डॉ. विकास मानव
_सम्मोहन विज्ञान में दोनों आंखों की उर्जा का प्रयोग किया जाता है लेकिन दोनों आंखों की उर्जा का प्रयोग तीसरी आंख यानी आज्ञाचक्र की सहायता के बिना नहीं हो पाता है। तीसरी आंख के सहयोग के बिना सम्मोहन में प्रवेश आसान नहीं है। सम्मोहन में जब हम दोनों आंखों को किसी बिंदु पर ठहराते हैं या एकाग्र करते हैं तो हमारी दोनों आंखें तीसरी आंख के चुंबकीय क्षेत्र में आ जाती है।_
_सम्मोहनविद जब किसी को सम्मोहित करता हैं तो वह उसे अपनी आंखों में या किसी एक चमकते हुए बिंदु पर केन्द्रित होने को, एकाग्र होने को कहता है। सम्मोहनविद यदि संकल्प में आपसे गहरा होगा तो ही आपको अपनी आंखों में देखने को, एकाग्र होने को कह सकता है नहीं तो वह किसी बिंदु पर ही एकाग्र होने को कहता है।_
अचेतन के तल पर अपने से गहरे व्यक्ति या साधक को सम्मोहनविद सम्मोहित नहीं कर सकता है। क्योंकि वह जागा हुआ है, उसे सुलाना मुश्किल ही नहीं असंभव भी है।
वह सोने का, या नींद में चले जाने का अभिनय करके अपनी बात हमारे भीतर डाल सकता है क्योंकि सम्मोहनविद भी निर्विचार यानी चौथे तल पर ही होता है लेकिन दोनों में बहुत फर्क है।
सम्मोहनविद ने चौथे तल पर प्रवेश किया है सिर्फ किसी को सम्मोहित करने के समय, लेकिन गहरे तल पर खड़े व्यक्ति का तो चौथे तल पर प्रवेश हो चुका है वह भी हमेशा के लिए!
इसलिए वह उथले तल पर खड़े सम्मोहनविद को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेता है। संभवतः तो सम्मोहनविद अपने से गहरे अचेतन पर खड़े व्यक्ति को सम्मोहित करने से पहले ही उसके प्रभाव क्षेत्र में आ जाता है क्योंकि उसका प्रभाव चुंबक की तरह खींचता है।
*आंखों की भूमिका :*
हमारी दोनों आंखें हमारे विचारों के साथ गतिमान होती रहती है। क्रोध का विचार यदि आता है तो हमारा शरीर आंखों की पलकें पूरी खोलकर आंखों को बड़ा दिखाकर सामने वाले को डराने की कोशिश करता है।
अपने से छोटों को हम आंखें दिखाकर और अपने से बड़ों के आगे आंखें झुकाकर हम अपने विचारों को उन तक प्रेषित करते रहते हैं। यानी हम अपने विचारों को आंखों के द्वारा अभिव्यक्ति देते हैं। अपने विचार को, अपनी बात को आंखों की भाषा में समझा देते हैं।
इस तरह हमारी आंखों का हमारे विचारों से गहरा अंतर्संबंध निहित हो जाता है। अर्थात हमारी आंखें हमारे विचारों की अभिव्यक्ति बन जाती हैं और हमारे विचार आंखों को संचालित करने लगते हैं।
यानी आंखें और विचार एक – दूसरे के साथ गतिमान होते हैं। अर्थात एक सिरे को पकड़ो तो दूसरा सिरा आसानी से पकड़ में आ जाए।
यही कारण है कि यदि हमारा मन शांत होगा तो ही हमारी आंखें शांत होंगीं, ठहरी हुई होंगीं और यदि हमारा मन शांत नहीं होगा तो हमारी आंखें भी शांत नहीं होंगी, ठहरी हुई नहीं होंगीं, गतिमान होंगीं, इतनी गतिमान कि नींद आने में बाधक होगी।
_यदि हमारे विचार शांत होंगें तो हमारी आंखें भी शांत और ठहरी हुई होंगी। और इसके उलट यदि हमारी आंखें शांत और ठहरी हुई होंगीं तो हमारे विचार भी शांत होंगें, ठहरे हुए होंगें। यानी घटना दोनों ओर से घट सकती है।_
इसका मतलब यदि हम आंखों को ठहराते हैं तो हमारे विचार ठहर जाएंगे। और यदि हम विचारों को ठहरा लेते हैं तो हमारी आंखें ठहर जाएंगी.
ध्यान में हम शरीर को ठहराते हैं, शिथिल कर विश्राम में ले जाते हैं ताकि हमारा मन ठहर जाए यानी विचार ठहर जाए और विचारों के ठहरते ही हमारी आंखें भी ठहर जाए और हमारा ध्यान में या कहें अचेतन में प्रवेश हो जाए?
सम्मोहन में हम आंखों को एक बिंदु पर ठहराते हैं ताकि विचार ठहर जाए और विचारों के ठहरते ही हमारा चेतन मन सो जाए और चेतन मन के साथ ही शरीर भी सो जाए और सम्मोहनविद का हमारे अचेतन से संपर्क हो जाए और हमारे अचेतन में सम्मोहनविद प्रवेश कर जाए।
_ध्यान में और सम्मोहन में, दोनों ही स्थितियों में हमारा अचेतन में प्रवेश होता है जिसे निर्विचार यानी चौथा तल कहा गया है। ध्यान में हम सजगता से, होश पूर्वक प्रवेश करते हैं जहां हमारा चेतन मन खो जाता है, शिथिल हो जाता है और हमारा अचेतन मन जाग जाता है और हम साक्षी हो जाते हैं।_
साक्षी इसलिए हो जाते हैं क्योंकि जो साक्षी विचारों में खोया हुआ था, विचारों के रुकते ही विचारों से जाग जाता है और अपने आप पर लौट आता है। स्वयं को अपने शरीर का साक्षी हुआ पाता है।
*अचेतन मन का जागरण :*
सम्मोहन में हमारा चेतन मन शरीर के साथ ही सो जाता है और हमारा अचेतन मन जाग जाता है। चूंकि चेतन मन सम्मोहनविद के संपर्क में रहता है तो ज्यों ही हमारा चेतन मन सोता है और अचेतन जागता है तो हमारा अचेतन सीधे सम्मोहनविद के संपर्क में आ जाता है ठीक उसी तरह जिस तरह से हम अपनी गाड़ी को एक गियर से दूसरे गीयर में डालते हैं और गाड़ी गति में आ जाती है।
_चेतन मन का दूसरा सिरा अचेतन है। ज्यों ही शरीर के साथ चेतन मन वाला पहला सिरा सोता है, दूसरा सिरा अचेतन सम्मोहनविद के संपर्क में आ जाता है, जैसे हम फोन पर बात करते हैं और पहली कॉल को होल्ड करके दूसरी काॅल रीसिव कर लेते हैं उसी भांति सम्मोहनविद का हमारे सोने के बाद, चेतन मन के सोते ही हमारे अचेतन से संपर्क हो जाता है।_
क्योंकि उसने अब तुम्हें नींद आ रही है… अब तुम्हें नींद आ रही है… अब तुम्हें नींद आ रही है… कहते हुए हमारे चेतन मन को सुला दिया और अचेतन को जगा दिया है।
अचेतन चेतन मन की जगह ले लेता है जैसे नौकरी में हमारी ड्यूटी बदलती है।
चेतन मन पर चल रहे विचार नींद में प्रवेश करने पर अचेतन में स्वप्न बन जाते हैं। लेकिन यहां सम्मोहित होने वाले व्यक्ति यानी हमारे मन में कोई भी विचार नहीं है क्योंकि सम्मोहनविद ने हमारी आंखों को एक बिंदु पर ठहराकर हमारे विचारों को भी ठहरा दिया है।
विचारों के ठहरते ही निर्विचार यानी अचेतन हमारे सामने आ खड़ा होगा। चूंकि अचेतन की डोर सम्मोहनविद के हाथ में हैं। हमारा साक्षी तो सो गया है हम तो नींद में चले गए हैं। हमारे अचेतन को तो सम्मोहनविद निर्देशित कर रहा है।
यदि जागते में सम्मोहनविद हमें कहता कि धूम्रपान ठीक नहीं है। इससे केंसर होता है। तो हम तर्क कर टालते हुए कहते हैं कि एक दिन मरना ही तो है… और क्या होगा? लेकिन हमारा अचेतन जो इससे नौ गुना बड़ा है वह तर्क नहीं करता है।
सम्मोहनविद उससे यदि कहे कि धूम्रपान ठीक नहीं है। इससे केंसर होता है। तो वह स्वीकार कर लेता है और धूम्रपान की तलब ही नहीं लगने देगा। धूम्रपान की जगह होगी उसकी अनुपस्थिति की मीठी – मीठी खुमारी।
यहां चेतन मन के सोते ही हमारा सजग होना, साक्षी होना भी खो जाता है। क्योंकि हमारे साक्षी को तो पहले से ही सम्मोहनविद ने हमारे शरीर के साथ ही सुला दिया होता है।
इसलिए सम्मोहनविद हमारे अचेतन से क्या – क्या बातें पूछता है यह केवल वह जानता है और उसके आसपास जो हमारे परिजन उपस्थित होते हैं, वे जान पाते हैं।
जिसे सम्मोहित किया जाता है वह, यानी हम यहां पर एक प्रकार की तंद्रा में होते हैं, जहां न तो कोई विचार होता है और न ही कोई स्वप्न होता है। तंद्रा में यदि विचार होगा तो हमारा चेतन मन जागा हुआ होगा और हम सम्मोहन के बाहर होंगें और यदि स्वप्न होगा तो सम्मोहनविद का हमारे अचेतन से संपर्क टूट जाएगा यानी सम्मोहनविद की बात का हमारा अचेतन कोई जवाब नहीं दे पाएगा क्योंकि अचेतन तो हमारे चेतन मन को तंद्रा से खींचकर स्वप्न दिखाने में व्यस्त होगा न कि सम्मोहन में होगा?
अतः सम्मोहन में हम एक गहरी तंद्रा में होंगे जहां हमारे साथ क्या घटा है या सम्मोहनविद ने हमारे अचेतन से क्या पूछा है और हमारे अचेतन को क्या कहा है, हमारे अचेतन में क्या बात डाली है हमें इसकी कोई जानकारी नहीं होती है।
सम्मोहन के बाहर आने के बाद भी हमें कुछ याद नहीं रहता है। लेकिन हम अपने को अधिक ताजा अनुभव करते हैं।
हम लाख कोशिशों के बाद भी नींद नहीं ला पाते हैं और सम्मोहन में ऐसी क्या घटना घटती है कि सम्मोहनविद हमें बड़ी आसानी से नींद में ले जाते है? सम्मोहनविद कैसे हमें नींद में ले जाकर हमारे अचेतन से संपर्क करते हैं?
जब सम्मोहनविद हमें सम्मोहित करते हैं तो पहले वह हमें गहरी श्वास लेकर अपने शरीर को शांत और शिथिल करने को कहते हैं।
जब हम गहरी श्वास लेकर अपने शरीर को शांत और शिथिल कर लेते हैं तो हमारी श्वास गहरी हो नाभि तक चलने लगती है, जैसी शरीर के नींद में चले जाने पर चलती है वैसी चलने लगती है।
अर्थात हमारा शरीर तुरंत नींद में जाने की तैयारी में आ जाता है बाकी सम्मोहनविद का सुझाव काम करता है कि “तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है… ” और बिंदु को अपलक देखते – देखते हम तुरंत नींद में चले जाते हैं।
*यूँ काम करता है सम्मोहनविद का सुझाव :*
सम्मोहनविद जैसे ही हमें एक बिंदु पर केंद्रित होने को कहता है। और हम अपलक यानी कि पलकों को झपकाए बिना उस बिंदु पर केंद्रित होते हैं तो हमारी दोनों आंखें एकाग्र होकर उस बिंदु पर ठहर जाती है, कोई गति नहीं करती है।
जब हमारी दोनों आंखें एक बिंदु पर थींर हो जाती है, ठहर जाती है तो हमारे विचार भी ठहर जाते हैं। और ज्यों ही विचार ठहरते हैं शरीर और भी शिथिल हो जाता है और शरीर के शिथिल होने के साथ ही हमरा चेतन मन भी शिथिल हो जाता है और सो जाता है।
दूसरे, सम्मोहनविद का सुझाव भी उसे सुलाने में मदद करता है कि “तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है… तुम्हें नींद आ रही है…।” बार बार एक ही बात को दोहराने से कि “तुम्हें नींद आ रही है…” मन उबने लगता है इसलिए भी नींद में चला जाता है।
अचेतन जागते ही सम्मोहनविद के संपर्क में आ जाता है। क्योंकि हमारे मन की डोर उसी के हाथ में है। अब सम्मोहनविद के मन में एक ही भाव होता है, कि इस व्यक्ति को स्वस्थ होने में मदद कैसे की जाए? इस व्यक्ति को ध्यान में प्रवेश करने में कैसे मदद की जाए?
यहां सम्मोहनविद हमारे अचेतन को जो भी सुझाव देगा उसका हमारे शरीर पर प्रभाव होगा और हमारे दैनिक जीवन पर भी होगा। यदि हम किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं तो सम्मोहनविद हमारे अचेतन को कह देगा कि तुम्हें कोई बिमारी नहीं है और अचेतन इस बात को स्वीकार लेगा और हम धीरे – धीरे उस बिमारी से बाहर आने लगेंगे।
क्योंकि अचेतन बहुत भोला है, तर्क नहीं करता है, हर बात को स्वीकार लेता है। जब वह बेतुके सपने को स्वीकार लेता है तो फिर हमारे सुझाव को क्यों नहीं स्वीकारेगा?
यहां इसका दुरुपयोग भी संभव है। सम्मोहनविद चाहे तो सम्मोहित व्यक्ति को जिस तरह बिमारी से बाहर लाता है उसी तरह से बिमारी में डाल भी सकता है। वह अचेतन से कह सकता है कि तुम्हें अमुक बिमारी है और हमारा अचेतन इसे स्वीकार लेगा और हम उस बिमारी से पीड़ित होते चले जाएंगे।
यह सम्मोहन का दुरुपयोग होगा लेकिन… ऐसा बहुत कम होगा, क्योंकि अचेतन भोला है लेकिन मूर्ख नहीं है। क्या उसके भीतर गहरा है और क्या उसके लिए उथला है! वह जानता है। अचेतन के सारे निर्णय सही होते हैं इसलिए अचेतन नकारात्मक निर्णय नहीं लेगा यानी गलत विचार के सुझाव के समय वह सम्मोहन के बाहर आ जाएगा।
सम्मोहन के प्रयोग में सम्मोहनविद पर भरोसा और अपनों की उपस्थिति में ही किसी को अपने अचेतन में प्रवेश देना चाहिए।
*
तीसरी आंख सम्मोहन का आधार :*
_सम्मोहन विज्ञान में तीसरी आँख यानी आज्ञाचक्र का महत्वपूर्ण योगदान है। आज्ञाचक्र के बिना सम्मोहन की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। या कहें कि आज्ञाचक्र के बिना सम्मोहन का कोई वजूद ही नहीं है। आज्ञाचक्र सम्मोहन का आधार है, नींव है, और नींव के बिना सम्मोहन का मंदिर नहीं बनाया जा सकता है।_
सामान्यतः सम्मोहन से जुड़े हुए लोग अपनी सारी शक्ति को अपनी दोनों आंखों में केंद्रीत करते हैं जिससे वे दूसरों को सम्मोहित करते हैं। यही कारण है कि उनकी आंखें सतत तनावपूर्ण बनी रहती है। जबकि सारा खेल आज्ञाचक्र का, यानी तीसरी आंख का होता है। जिसका उन्हें बहुत कम ज्ञान होता है। आज्ञाचक्र का वे अनजाने ही उपयोग तो करते हैं लेकिन आज्ञाचक्र की उपयोगिता को समझ नहीं पाते हैं।
सम्मोहन विज्ञान में दोनों आंखों की उर्जा का प्रयोग किया जाता है लेकिन दोनों आंखों की उर्जा का प्रयोग तीसरी आंख यानी आज्ञाचक्र की सहायता के बिना नहीं हो पाता है। जाने या फिर अनजाने ही सम्मोहन में तीसरी आंख का उपयोग होता आया है। क्योंकि तीसरी आंख के सहयोग के बिना सम्मोहन में प्रवेश आसान नहीं है।
_सम्मोहन में जब हम दोनों आंखों को किसी बिंदु पर ठहराते हैं या एकाग्र करते हैं तो हमारी दोनों आंखें तीसरी आंख के चुंबकीय क्षेत्र में आ जाती है। जब हम अपनी दोनों आंखों को किसी बिंदु पर ठहराते हैं तो हमारी दोनों आंखों की उर्जा उस बिंदु से टकराकर वापस हमारी ओर लौटती है और ज्यों ही उर्जा हमारी और लौटती है तीसरी आंख उस उर्जा को लपक लेती है।_
और ज्यों ही तीसरी आंख हमारी देखने वाली ऊर्जा को अपनी ओर आकर्षित करती है, हमें बिंदु दिखलाई देना बंद हो जाता है और हमारी पलकें भी बंद हो जाती है। क्योंकि हमरी बिंदु को देखने वाली उर्जा तीसरी आंख यानी आज्ञाचक्र में प्रवाहित होने लगती है। दूसरे, सम्मोहनविद के सुझाव से कि “तुम्हें नींद आ रही है…तुम्हें नींद आ रही है… ।” हम फौरन नींद में प्रवेश करते चले जाते हैं।
हमारे नींद में प्रवेश करते ही हमारा चेतन मन तो सो जाता है और अचेतन जाग जाता है। अतः सम्मोहनविद द्वारा चेतन मन को दिये सुझाव चेतन मन के सोते ही अचेतन को सुनाई पड़ने लगते हैं और वह उनका अनुपालन करने लगता है।
_हम एक गहरी तंद्रा में चले जाते हैं। तंद्रा लाई हुई नींद है। और जब हम नींद को अपने शरीर में लाते हैं तो वह नींद, स्वाभाविक नींद से भी गहरे हमारे शरीर को प्रभावित करती है। तंद्रा में विचार नहीं होते हैं क्योंकि मन की विचार वाली पर्त को तो पहले ही सुझाव देकर नींद में भेज दिया गया है। तंद्रा में स्वप्न भी नहीं होते हैं, क्योंकि स्वप्न दिखाने वाला अचेतन सम्मोहनविद के सुझाव का अनुपालन कर रहा होता है।_
अतः तंद्रा इतनी आनंदपूर्ण स्थिति है जिसमें बार बार जाने को मन होता है। जो लोग मंत्र जाप करते हैं वे अक्सर तंद्रा में चले जाते हैं। एक ही शब्द को बार बार दौहराने पर मन उबने लगता है और वह तंद्रा में प्रवेश कर जाता है। जो एक प्रकार की खुमारी है, जिसे वह भ्रमवश ध्यान समझ बैठता है और उसका आदी हो जाता है।
जिसमें शरीर को आक्सीजन मिलती है, जिससे व्यक्ति अपने को ताजा अनुभव करता है लेकिन ध्यान साधना का उससे कोई लेना-देना नहीं है।
जितनी देर तक हम सम्मोहित रहते हैं उतनी देर तक हमारी दोनों आंखें तीसरी आंख में केंद्रित रहती है। तीसरी आंख हमारी दोनों आंखों को अपनी ओर इतना आकर्षित कर लेती है कि हमारी दोनों आंखें तीसरी आंख में थींर होकर रह जाती है। यही कारण है कि जब तक सम्मोहनविद नहीं चाहेगा हमारा शरीर इस तंद्रा से बाहर नहीं आएगा।
_हमारी तीसरी आंख जन्मों – जन्मों से प्यासी है, उर्जा उसका भोजन है, सम्मोहन में उसे भोजन मिलना शुरू हो जाता है अतः जब तक दोनों आंखों से उसका ध्यान विच्छिन्न नहीं करते हैं तब तक वह छोड़ती नहीं है। यदि सम्मोहनविद कहीं चला जाता है तो जब तक वह लौट कर नहीं आता है सम्मोहन टूटना मुश्किल होता है। क्योंकि तीसरी आंख अपना काम करती रहती है।_
जब तक हमारी दोनों आंखों की उर्जा तीसरी आंख को मिलती रहेगी या जब तक दोनों आंखें तीसरी आंख के प्रभाव से बाहर नहीं आती है तब तक सम्मोहन समाप्त नहीं होता है।
सम्मोहन में हमारा अचेतन सिर्फ सम्मोहनविद की ही आवाज सुन सकता है, किसी दूसरे की आवाज नहीं सुन सकता है। क्योंकि हमारा अचेतन चौथा निर्विचार का तल है और दूसरा व्यक्ति तीसरे विचार के तल पर खड़ा है। जैसे कोई व्यक्ति सोया हुआ है और स्वप्न देख रहा है तो उसे हमारी आवाज नहीं सुनाई देगी जबकि सम्मोहनविद उसी चौथे निर्विचार वाले तल पर खड़ा है!
_अचेतन के तल पर खड़ा है यानी दोनों एक ही तल पर खड़े होते हैं ! इसलिए सम्मोहित व्यक्ति को सिर्फ सम्मोहनविद की ही आवाज सुनाई देगी।_
यदि सम्मोहित व्यक्ति को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए तो वह अपनी पिछली स्मृतियों में ही उलझ कर रह जाता है। वह वहीं की बातें करेगा, जहां उसे छोड़ा गया था। वर्तमान से उसका कोई सरोकार नहीं रह जाता है। उसकी हर बात हमें विरोधाभासी लगती है।
इस परिस्थिति में अचेतन उस पर टूट सकता है, सारे दमित आवेग उसे घेर सकते हैं और उसके विक्षिप्त होने की संभावना प्रबल हो जाती है।
जो व्यक्ति भाव प्रणव है, जो व्यक्ति अंतर्मुखी है, उस पर इसका प्रभाव ज्यादा होता है और जो बहिर्मुखी है वह इससे कम प्रभावित होता है।
लेकिन अचेतन को दिया गया सुझाव काम करता है।
_अचेतन को इतना कहना भर काफी है कि “अब तुम नींद से बाहर आ रहे हो…।” और व्यक्ति सम्मोहन के बाहर आने लगता है। अचेतन बहुत भोला और समझदार है। यदि पहले से ही उसे कह दिया जाए कि इतने मिनट के बाद तुम नींद से बाहर आ जाओगे तो वह नियत समय पर दोनों आंखों को तीसरी आंख से अलग कर देगा ताकि तंद्रा टूट जाए, चेतन मन जाग जाए और हम तंद्रा के बाहर आ जाएं।_
तीसरी आंख सम्मोहन का आधार है। और दोनों आंखों की उर्जा तीसरी आंख को भेजकर ही उसका उपयोग किया जाता है। तीसरी आंख को सक्रिय करने के लिए हमारी दोनों आंखों की उर्जा का तीसरी आंख पर भेजना अनिवार्य है। दोनों आंखें जैसे ही बाहर देखना बंद करती है तो उनकी बाहर देखने की उर्जा भीतर विचारों में उलझ जाती है।
_यदि हम उर्जा को विचारों से मुक्त कर लेते हैं तो उर्जा तीसरी आंख में बहनी शुरू हो जाती है। सम्मोहन में हम दोनों आंखों की उर्जा को विचारों से मुक्त कर तीसरी आंख में भेजते हैं तभी हमारा चेतन मन सोता है और अचेतन जाग जाता है।_
*समाधि यानी परमानंद का धोखा है आत्म-सममोहन :*
जब हम अपने शरीर में एक छींक नहीं घटा सकते हैं तो समाधि कैसे घटा सकते हैं?
_आत्म-सम्मोहन ध्यान के प्राथमिक चरण का एक हिस्सा है। सीधे समाधि में प्रवेश करने के लिए इसका प्रयोग खतरनाक है। सम्मोहन मन का एक विज्ञान है और मन का विज्ञान आत्मा के तल पर प्रवेश नहीं करवा सकता है। सिर्फ मन के तल पर ही प्रवेश करवा सकता है। ठीक उसी भांति जिस भांति बस का ड्राइवर हवाई जहाज में यात्रा नहीं करवा सकता है।_
हां, हवाई जहाज का पायलेट बस में भी सफर जरूर करवा सकता है क्योंकि उड़ान भरने के पहले हवाई जहाज बस की भांति ही रन-वे पर दौड़ता है। यानी समाधिस्थ व्यक्ति सम्मोहन में प्रवेश कर सकते हैं लेकिन सम्मोहन से समाधि में प्रवेश करना असंभव है।
आत्म-सम्मोहन सिर्फ ध्यान के प्रारंभिक चरण के लिए ही प्रयुक्त होता है। सिर्फ साक्षी और साक्षी से संकल्प की यात्रा तक ही आत्म-सम्मोहन का उपयोग है। साक्षी और संकल्प के बाद आत्म-सम्मोहन का वही हाल हो जाता है, जो ताला खोलने के बाद चाबी का हो जाता है।
_हमारी चेतना के सात तल हैं। पहला तल है हमारा स्थूल शरीर, दूसरा है भाव, तीसरा है विचार, चौथा है मन, पांचवां है आत्मा, छठा है ब्रम्ह और सातवां है निर्वाण। और हमारी चेतना के यह सातों तल हमारे सातों चक्रों से संयुक्त हैं। स्थूल शरीर पहले मूलाधार से, भाव स्वाधिष्ठान से, विचार मणिपुर से, मन अनाहत से, आत्मा विशुध्दी से, ब्रम्ह आज्ञाचक्र से और निर्वाण हमारे अंतिम चक्र सहस्त्रार चक्र से संयुक्त है।_
हमारा जीवन चेतना के प्रथम तीन तल, शरीर, भाव और विचार में ही डोलता रहता है। यानी मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर में ही उलझा रहता है। सारी साधनाएं तीसरे विचार वाले तल से चौथे निर्विचार वाले मन के तल पर प्रवेश करने के लिए ही की जाती है। अर्थात तीसरे मणिपुर चक्र से चौथे अनाहत चक्र में प्रवेश करने के लिए ही की जाती है।
_साधना में जब हम तीसरे विचार वाले तल से चौथे निर्विचार वाले मन के तल पर प्रवेश करते हैं, यानी मणिपुर चक्र से अनाहत चक्र में प्रवेश करते हैं, तब हमारा ध्यान में प्रवेश होता है। जहाँ विचारों की अनुपस्थिति में हमें एक सन्नाटा सुनाई पड़ता है, जिसे अनहद नाद कहा गया है।_
ध्यान में प्रवेश करने के लिए पहले हम साक्षी को जगाते हैं। क्योंकि साक्षी ही संकल्प को जगाता है। और साक्षी को जगाने के लिए हम प्राथमिक चरण के रूप में आत्म-सम्मोहन का प्रयोग करते हैं। आत्म-सम्मोहन में हम पहले तल स्थूल शरीर को नींद में ले जाते हैं। ताकि दूसरा भाव और तिसरा विचार वाला तल भी नींद में चला जाए और विचार के सोते ही हमारा चौथे मन के तल पर यानी अचेतन में प्रवेश हो जाए। और साक्षी अचेतन को बता सके कि “मुझे ध्यान में प्रवेश करना है। या कि मैं संकल्प लेता हूँ कि ध्यान में प्रवेश करके रहूंगा।”
आत्म-सम्मोहन प्राथमिक यात्रा है, साक्षी से संकल्प के लिए। तीसरे विचार वाले तल से चौथे निर्विचार वाले तल में प्रवेश करके संकल्प साधने के लिए। जबकि समाधि है पांचवें तल आत्मा में प्रवेश करना जिसका चक्र है पांचवां विशुद्धी।
_साधना शुरू होती है तीसरे तल विचार से चौथे तल मन यानी निर्विचार में प्रवेश करने से। तीसरे तल पर जब हम विचारों के साक्षी होते हैं तो विचार विलीन होने लगते हैं और हमारा निर्विचार यानी चौथे मन के तल पर प्रवेश होता है जिसे ध्यान में प्रवेश करना कहा गया है।_
तो हम तीसरे विचार के तल पर साक्षी को जगाए बिना, आत्म सम्मोहन द्वारा सीधे पांचवें आत्मा के तल पर समाधि में कैसे प्रवेश कर सकते हैं?
_समाधि है चौथे मन के तल से पांचवें आत्मा के तल में प्रवेश करना और उसका सूत्र है साक्षी होना यानी जागना, तो यदि हम चौथे तल पर साक्षी हो जाते हैं, जाग जाते हैं तो फिर नींद में ले जाने वाले आत्म-सम्मोहन का क्या काम है? आत्म-सम्मोहन तो तीसरे तल पर साक्षी को जगाने के लिए है! अब समाधि यानी अत्मा के लिए साक्षी को सुलाने का क्या काम है?_
अब तो चौथे निर्विचार के तल पर तो साक्षी और-और जागता जाएगा क्योंकि विचारों में खर्च होने वाली सारी ऊर्जा साक्षी को मिल रही है! अब तो साक्षी जब परिपूर्ण रूप से जागृत हो जाएगा तो स्वतः ही पांचवे तल पर समाधि में या कि आत्मा में प्रवेश कर जाएगा! हम उसको आत्म-सम्मोहन से सुलाकर समाधि में कैसे ले जा सकते हैं?
और जब हम नींद नहीं ला सकते हैं! हम जितना नींद लाने की कोशिश करते हैं नींद का आना उतना दूभर हो जाता है। नींद हम ला नहीं सकते हैं! नींद हमारे शरीर पर घटती है। नींद तो ठीक है, हम एक छींक भी नहीं ला सकते हैं? छींक भी हमारे शरीर में घटती है! छींक भी स्वेक्षिक नहीं है। हम कितने असहाय हैं कि एक छींक भी नहीं ला सकते हैं! तो समाधि को कैसे ला सकते हैं? क्योंकि नींद और छींक की तरह समाधि भी हमारे शरीर में घटती है!
_यानी समाधि में हमारा प्रवेश “होता” है! हम समाधि में प्रवेश “कर” नहीं सकते हैं! और न ही कोई हमें समाधि में प्रवेश “करवा” सकता है! अर्थात यह घटना हमारे हाथ में ही नहीं है? कोई दूसरा हमारे भीतर एक छींक नहीं पैदा करवा सकता है तो वह समाधि कैसे पैदा करवा सकता है? हां वह सूंघनी सूंघाकर नकली छींक पैदा करवा सकता है जिस तरह से समाधि के धोखे वाली नकली नींद तंद्रा पैदा करवाता है?_
सम्मोहन है प्राथमिक और समाधि है उच्चतर। यानी आत्म-सम्मोहन है नर्सरी का अध्यापक और समाधि है कालेज का प्रोफेसर, तो नर्सरी का अध्यापक प्रोफेसर की पढ़ाई कैसे करवा सकता है?
_यानी हम साधना के आरंभिक चरण सम्मोहन से, जो नींद लाता है, साधना के अंतिम चरण समाधि में कैसे जा सकते हैं? जो कि पूर्ण जागृति पर ही फलित होती है?_
जिस तरह से प्रेम का हमारा अनुभव है, ध्यान का हमारा अनुभव है, उसी तरह से समाधि का हमारा कोई अनुभव नहीं है। समाधि यानी क्या? क्या कल्पना करेंगे हम समाधि की? मन का तो हमारा अनुभव है कि प्रेम भी करता है, क्रोध भी करता है, दुखी भी होता है, ध्यान भी करता है लेकिन समाधि का या आत्मा का हमारा कोई अनुभव नहीं है कि वहां क्या होता है?
आत्म-सम्मोहन का जब हम समाधि में जाने के लिए उपयोग करते हैं तो आत्मा का या कि समाधि का कोई अनुभव नहीं होने के कारण हमारा मन समाधि की कल्पना करता है और झूंठी समाधि का कोई प्यारा सा सपना दिखाने लगता है। जो-जो भी समाधि के विषय में हमने पढ़ा-सुना है ओर उसकी जो-जो भी हमने कल्पना की है, वही कल्पना एक सुन्दर सपने के रूप में घटित होने लगती है और ऐसी घटित होती है कि हमें वास्तविक लगने लगती है। और आत्म-सम्मोहन इसमें बहुत ही सहयोगी होता है।
समाधि में जाने का भाव लेकर जब हम आत्म-सम्मोहन में प्रवेश करते हैं तब हम विश्राम में लेटकर भाव करते हैं कि “मैं समाधि में जा रहा हूँ… मैं समाधि में जा रहा हूँ… मैं समाधि में जा रहा हूँ…।”
_हमारा शरीर विश्राम में होता है और श्वास गहरी होती है। शरीर नींद की भावदशा में आ जाता है। हमारे भीतर कोई विचार नहीं होते हैं क्योंकि हमारा साक्षी विचार करने के बजाय समाधि में जाने के लिए स्वयं को आत्म-सम्मोहन में ले जा रहा होता है! हमारा साक्षी समाधि में जाने का सुझाव दे रहा होता है।_
अचेतन को दिया सुझाव काम करता है और हमारे मन में समाधि की जो कल्पना होती है वह मूर्तरूप लेने लगती है। अचेतन हमें उसी कल्पना में ले जाता है जो कि हमने समाधि के विषय में पहले से ही सोची हुई है। और ज्यों ही अचेतन सपना दिखाने लगता है हमारा साक्षी समाधि में प्रवेश करने का सुझाव देते-देते अचेतन द्वारा दिखाए समाधि के सपने में खो जाता है क्योंकि साक्षी को अपने जागने का पता ही नहीं होता है। और हमारा एक गहरी तंद्रा में प्रवेश हो जाता है।
हम अचेतन को सिर्फ संकल्प ही दे सकते हैं, समाधि नहीं दे सकते हैं। क्योंकि उसे संकल्प का पता है, समाधि का नहीं! हम उसे कह सकते हैं कि “मुझे ध्यान में जाना है.. मुझे बुरी आदतों को छोड़ना है…या कि मुझे इस बिमारी से बाहर निकलना है।”
_इन सभी बातों का अचेतन को पता है। और अचेतन ही इनआदतों को संचालित करता है। धुम्रपान और गुटखा-तंबाखू यह सब अचेतन से ही संचालित होते हैं। तभी तो हम इन्हें छोड़ नहीं पाते हैं। जो आदतें अचेतन से संचालित होती है उन्हें छोड़ने का सुझाव हम अचेतन को दे सकते हैं। लेकिन समाधि में जाने का सुझाव हम कैसे दे सकते हैं? क्योंकि समाधि का तो उसे पता ही नहीं है? और न ही समाधि वह संचालित करता है?_
हमारे मन में समाधि की एक कल्पना होती है कि वहां परम विश्राम है। यह कल्पना हमारे शरीर को गहरी तंद्रा में पहुंचाकर गहरी नींद में ले जाती है। ऐसी नींद में जहां हम पूरी तरह से बेहोश होते हैं। सम्मोहन की नींद में।
सम्मोहन एक नींद है, जिसे हम स्वयं आमंत्रित करते हैं। यानी सम्मोहन एक लाई हुई नींद है। जैसे शरीर में शराब डालकर हम अपने शरीर में नशे को लाते हैं।
उसी भांति सम्मोहन में हम शरीर में नींद को लाते हैं। वास्तविक नींद का इससे कोई संबंध नहीं है। वास्तविक नींद में हम स्वप्न में होते हैं और सम्मोहन वाली नींद में स्वप्न नहीं होते हैं, इसी को तंद्रा कहा जाता है। तंद्रा में स्वप्न इसलिए नहीं होते हैं, क्योंकि अचेतन ने समाधि का जो स्वप्न दिखाया है उसमें प्रकाश ही प्रकाश है और विश्राम है। और प्रकाश को दर्शाने के लिए शब्द नहीं होते हैं, विचार, नहीं होते हैं, इसलिए स्वप्न नहीं बनता है सिर्फ प्रकाश का एक भ्रम होता है। अतः हम गहरी नींद में चले जाते हैं।
_गहरी नींद से शरीर को आक्सीजन मिलती है और हम तरोताजा होकर गहरी नींद से लौटते हैं। चूंकि सपना आनंद का था। प्रकाश का था इसलिए सपने की कोई आकृति या चित्र नहीं बनता है और गहरी तंद्रा में जाने के बाद कुछ भी याद नहीं बनती है। यह तंद्रा हमें बहुत ताजगी देती है, हम इसे समाधि समझ लेते हैं और हम इसके आदी हो जाते हैं और यह एक तरह का नशा-सा हो जाता है जिसमें रोज-रोज जाने का मन होता है।_
आत्म-सम्मोहन का समाधि में प्रवेश करने के लिए उपयोग करने के कारण हम अचेतन के दिखाए इस समाधि के भ्रम-जाल में बुरी तरह से उलझ जाते हैं। हमारी आध्यात्मिक यात्रा पूरी तरह से अवरूद्ध हो जाती है। हम ध्यान करना छोड़ देते हैं क्योंकि जो व्यक्ति समाधि में चला गया है वह अब ध्यान क्यों करेगा? वह तो अब बुद्धत्व को उपलब्ध हो गया है। अब उसे ध्यान की क्या जरूरत है अब तो वह प्रवचन करेगा!
_अचेतन में पूरी तरह से समाधि का एक भ्रमजाल खड़ा हो जाता है। हमारे हाथों में सिर्फ एक मिथ्या समाधि का भ्रम होता है, यही भ्रम हमें ध्यान में जाने से रोक लेता है क्योंकि अब ध्यान में जाने की क्या जरूरत है? अब तो समाधि मिल गई!_
हम दूसरों को बताने में लग जाते हैं और हम स्वयं ध्यान से चूकने लगते हैं। लोग हमारे पैर छूते हैं और हमारा अहंकार फिर से खड़ा होने लगता है। हमारा व्यावहारिक जीवन भी तनावपूर्ण होने लगता है क्योंकि समाधि मिलने के बाद भी हमारा काम, क्रोध, लोभ, मोह सब हाजिर होते हैं। हमें संताप भी घेरता है और मिथ्या समाधि का भ्रम हमें उलझाए भी रखता है। हमारा जीवन एक विरोधाभास होकर रह जाता है। और इन सब को भुलाने के लिए हम रोज-रोज सम्मोहन की इस नींद में प्रवेश करने लगते हैं।
_साक्षीत्व और ध्यान के बिना समाधि की यात्रा संभव नहीं है और आत्म-सम्मोहन से तो कदापि नहीं! क्योंकि आत्म-सम्मोहन नींद लाता है और समाधि में जागरण फलित होता है।_![]()





