धोखा खानेवालों को भोला समझता था
समझता था लोग समझ नहीं पाते,
फरेब को
मुझे लगता था
कि वे अनजान हैं उस साजिश से
जो चल रही है उनके ही खिलाफ
और महामार्ग से होकर पहुँचती है
सीधे उनके दरवाजे तक
सूचना, मनोरंजन के बहाने
घेरती है उनके दिमाग को
मुझे लगता था
कि लोग हार रहे हैं
क्योंकि उनके हाथ में चीजे नहीं हैं
मेरी आँखों में आंसू भरे होते थे
उनकी बेचारगी के लिए
कुढ़ते हुए ही सही
मैं मानता था
कि वे निर्दोष हैं,
लेकिन अब नहीं मानता हूँ .
मैं उन्हें कैसे निर्दोष मानूं?
उन्हें जरा भी परवाह नहीं
पेड़, पशु, नदी, तालाब की
इंसान की भी नहीं है
वे बिजली के लिए
जंगल साफ़ कर सकते हैं
और ख़ुशी ख़ुशी देख सकते हैं
लोगों को उजड़ते
वे अपनी जिंदगी से इतना प्यार करते हैं
कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता है
बुलडोज़र घर गिराता है
या पहाड़
उन्हें जरा भी बुरा नहीं लगता
अगर स्त्रियां कराहती हैं
या नदियां अपमानित होती हैं
वे तटस्थ हैं
स्त्रियों और प्रकृति
-दोनों के प्रति
जो उन्हें रचती है
भगवान से कितना डरते हैं वे !
लेकिन इसका नाम बदलते ही
वहशी हो जाते हैं
वे मारने लगते हैं लोगों को,
ढहाने लगते हैं पूजास्थलों को
कितने खुदगर्ज़ हैं वे !
अपनी इमारतों, मोटर गाड़ियों के लिए
उन्हें मंजूर है
शहरों का गैस चैम्बर बन जाना
जहाँ उनकी ही सांस उखड़ रही है .
मुझे नामंजूर है
उनका भोलापन
और शामिल होना
अपने ही खिलाफ हो रही साजिश में
मैं नहीं देख सकता चुपचाप
उनका शामिल होना
उस साज़िश में
जो रोज़ रची जा रही है
सुन्दर दुनिया को सपने को तबाह करने के लिए
अक्षम्य है उनका अपराध
कि वे बर्दाश्त करते हैं
ऐसे हुक्मरान को
जिसकी धूर्तता को
वे आसानी से पहचान सकते हैं
मैं कैसे स्वीकार कर लूँ
उनका यह भोलापन
कि उस फैलते लोकतंत्र को
सौंप दिया जाय लम्पटों के हाथ
जिसे हासिल किया है
हमारे पुरखों ने
फांसी के फंदे को चूम कर.
धिक्कारता हूँ मैं
उनके भोलेपन को !
अनिल सिन्हा




