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आदित्य बिडला की एस्सेल कंपनी का हीरा खनन का ठेका रद्द करों

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आज देश और मध्य प्रदेश भी ऑक्सीजन के बिना मृत्यु पाये कोरोनाग्रस्त मरीजों की स्थिति कितनी दर्दनाक है, इसका गवाह है| सालों से और पिछले एक साल में भी ऑक्सीजन पूर्ति की व्यवस्था नहीं की गई| केवल इंडस्ट्री में ही लगे प्लांटस! ऐसी स्थिति में ऑक्सीजन का स्त्रोत तो हवा है और पेड़-पौधे ही नहीं जंगल! लेकिन इस मुफ्त में बने रहे स्त्रोतों का विनाश करने वाली मनुष्य जाति, अब महंगे प्लांटस और concentrators से बड़ा खर्च शासन और समाज पर गिरना भुगत रही है| इन सभी तकनीकी उपायों में भी ऑक्सीजन याने प्राणवायू तो प्रकृति से ही आता है…. जिसके लिए जंगल, पेड़ कटाई से बचाना और बढ़ाना जरूरी है वैसे ही हवा को प्रदूषण से बचाना!              लेकिन एक ओर आज ऑक्सीजन की पुर्तता न हो पाने से मरीज और परिवार त्रस्त है, मृत भी हो रहे है…..

शासन ने 90000 में. टन ऑक्सीजन बेचने का अधर्मी कृत्य करने के बाद, एक साल निष्क्रिय रहने के बाद अब करोड़ों के पूंजीनिवेश की खोज है| उसमें भी देर से सुध लेकर भी प्राथमिकताएँ बदलने की निश्चिती नहीं है – कही पुतले बना दिये और 20000 करोड़ रु. का गैरजरूरी संसद भवन बना रहे है| खैर……   

       सबसे गंभीर बात है कि इतनी अतिगंभीर परिस्थिति में भी म.प्र. शासन से 382 हेक्टर्स क्षेत्र का आदिवासियों से ही बचाया गया उपयोग में निरंतरता के साथ लिया जा रहा, छतरपुर जिले का बकस्वाहा का जंगल, हजारों-लाखो पेड़ काटकर बरबाद किया जा रहा है|

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