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*असम के 299 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट में बनेगा हथियारों का ‘पाताल लोक’*

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नई दिल्ली: भारत की पूर्वोत्तर सीमाओं पर पहले हालात काफी नाजुक हुआ करते थे. लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने कई पहले की हैं. पूर्वोत्तर मौजूदा भू-रणनीतिक माहौल को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है. असम के घने जंगलों में एक टनल-आधारित अंडरग्राउंड हथियार भंडारण केंद्र (underground weapon storage facility) बनाने के लिए 299 हेक्टेयर रिजर्व फॉरेस्ट को डाइवर्ट करने की इन-प्रिंसिपल मंजूरी दी गई है. इस प्रोजेक्ट का सीधा संबंध उस बेहद संवेदनशील इलाके से है जिसे सामरिक भाषा में ‘चिकन नेक’ कहा जाता है. यह वह संकीर्ण गलियारा है जो पूर्वोत्तर भारत को पूरे देश से जोड़ता है और जिस पर किसी भी दुश्मन की नजर गंभीर खतरा बन सकती है.

सरकार ने साफ कहा है कि यह प्रोजेक्ट पूर्वी क्षेत्र में बदलते भूराजनीतिक माहौल और उससे जुड़ी अस्थिरता की वजह से अत्यधिक रणनीतिक महत्व रखता है. यानी पूर्वोत्तर में सेना की तेज प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाने के लिए अंडरग्राउंड स्तर पर ऐसा सुरक्षित भंडारण नेटवर्क बेहद जरूरी हो गया है. एयर फोर्स स्टेशन दिगारू द्वारा प्रस्तावित यह स्टोरेज सिस्टम भविष्य में चीन बॉर्डर और पूर्वी सेक्टर में भारत की सैन्य तैयारी को नई मजबूती देगा.

सोनैकुची रिजर्व फॉरेस्ट, मोरीगांव जिले के भीतर यह प्रोजेक्ट 299 हेक्टेयर क्षेत्र में बनना है. इसमें 265.513 हेक्टेयर अंडरग्राउंड हथियार भंडारण और 33.688 हेक्टेयर सतही ढांचे जैसे प्रशासनिक इमारतें, गार्ड पोस्ट, फेंसिंग, ऐप्रोच रोड आदि शामिल होंगे. पूरा इलाका किसी भी संरक्षित वन्यजीव क्षेत्र या हेरिटेज साइट से 10 किमी दूर है और 203 पेड़ काटे जाने का अनुमान है. मंत्रालय की बैठक के मिनट्स में साफ लिखा गया है कि इस प्रोजेक्ट का मकसद पूर्वोत्तर में तैनाती की गति और सुरक्षा दोनों को बढ़ाना है.

राज्य सरकार ने बताया कि 85.75 हेक्टेयर जमीन पर कटे पेड़ों की भरपाई के लिए नए पेड़ लगाए जाएंगे. (फोटो AI)

क्यों जरूरी है ‘पाताल लोक’ जैसा यह सैन्य ढांचा?

समिति को दी गई जानकारी के मुताबिक, अंडरग्राउंड हथियार भंडारण से-

यानी यह प्रोजेक्ट सिर्फ सैन्य संरचना नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारत की दीर्घकालिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है.

कैसे होगा निर्माण?

राज्य सरकार ने बताया कि 85.75 हेक्टेयर जमीन पर कटे पेड़ों की भरपाई के लिए नए पेड़ लगाए जाएंगे. इसमें 68 हेक्टेयर क्षेत्र को पौधारोपण के लिए उपयुक्त माना गया है और इसके लिए 10 साल की मेंटेनेंस योजना तैयार की गई है. निरीक्षण में कुछ जगह कच्चे रास्ते और खेती के निशान मिले. लेकिन राज्य ने स्पष्ट किया कि ये सिर्फ फॉरेस्ट पेट्रोल रूट हैं और किसी भी अवैध कब्जे को हटाया जाएगा.

मंत्रालय ने कौन-कौन सी शर्तें लगाईं?

समिति ने कहा कि-

  1. एक व्यापक वन्यजीव संरक्षण योजना बनाई जाए.
  2. मानव–हाथी संघर्ष रोकने के विशेष उपाय हों.
  3. प्राकृतिक जलाशयों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए.
  4. जरूरत होने पर वैकल्पिक जलाशय तैयार किए जाएं.
  5. वन्यजीवों की आवाजाही किसी भी हालत में बाधित न हो.

इसके साथ ही एक मंज़ूरशुदा मलबा निपटान योजना भी जरूरी की गई है, ताकि खुदाई से निकलने वाला मलबा वैज्ञानिक तरीके से डाला जाए और भू-संरचनात्मक खतरे न बढ़ें.

यह प्रोजेक्ट भारत के लिए क्यों गेम चेंजर है?

पूर्वोत्तर में बढ़ते तनाव, सीमा पर चीन की गतिविधियों और इंडो-पैसिफिक की अनिश्चितता के बीच भारत को अपनी वास्तविक सैन्य प्रतिक्रिया क्षमता मजबूत करनी ही थी. यह नया अंडरग्राउंड स्टोरेज-

यही कारण है कि इसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का एक अहम स्तंभ माना जा रहा है.

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