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पवार के बाद फारुख अब्दुल्ला का भी संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार बनने से इनकार 

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एस पी मित्तल, अजमेर

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चाहती हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दी जाए। ममता की यह चाहत तब है, जब विपक्ष एकजुट नहीं है और पीएम मोदी के पास अपना उम्मीदवार जीतवाने के लिए पर्याप्त वोट हैं। लेकिन इसे ममता बनर्जी का राजनीतिक अहम (घमंड) ही कहा जाएगा कि संयुक्त विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा करने की जिद पर अड़ी है। ममता ने अब तक एनसीपी के प्रमुख शरद पवार और नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला के समक्ष उम्मीदवार बनने का प्रस्ताव रखा, लेकिन इन दोनों ने ही राष्ट्रपति पद का चुनाव लडऩे से इनकार कर दिया। नामांकन की अंतिम तिथि 29 जून है। देखना है, जब तक ममता बनर्जी और कितने नेताओं के समक्ष उम्मीदवार बनने का प्रस्ताव रखती हैं। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी का प्रयास है कि राष्ट्रपति का चुनाव निर्विरोध हो। इसलिए विपक्षी नेताओं से संपर्क करने के लिए केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई है। लेकिन पीएम मोदी चाहें जितने सकारात्मक प्रयास कर लें, लेकिन ममता बनर्जी उम्मीदवार खड़ा ही करेंगी। यदि कोई राजनेता तैयार नहीं हुआ तो महात्मा गांधी के रिश्तेदार गोपाल कृष्ण गांधी को ही उम्मीदवार बना दिया जाएगा। हालांकि ममता की इस दि से कई विपक्षी दल अलग हो गए हैं। राज्य में सत्तारूढ़ विपक्षी दल नहीं चाहते कि ममता बनर्जी की तरह केंद्र सरकार से झगड़ा किया जाए। यही वजह है कि कई विपक्षी दल  राष्ट्रपति चुनाव के मद्देनजर सीधे प्रधानमंत्री से संपर्क में है। असल में तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतने के बाद ममता बनर्जी का घमंड आसमान पर है। इस घमंड के कारण ही वे देश के प्रधानमंत्री पद को भी अपमानित करने से बाज नहीं आती हैं। देश के संघीय ढांचे में राज्यपाल की संबंधित प्रदेश के विश्वविद्यालयों के चांसलर होते हैं। विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलरों की नियुक्ति चांसलर की हैसियत से राज्यपाल ही करते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता ने चांसलर के अधिकार राज्यपाल जगदीप धनखड़ से छीन कर स्वयं ले लिए हैं। ममता बनर्जी पहली मुख्यमंत्री होंगी जो अपने प्रदेश के विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलर नियुक्त करेंगी। 

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