने से डरता था और ICU में नर्स से कहता था, ‘मम्मी-पापा घर लेकर चलो।’ उसकी मां का दर्द इस बात में था कि सिरप पिलाने से पहले वह ठीक था, और ‘सिरप ने हमारे बच्चे की जान ले ली।’

चार साल का मासूम भाई दुनिया छोड़ गया। उसकी अंतिम इच्छा पूरी नहीं हो सकी। लेकिन 9 साल के बड़े भाई ने एक तरह से उसकी लास्ट विश पूरी कर दी। कफ सिरप से छिंदवाड़ा के उमरेठ के हेतांश सोनी की भी जान चली गई। अपने जन्मदिन के ठीक 11 दिन पहले (1 अक्टूबर) हेतांश ने दुनिया को अलविदा कह दिया। वो चाहता था, बर्थडे गिफ्ट में उसे साइकिल मिले। मौत के ग्यारहवें दिन जब हेतांश का जन्मदिन आया तो बड़े भाई ने प्लास्टिक की एक छोटी से साइकिल खरीदी और उसकी तस्वीर के ठीक सामने रख दी। जैसे कहना चाह रहा हो… भाई अब ये साइकिल हमेशा तेरे साथ रहेगी।

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के उमरेठ गांव में हेतांश का परिवार रहता है। जब हम हेतांश के घर पहुंचे तो करीब 7-8 महिलाएं घर पर बैठी थीं। बरामदे में टेंट हाउस की कुछ कुर्सियां रखी हुई थीं। हेतांश के माता-पिता दोनों हमें घर पर ही मिल गए। बीमारी की शुरुआत से लेकर इलाज के अंत तक बातचीत शुरू हुई। ट्रीटमेंट की बात शुरू हुई तो हेतांश के पिता अमित कुमार सोनी बताने लगे- मेरा बेटा अकेले रहने में बहुत डरता था। हमेशा कोई न कोई उसे अपने साथ चाहिए। 3 साल 11 महीने का तो था ही।

सलमान की होनहार बेटी आतिया (7 साल): पुलिस बनना चाहती थी 

सलमान की सात साल की बेटी आतिया, जो दूसरी कक्षा की टॉपर थी, हमेशा कहती थी- पापा बड़ी होकर पुलिस बनूंगी। पुलिस से सब डरते हैं न, मुझसे भी डरेंगे। उसकी लिखावट इतनी सुंदर थी कि देखने वाले हैरान रह जाते थे। वह कश्मीर जाकर बर्फ देखने का सपना देखती थी, जिसे उसके पिता हर बार पूरा करने का वादा करते थे। आतिया अपने छोटे भाई हुसैन का मां की तरह ख्याल रखती थी। लेकिन एक दिन, उल्टी और चक्कर आने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई। कई अस्पतालों में इलाज के बाद नागपुर में डॉक्टर ने सलमान को धीमे स्वर में बताया- आपकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं रही। आतिया की मां कमरे के पीछे चुपचाप खड़ी, अपनी बेटी की यादों को समेटने की कोशिश कर रही थीं।

इन्हीं गुड्डे-गुड़ियों से खेला करती थी आतिया।

सलमान खान कहां रहते हैं, जिनकी बिटिया की कफ सिरप पीने से मौत हो गई? छिंदवाड़ा की भदे कॉलोनी में तकरीबन 20 साल के लड़के से मैंने सवाल किया। उम्मीद नहीं थी, सवाल का जवाब भी सवाल ही होगा। ऊपर से नीचे तक घूरने के बाद लड़के ने पूछा- क्या काम है, स्वास्थ्य विभाग से हो? सवालों को इग्नोर कर मैंने फिर पूछा- घर कहां है उनका? सिरप कंपनी से आए हो क्या? वो अब भी मेरे बारे में जानना चाहता था। जवाब मिले बिना ही मैं आगे बढ़ने लगा। मेरे थोड़ी आगे निकलने पर उसने जोर से कहा- सीधे चले जाओ, इसी लाइन में आगे है।

एक-दूसरे के घरों में झांकती छतें और हर तीसरे मकान पर लहराते भगवा झंडे नजर आ रहे थे। इलाके को देखते हुए मैं आगे बढ़ने लगा। तंग गलियों से गुजरकर मैं एक दो मंजिला मकान के सामने पहुंचा। आतिया (7 साल) के अब्बा सलमान ने छत से इशारा किया- ऊपर आ जाइए। दूसरी मंजिल पर किराए के छोटे-छोटे दो कमरों में ठसाठस भरा सामान। घर के बाहरी कमरे में मुझे बैठाकर सलमान खामोश सामने बैठ जाते हैं।

मयंक सूर्यवंशी (3 साल): घर का ‘चिराग’ बुझा, आई मनहूसियत 

मोरडोंगरी के 3 साल के मयंक सूर्यवंशी की 15 दिन अस्पताल में रहने के बाद मौत हो गई। मयंक के पिता की आंखों के आंसू थम नहीं रहे। वह कहते हैं कि उनका घर का ‘चिराग’ हमेशा के लिए बुझ गया है और यह त्योहार उनके लिए मनहूसियत लेकर आया है।

मेरा बेटा दर्द में मछली की तरह तड़प रहा था। मुझे समझ नहीं आया कि ये कैसा इलाज हो रहा है, जिसमें तबीयत और ज्यादा खराब हो रही है। मैं घबरा गया था। आनन-फानन में अपने बेटे को लेकर नागपुर भागा। वहां, 5 अस्पतालों के चक्कर काटे। डॉक्टरों ने देखते ही मुंह फाड़ना शुरू कर दिया। कोई 20 लाख रुपये मांगता था तो कोई 25 लाख रुपये। हमने सरकारी मेडिकल कॉलेज में बच्चे को भर्ती कराया, जहां उसने दम तोड़ दिया। हमारा चिराग हमेशा के लिए बुझ गया। ये शब्द उस पिता के हैं, जिसने अपना मासूम बच्चा खो दिया। ‘नवभारत टाइम्स’ उन बच्चों के परिवार के पास पहुंचा, जिनका चिराग ‘कफ सिरप कांड’ में हमेशा के लिए बुझ गया।

मयंक के घर पहुंचने पर पास ही रखी नीले रंग की साइकिल नजर आई। उसके दिव्यांग पिता नीलेश सूर्यवंशी कुर्सी पर बैठे थे। बेटे को याद कर इमोशनल हो गए। कहने लगे- मैं तो एक पैर से विकलांग हूं। मैंने कैसे-कैसे पैसे जुटाए, मैं ही जानता हूं। जिनसे जान पहचान थी, ऐसे सभी लोगों के मैंने पैसे मांगे। मेरा बेटा बार-बार मुझसे पानी मांग रहा था, लेकिन डॉक्टर के मना करने के कारण मैंने उसे पानी नहीं दिया। वह उल्टी कर रहा था, टॉयलेट नहीं कर रहा था।

दिव्यांश उइके (3 साल) की दफन यादें: इलाज के लिए लिया लोन, कर्ज भी लदा, फर्ज भी न पूरा हुआ 

इकलहरा की दीपिका उइके ने अपने तीन साल के बेटे दिव्यांश उइके को खो दिया, जिसकी मौत उसके जन्मदिन से 19 दिन पहले हुई। वह बर्थडे पर साइकिल लेना चाहता था। दीपिका ने दर्द में कहा, ‘मैंने उसके खिलौने, उसकी कॉपी किताबें, उसकी सारी यादें उसके साथ ही दफन कर दीं।’ उसका परिवार घर के लिए लिए गए लोन के पैसे से इलाज कराया, जिससे उनका बच्चा भी चला गया और कर्जा भी हो गया।

ऋषभ यादव (ढाई साल) की बहन का रोना: बहन नींद में चीखती है, पुकारती है नाम (पूरी खबर यहां पढ़ें)

गजनडोह के ढाई साल के ऋषभ यादव की मां राजकुमारी यादव कहती हैं कि उनका इकलौता बेटा चला गया। ऋषभ की 5 साल की बड़ी बहन रात को नींद में चीखती है, ‘भाई हम ये खेलेंगे- भाई हम वो खेलेंगे।’ इलाज के लिए रात भर डॉक्टर प्रवीण सोनी का दरवाजा पीटने के बाद भी किसी ने नहीं खोला, और जब खुला तो डॉक्टर ने कहा कि यह तो खत्म हो गया।

ऋषभ की याद आने पर उसकी 5 साल की बहन रात में चीखने लगती है।

मैंने उसके खिलौने, उसकी कॉपी किताबें, उसकी सारी यादें उसके साथ ही दफन कर दीं… किसी मां के मुंह से अपने बेटे के लिए ये शब्द दिल-दिमा को कचोटने लगते हैं। सिर भन्ना उठता है, आखिर क्यों? एक मां अपने बच्चे की यादें क्यों मिटाना चाहती है? लेकिन उस मां के दर्द की सीमा को महसूस करना नामुमकिन है, जिसने कुछ दिनों पहले ही अपना 3 साल का इकलौता बेटा खो दिया। दिवाली पर इन परिवारों का दर्द जानने नवभारत टाइम्स की टीम इनके घर पहुंची। दुनिया को जगमग करने वाले त्योहार पर इन घरों में अंधेरा छाया हुआ है।

दिव्यांश उइके (3 साल)… कफ सिरप से जान गंवाने वालों में इकलहरा का दिव्यांश भी शामिल था। दर्द की सीमा जब सहनशीलता से बाहर हो जाती है तो चेहरा पथरा जाता है। दिव्यांश की मां दीपिका का चेहरा इस वक्त ऐसा ही है… भावशून्य। दीपिका अपने बेटे के जन्मदिन को याद करते हुए कहती हैं। जब उसने दुनिया छोड़ी (4 सितंबर) तो ठीक 19 दिन बाद उसका बर्थडे था। एक महीने पहले से बर्थडे की रट लगाने लगा था। मम्मी इस बार बर्थडे गिफ्ट में साइकिल लूंगा। उसमें बैठकर ही स्कूल जाऊंगा। बार-बार याद दिलाता रहता था। अब किसे साइकिल दिलाऊं? खिलौनों से लेकर कॉपी-किताब तक मैंने तो उसकी सारी यादें उसके साथ ही दफन कर दीं। दादू से बहुत लाड़ करता था। वो भी कहीं जाते तो दिव्यांश को ले जाना साथ ले जाना कभी नहीं भूलते थे। अब रोज उसकी फोटो देखकर बस रोते रहते हैं। खुद को संभाल ही नहीं पा रहे हैं।

बेटे और आजीविका का बलिदान: उसैद खान, 3 साल 11 महीने 

उसैद खान के पिता यासीन ने अपने बेटे को बचाने के लिए अपना ऑटो बेच दिया, जो उनके परिवार की एकमात्र आजीविका थी। नागपुर में इलाज पर लाखों रुपये खर्च हुए पर डॉक्टर ने कहा कि किडनी फेल हो रही है। पिता का दिल चीर देने वाला दर्द है- न बेटा बचा, न काम बचा, न उम्मीद।

तीन साल ग्यारह महीने का मासूम, जो पूरे घर की आंखों तारा था, अब इस दुनिया में नहीं है। उसके इलाज के लिए पिता ने अपना ऑटो तो मां ने अपने गहने तक बेच दिए। इसके बाद भी पैसे कम पड़े तो दोस्तों-रिश्तेदारों से मदद ली, लेकिन हर जतन करने के बाद भी बच्चे की जान नहीं बच सकी। उसैद को याद करते हुए उसके पिता इमोशनल हो जाते हैं। कहते हैं- पढ़ता नर्सरी में था, लेकिन उसके इरादे बहुत बड़े थे। पुलिसवाला बनना चाहता था।

बेटे की आखिरी बात को याद करते हुए यासीन कहते हैं, अस्पताल में उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। बार-बार यही कहता था। मुझे घर ले चलो। मुझे यहां नहीं रहना है। लेकिन हमें क्या पता था कि अब हमारा हुसैद कभी घर नहीं जा पाएगा। जब हुसैद की बीमारी शुरू हुई थी, उस दिन को याद करते हुए यासीन कहते हैं- 25 अगस्त। उसे बुखार आया। 21 अगस्त को अमन सिद्धीकी डॉक्टर के पास ले गए। एक हफ्ते इलाज चला। लेकिन रोग कम होने की जगह बढ़ने लगा। शरीर में सूजन आने लगी। यूरिन बंद हो गई।

अदनान खान: ‘बच्चों के टीचर’ की मौत का गम 

अदनान खान के दादाजी रोते हुए बताते हैं कि उनका पोता केवल पढ़ता नहीं था, बल्कि टीचर के कहने पर दूसरे बच्चों को भी पढ़ाता था। चार डायलिसिस के बावजूद अदनान शांत हो गया। जिस दिन उसे ईद मिलादुन्नबी के जुलूस में जाना था, उस दिन वह अस्पताल में मौत से लड़ रहा था।

 होनहार बच्चा। होशियार बच्चा। अपनी क्लास के बच्चों को पढ़ाने वाला बच्चा… कफ सिरप ने जान गंवाने वाले बच्चों में छिंदवाड़ा के परासिया में रहने वाले खान परिवार का बच्चा भी है। अदनान खान, जो कुछ दिनों तक अच्छा भला दोस्तों के साथ मस्ती कर रहा था, आज दुनिया से रुखसत हो चुका है। नवभारत टाइम्स की टीम अदनान के घर पहुंची। हमारे पहुंचते ही अदनान के पिता कहीं जाने की जल्दी में थे। पता चला, छिंदवाड़ा में कफ सिरप को लेकर कोई जांच होनी है, उसी सिलसिले में बुलावा आया है। हम अदनान की मां से बात करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अपना दुख-दर्द खुद तक समेटे रहना मुनासिब समझा।

अदनान के दादा बातचीत के लिए तैयार हुए। उन्होंने कहा कि अदनान को बुखार आया। हम उसे डॉ. के पास लेकर गए। ट्रीटमेंट के बाद आराम नहीं मिला। बच्चे ने यूरिन करना बंद कर दिया। परासिया के डॉ. नाहर ने छिंदवाडा रेफर कर दिया। वहां सूजन और ज्यादा बढ़ गई। वहां से नागपुर के एसएसएच अस्पताल रेफर किया गया। वहां, एक दिन के अंतराल में 4 डायलिसिस हुई। चौथी डायलिसिस के बाद वह होश खो बैठा। हमने 6 सितंबर तक वहां रखा।

संध्या बोसम (डेढ़ साल): खेत गिरवी, बेटी की फोटो भी नहीं 

मजदूर पिता रशीद बोसम की डेढ़ साल की बेटी संध्या की कफ सिरप से मौत हुई। बेटी को बचाने के लिए रशीद ने अपना खेत गिरवी रख दिया और दोस्तों से उधार लिया, पर सब व्यर्थ रहा। आज वह गुमसुम हैं, काम पर नहीं जा पा रहे, और सबसे बड़ा दर्द यह है कि उनके पास अपनी सबसे छोटी और प्यारी बेटी का एक फोटो तक नहीं है।

आधी रात को लाइन में लगकर, लड़ झगड़कर लेटेस्ट आईफोन खरीदने वाली युवा पीढ़ी इस परिवार की दर्द सुनेगी तो शायद शर्म से नजरें झुका लेगी। एक घर में डेढ़ साल की मासूम बच्ची की मौत हो गई और उस बच्ची के पिता के पास उसकी फोटो तक नहीं है। कारण इस बीहड़ गांव में रहने वाले इस परिवार के पास कैमरे वाला फोन भी नहीं है। पिता को याद ही नहीं है। शायद किसी दोस्त-यार ने कभी क्लिक किया होगा। शायद न भी किया हो।

छिंदवाड़ा की उमरेठ तहसील में चाकाढाना नामक एक गांव है। इस गांव में रशीद बोसम का घर है। घर कह लीजिए या झोपड़ी। घर के बाहर जमीन पर साड़ियां बिछी हुई हैं और उनमें मक्के के दाने सूख रहे हैं। इस घर की डेढ़ साल की बच्ची संध्या बोसम की मौत कफ सिरप पीने से हुई है। नवभारत टाइम्स की टीम इस परिवार का हाल जाने पहुंची। पिता रशीद बोसम समझ नहीं पा रहे हैं, क्यों बोलें और क्या नहीं। जितना पूछा जाता है, उसका जवाब उतना ही नपा तुला देते हैं।

पापा, कब्र पर पत्थर ठीक से लगाना: कफ सिरप पीते ही पल्स गिरने लगे

पिता सैयद शबाब अली ने उल्टी होने पर बच्ची सेहरिश को अस्पताल में भर्ती कराया। सिस्टर ने टॉनिक पिलाई और कुछ ही घंटों में बच्ची की हालत बिगड़ने के बाद नागपुर ले जाते ही उसने दम तोड़ दिया। इस पिता का दिल तब दहल गया, जब 5 साल की बड़ी बेटी का फोन आया और उसने अपनी छोटी बहन की कब्र की चिंता करते हुए कहा- पापा, सेहरिश के साथ जो पत्थर लगा है, उसे ठीक से लगाना वो उस पर गिर ना पाये। यह मासूमियत में छिपा गहरा दर्द है।

पापा आप कहां पर हो? बेटा मैं आपकी छोटी बहन से मिलने उसकी कब्र पर आया हूं। अच्छा पापा आप सेहरिश की कब्र पर लगे पत्थर को अच्छी तरह से लगाना। कहीं ऐसा न हो कि वो मेरी बहन के ऊपर गिर जाए। ये बात 8 महीने की मासूम सेहरिश की बड़ी बहन ने फोन पर अपने पापा से कही। छिंदवाड़ा शहर में बड़ा इमामबाड़ा के नजदीक रहने वाले सैयद शबाब अली की 8 महीने की मासूम बेटी सेहरिश कफ सिरप से हुई मौतों का शिकार बन गई। सेहरिश की 5 साल की बहन को अब भी लगता है कि वो कब्र में सो रही है। उसे फिक्र है कि कहीं कब्र के ऊपर लगा पत्थर तेज हवा चलने से सो रही उसकी बहन सेहरिश पर न गिर जाए।

आठ महीने की फूल जैसी बच्ची की मौत का गम शबाब अली अब तक भुला नहीं पाए हैं। वो कहते हैं, जब काम से घर लौटता था तो मेरे पास आकर सो जाती थी। उस दिन से लेकर अब तक मेरे और मेरी पत्नी के हालात बेहद खराब हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा जख्म बच्ची खाला (मौसी) और उसकी मां को लगा है। जब हम लोग नागपुर गए थे तब मेरी पत्नी बार-बार बेहोश हो जाती थीं। मैंने उन्हें सारी चीजें नहीं बताईं। मिट्टी (अंतिम संस्कार) के समय उनका हाल बहुत खराब था। वो बार-बार कहती थीं कि सेहरिश के पापा आपने मुझसे सबकुछ छुपाया। मुझे कुछ नहीं बताया। हालात ये हो गई थी कि छिंदवाड़ा में मुझे पत्नी को 6-7 दिन तक अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

कफ सिरप Coldrif से मौतों का जिम्मेदार कौन?

डॉ प्रवीण सोनी (गिरफ्तार): परासिया के डॉक्टर, जिसने कथित तौर पर कमीशन (8 रुपये प्रति बोतल) के लालच में बच्चों को जहरीला ‘कोल्ड्रिफ’ सिरप लिखा। गंभीर लापरवाही के आरोपों के चलते उसे गिरफ्तार किया गया और उनकी जमानत याचिका खारिज होने के बाद उसकी दिवाली जेल में ही मनेगी। उस पर सिरप कंपनी से कमीशन लेने का आरोप है।

रंगनाथन (श्रीसन फार्मा मालिक- गिरफ्तार): तमिलनाडु स्थित सिरप निर्माता कंपनी श्रीसन फार्मास्युटिकल्स के मालिक एस. रंगनाथन को गिरफ्तार किया गया। हालांकि, फार्मा मालिक की गिरफ्तारी और रिमांड के बावजूद एसआईटी की जांच की गति पर सवाल उठ रहे हैं। कई लोगों को डर है कि कहीं यह जांच भी ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली कहावत साबित न हो जाए। डॉक्टर समुदाय भी डॉ सोनी की गिरफ्तारी पर सवाल उठा रहा है, उनका तर्क है कि दवा की गुणवत्ता सुनिश्चित करना खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग का काम है, न कि डॉक्टर का।

के माहेश्वरी (केमिकल एनालिस्ट- गिरफ्तार): कंपनी की केमिकल एनालिस्ट को भी तमिलनाडु से गिरफ्तार किया गया, जिस पर गंभीर लापरवाही का आरोप है। माना जा रहा है कि उसने लागत कम करने के लिए औद्योगिक ग्रेड के सस्ते, जहरीले रसायन डायथिलीन ग्लाइकोल (DEG) और इथिलीन ग्लाइकॉल (EG) की जांच में अनदेखी की, या जानबूझकर लापरवाही बरती। जांच में सामने आया है कि कंपनी ने लागत कम करने के लिए गैर-मानक केमिकल का इस्तेमाल किया था। सिरप में हानिकारक DEG की मात्रा 48.6% तक पाई गई, जिससे बच्चों की किडनी फेल हो गई।

ये 24 में से 13 की दर्दनाक कहानी है, लेकिन एक आखिरी बात। नन्हीं-सी जान को जरा-सी ठोकर लगते ही माता-पिता का कलेजा मुंह को आता है। ये तो जहर था, जिसे अमृत बताकर दिया गया था। जिगर के टुकड़ों को यूं दम तोड़ता देख जांघे थरथरा गई होंगी, दर्द से छाती फट गई होगी। उस दुख को सोचकर ही दिमाग सोचना बंद कर देता है। फिर भी वो जिंदा हैं तो इस अंतिम आस में कि न्याय मिलेगा। दिल में अंगारे दहक रहे हैं। आंखें दुख से अंधी होती जा रहीं। सवाल यह है कि मासूमों की मौत का यह तांडव खेलने वाले आधुनिक युग के ‘रावणों’ को क्यों न ऐसी कठोरतम सजा मिले, कि फिर कभी किसी का दीपक न बुझे, किसी का घर न उजड़े! इस दिवाली पर हमारी यही प्रार्थना है कि इस देश में ऐसा राम राज्य स्थापित हो, जहां स्वास्थ्य व्यवस्था, सुरक्षा और न्याय पर हर नागरिक का अटूट विश्वास हो, और जहां दवा के नाम पर मौत न परोसी जाए।

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