शशिकांत गुप्ते इंदौर
एक म्यान में दो तलवार एक साथ नहीं रहतीं है।इस कहावत को राजनेता, ग़लत साबित कर करने के लिए प्रयत्नशील है।इनदिनों राजनेता, राजनीति को बच्चों के खेल की तरह खेल रहें हैं।बच्चों की तरह आज किसी से कट्टी तो कल उसी से पुनः दोस्ती की जाती है। राजनीति में दोस्ती और कट्टी की बचकानी हरकत का सिलसिला चल पड़ा है।समाचार माध्यमों के लिए यह खुराक मिल गई है।टी.आर.पी. बढाने के चक्कर में कुछ समाचार माध्यम भी ऐसे बचकाने खेल में शरीक हो जातें है।समाचार माध्यमों में इसी तरह की चर्चा शुरू हो जाती है।आज कौन कहाँ जा रहा है?कौन कहाँ घुसपैठ कर रहा है? सियासत में कौन सा दल बिखर रहा है? कौन से दल में तोड़फोड़ हो रही है?कौन सा दल टूटफुट रहा है?कौन सा दल बिखर रहा है? पता नहीं हर किसी को कीचड़ से इतना मोह क्यों पैदा हो रहा है?
ज्यादा कीचड़ दलदल में तब्दील होता है।दलदल में गिरने से दम घुटता है।यह जानतें हुए भी कीचड़ में जाने के लिए इतने लालायित क्यों हैं?राजनीति कबड्डी का खेल हो गई है।बहुत से लोग एक दुसरें की टांग खींचने में माहिर है?बहुत से दूसरों के पाले में जाकर हू तू तू तू …. करतें हुए कितने ही विरोधियों को छूकर छुआ छूत मिटाकर, अपने पाले में लाने में सफल होतें हैं?इस खेल में घेर कर दबोचने भी बहुत से लोग माहिर होतें हैं।सियासदान, जिस विरोधी दल का घोर विरोध करते हुए थकते नहीं हैं।उसी दल के लोगों से गलबहियां करने में कोई परहेज नहीं करतें हैं।सत्ता का सुख भोगने के लिए राजनीति की उपजाऊ जमीन की तलाश में कोई स्वयं के जमीर को रहन रख रहा है, तो कोई सीधे बेंच रहा है।आजकल जमीन और ज़मीर की की सौदे बाजी धड़ल्ले से हो रही है।
पलक छपकते ही मात्र दो मिनिट में जमीनों का सौदा बगैर जोड़,घटाओ के सीधे गुणनफल में परिवर्तित हो रहा है।यह जादूई करिश्मा खाऊंगा न खाने दूंगा के स्लोगन को बार बार याद दिला रहा है।सौदे की रकम में गणित का भाग देकर कितने भागों में बटेगा यह कहावत वाले “मौसेरे भाइयों” की मेहनत लगन और *ईमानदारी* के अनुपात पर निर्भर है।ज़मीर के सौदे बाजी में मध्यस्थता होती है या नहीं?इस प्रश्न का उत्तर सम्भवतः सौदे पर निर्भर होता होगा।जमीन की सौदे बाजी में जो मध्यस्थ होतें हैं,उन्हें ब्रोकर या दलाल कहने का प्रचलन है।ज़मीर का सौदा,शर्म की तिलांजलि देकर स्वेच्छा से स्वस्फूर्त किया जाता है।वैसे तो ज़मीर की सौदे बाजी करने वाले गंजे को कंगा बेंचने वाली कहावत को चरितार्थ करतें हैं। यदि इनलोगों के पास ज़मीर होता तो ये लोग जमीर की सौदे बाजी जैसे अमानवीय कृत्य को करने में शर्म महसूस करते?
यह सत्ता केंद्रित राजनीति का परिणाम है।उपर्युक्त राजनीति का प्रचलन दार्शनिक अंदाज में हो रहा है।*कोई किसी का नहीं हैं**झूठे नाते है नातों का क्या।*उक्त दार्शनिक महत्व को समझते हुए एकदम प्रैक्टिकल निर्णय लेतें हुए बगैर किसी भेद भाव के इधर से उधर हो जातें है।इधर से उधर होने में जो भावताव होता है, वह एक गुड़ रहस्य है?राजनैतिक दल आंगतुक का वज़न देखकर तोल मोल कर उसपर सत्ता या संगठन के पद का भार डालतें हैं।बहुत से लोगों के आगे विभिन्न प्रस्तावों के गाजर लटका दिए जातें हैं।राजनीति, जब तक भीड़तंत्र के गिरफ्त में रहेगी तबतक दोस्ती और कट्टी का यह बचकाना खेल चलता रहेगा।
शशिकांत गुप्ते इंदौर





