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ममदानी की इस जीत के बाद मुंबई में मेयर की शक्तियां फिर चर्चा में, क्या मुंबई में भी होना चाहिए न्यूयॉर्क जैसा मेयर?

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जोहरान ममदानी का नाम दुनियाभर में सुर्खियों में है. न्यूयॉर्क सिटी का मेयर चुनाव जीतकर उन्होंने इतिहास रच दिया है. वह इस पद पर पहुंचने वाले पहले मुस्लिम और भारतीय मूल के व्यक्ति बन गए हैं. ममदानी की इस जीत की दुनिया भर में चर्चा हो रही है. भला हो भी क्यों न… न्यूयॉर्क के मेयर के पास ताकत ही इतनी बेशुमार होती है. एक तरह से शहर का पूरा कर्ता-धर्ता वहीं होता है. ममदानी अब 112 अरब डॉलर का बजट और 3 लाख कर्मचारियों की कमान संभालेंगे. शहर के सारे बड़े फैसले उन्हीं के दफ्तर से लिए जाएंगे.

जोहरान ममदानीकी इस जीत के बाद मुंबई में एक बार फिर एक पुराना सवाल चर्चा में है… सवाल यह कि क्या मुंबई का मेयर भी अगर वाकई ताकतवर हो, तो वह इस शहर की हालत सुधार सकता है?

मुंबई में कैसी परेशानी?

मुंबई की आबादी 1.2 करोड़ से ज्यादा है. यहां बीएमसी, एमएमआरडीए, म्हाडा, एसआरए, मेट्रो रेल कॉरपोरेशन, रेलवे, एयरपोर्ट अथॉरिटी और पोर्ट ट्रस्ट जैसी कई एजेंसियां काम करती हैं. लेकिन इन सभी में तालमेल की कमी है. इसका असर यह होता है कि कामों में देरी होती है, पैसे बर्बाद होते हैं और जवाबदेही कहीं दिखती नहीं.

अभी मुंबई का मेयर एक औपचारिक पद है. इसका कार्यकाल सिर्फ ढाई साल का होता है. मेयर को सीधे जनता नहीं चुनती, बल्कि नगरसेवक यानी कॉरपोरेटर्स आपस में चुनाव करते हैं. जिस पार्टी के पास बहुमत होता है, उसी का उम्मीदवार मेयर बनता है. मेयर सिर्फ बीएमसी की बैठकों की अध्यक्षता करता है, जबकि सारे असली अधिकार महानगरपालिका आयुक्त के पास रहते हैं.

दूसरी तरफ, न्यूयॉर्क सिटी का मेयर बहुत ताकतवर होता है. यूनिवर्सिटी ऑफ माउंट सेंट विंसेंट के प्रोफेसर जेसी पोलांको के अनुसार, ‘न्यूयॉर्क के मेयर के पास 3 लाख से ज्यादा कर्मचारियों की टीम, 120 अरब डॉलर का बजट और 1.3 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी है… जो कई देशों से ज्यादा है.’
मेयर की ताकत पर बंट गए मुंबई के नेता
शिवसेना सांसद मिलिंद देवड़ा का कहना है कि मुंबई को भी एक ‘सशक्त और जिम्मेदार मेयर’ की जरूरत है. टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘मैं सीधे जनता द्वारा चुने जाने वाले मेयर के पक्ष में हूं, ताकि वह शहर की अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल बैठा सके और सीधे जनता के प्रति जवाबदेह हो.’
दूसरी तरफ बीजेपी नेता अमित साटम का कहना है कि मेयर के पास पहले से ही कई अधिकार हैं, क्योंकि सारे प्रस्ताव मेयर की अध्यक्षता वाली बीएमसी की आमसभा में ही पास होते हैं. वहीं शिवसेना-यूबीटी नेता आदित्य ठाकरे का कहना है, ‘मेयर को ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए और बीएमसी को ज्यादा स्वतंत्रता दी जानी चाहिए. सबसे जरूरी है कि चुनाव निष्पक्ष हों- एक व्यक्ति, एक वोट.’
मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष वर्षा गायकवाड़ कहती हैं, ‘शहर की इस गड़बड़ी से सिर्फ एक सीधे चुना गया और सशक्त मेयर ही हमें निकाल सकता है. अभी फैसले कई एजेंसियों में बंटे हैं और कोई तालमेल नहीं है. मुंबई को एक ऐसा मेयर चाहिए जो शहर का सीईओ बनकर काम करे.’ वहीं, मनसे नेता संदीप देशपांडे ने कहा, ‘जब पहले ‘मेयर-इन-काउंसिल’ सिस्टम में मेयर को ज्यादा अधिकार दिए गए थे, तब भ्रष्टाचार बढ़ा और शहर को नुकसान हुआ.’
कभी मुंबई में भी होता था ताकतवर मेयर
दरअसल, मुंबई में शक्तिशाली मेयर का प्रयोग 25 साल पहले किया गया था, जो असफल रहा. 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने बीएमसी की ताकत मेयर को देने का फैसला किया. 1998 में शिवसेना के नंदू साटम पहले ऐसे मेयर बने, जिन्हें असल मायनों में अधिकार मिले. लेकिन कुछ ही हफ्तों में गड़बड़ी और झगड़े शुरू हो गए. ठेकों को लेकर विवाद बढ़े, अफसर जिम्मेदारी से बचने लगे और सिस्टम बिगड़ गया. आखिरकार 1999 में मुख्यमंत्री नारायण राणे ने इस व्यवस्था को खत्म कर दिया.

अब, जब न्यूयॉर्क में दक्षिण एशियाई मूल के जोहरान ममदानी ने शहर की कमान संभाली है, तो मुंबई में फिर से बहस शुरू हो गई है. क्या भारत की आर्थिक राजधानी को भी एक ऐसे मेयर की जरूरत है जो शहर को सीईओ की तरह चला सके और वाकई बदलाव ला सके? आप क्या कहते हैं…

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