नई दिल्ली इस्लाम में भेदभाव और कट्टरता के निगेटिव पहलू की शिकायत करने और इस धर्म को छोड़ने की ख्वाहिश रखने वालों के लिए केरल में एक संस्था ‘एक्स मुस्लिम ऑफ केरल’ सामने आई है। संस्था का मानना है कि दुनियाभर में लोग इस्लाम की खामियों को देखते हुए इससे दूरी बना रहे हैं। इसमें बड़ी आबादी भारत में भी है, लेकिन तमाम खतरों को देखते हुए लोग खुलकर सामने नहीं आ पाते। केरल में करीब 2000 लोग इस्लाम छोड़ चुके हैं। पूरे देश में ये ख्वाहिश रखने वालों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
इस्लाम छोड़कर छिपाते क्यों हैं लोग
डॉ. आरिफ कहते हैं, ‘लोग इसलिए अपनी पहचान छिपा कर रखते हैं क्योंकि सोसायटी ऐसे लोगों को काफिर (नास्तिक) और अनैतिक करार दे देती है। यही नहीं, उस शख्स का बहिष्कार किया जाता है। प्रॉपर्टी समेत तमाम तरह के अधिकार उससे छीन लिए जाते हैं। परिवार उसे छोड़ देता है। उसे तरह-तरह से प्रताड़ना दी जाती है। शारीरिक, सामाजिक और मानसिक हर तरह का अत्याचार किया जाता है।’
मैंने इस्लाम इसलिए छोड़ा
लोगों का इस्लाम से मोहभंग क्यों हो रहा है? डॉक्टर थेरूवथ कहते हैं, ‘मैंने दो वजहों से इस्लाम छोड़ा। पहला, इस्लाम में दासता स्वीकार की जाती है और दूसरा, औरतों के साथ बेहद क्रूर रवैया अपनाया जाता है। उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। हालांकि, उनके इस्लाम छोड़ने की वजह से उनकी पत्नी और परिवार ने उनसे नाता तोड़ लिया।
केरल के बाद तमिलनाडु, फिर पूरे देश में मुहिम
संगठन के प्रेसिडेंट दावा करते हैं कि केरल में यह संस्था पहली बार खुलकर सामने आई है, लेकिन काम करीब 10 साल से चल रहा है। वैसे ही पूरे भारत में भी ‘एक्स मुस्लिम ऑफ इंडिया’ नाम से यह संस्था चल रही है। हालांकि, यह संगठन छिप-छिपाकर काम करता आया रहा है। पर जल्द ही केरल की तरह पूरे भारत में इस संगठन को पहचान के साथ सामने लाया जाएगा।
फिलहाल तमिलनाडु में इस संगठन के रजिस्ट्रेशन का काम जल्द ही पूरा किया जाएगा। डॉ. आरिफ कहते हैं कि वैसे तो हर धर्म नास्तिक समुदाय के साथ भेदभाव करता है, लेकिन इस्लाम इस मामले में कट्टर है। जो लोग इस्लाम छोड़ देते हैं लोग उनके साथ जानवरों से बदतर व्यवहार करते हैं।
तीन मकसद पर काम करता है संगठन
संगठन के तीन मकसद हैं, पहला कुरान में दर्ज बातों को डिकोड कर सबके सामने लाना। दूसरा, पैगंबर मोहम्मद को एक्सपोज करना। तीसरा, जो लोग इस्लाम छोड़ देते हैं। उन्हें मदद करना। ऐसे लोगों पर सामाजिक, आर्थिक और इमोशनल अत्याचार किया जाता है। हम उन्हें एक कम्यूनिटी मुहैया करवाने के साथ कानूनी मामलों में मदद करते हैं।
वे एक उदाहरण देकर समझाते हैं- जैसे कुरान के चैप्टर 4 की 34वें वर्स में एक सवाल पूछा गया है कि अल्लाह ने औरत और आदमी दोनों को बनाया। पति का पत्नी को पीटना क्या जायज है? जवाब मिलता है, उसे बेहतर औरत बनाने के लिए ऐसा करना जायज है। ऐसे ही कुरान में औरतों के खिलाफ बातें लिखी गई हैं। हम उन सभी को लिटरेचर के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने का काम करते हैं। दरअसल, आम मुस्लिम तो इन सबके बारे में ठीक से जानता भी नहीं।
इस्लाम में पैगंबर मोहम्मद की बातों को पत्थर की लकीर मानते हैं, लेकिन उनके अपने कैरेक्टर पर ही सवाल हैं। प्रोफेट के कैरेक्टर को हमारा संगठन एक्सपोज करने का काम करता है।
इस्लाम के खिलाफ प्रोपेगैंडा भी बहुत है: शाइस्ता अंबर
एक्स मुस्लिम ऑफ केरल पर इस्लामिक स्कॉलर और मुस्लिम वुमेन पर्सनल बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर कहती हैं, ‘नास्तिक होना या आस्तिक होना अपना निजी मामला है। सभी धर्मों में ऐसे लोग हैं। डिबेट के लिए मंच तैयार होने चाहिए, जहां इस्लाम के जानकार और उसे गलत कहने वालों के बीच डिबेट हो, लेकिन इस्लाम को कट्टर और औरतों के खिलाफ कहना प्रोपेगेंडा के सिवाय कुछ नहीं है।
केरल की आयशा ने बताया, इसलिए छोड़ा इस्लाम
केरल की रहनेवाली आयशा ने पैगंबर मोहम्मद की ऑटोबायोग्राफी पढ़ी और उसमें स्लेवरी और औरतों को लेकर दिए गए हुक्म आयशा को भेदभाव से भरे लगे। आयशा ने यह सब देखकर तय कर लिया कि उन्हें इस्लाम छोड़ देना चाहिए। इस ऊहापोह में वह 10 साल तक परेशान रहीं। अहमदिया सेक्शन से ताल्लुक रखने वाली आयशा ने आखिरकार पिछले साल दिसंबर में मस्जिद में जाकर खुलेआम इस्लाम छोड़ने का ऐलान कर दिया। घरवालों ने सवाल पूछकर परेशान करना शुरू कर दिया। मुझ पर दबाव डाला जाने लगा कि मैं इस्लाम पर सवाल न करूं, क्योंकि इसका हक अल्लाह ने किसी को नहीं दिया है।
ये पूछने पर कि क्या आपके घर वाले आपसे संपर्क रखते हैं? सोसायटी कैसे ट्रीट करती है? आयशा कहती हैं कि बातचीत तो होती है, पर अब पहले जैसा सब कुछ तो नहीं है। मैं दिल्ली में हूं तो वहां की सोसायटी से बहुत ज्यादा मेरा वास्ता नहीं।

