‘23 मई, 1987 का दिन था। तीन दिन बाद छोटे भाई यूनुस की शादी थी। मुझे शादी के कार्ड बांटने थे, सुबह-सुबह ही गांव से निकल गया। पत्नी अपने मायके गाजियाबाद गई थी। सोचा लौटते हुए उसे भी साथ ले आऊंगा। मैं गाजियाबाद में था, शाम को निकलने वाले एक अखबार में छपा था, मलियाना में मुसलमानों को मार दिया। खबर में नाम नहीं थे, बस लिखा था कि 11 लोग एक ही परिवार के थे। खबर पढ़कर हाथ-पैर कांप रहे थे। घर लौटा तो पता चला, वो मेरा ही परिवार था।’
62 साल के इस्माइल खान 36 साल पुरानी इस कहानी को सुनाते हुए आज भी कांपने लगते हैं। मलियाना में जिन 72 मुस्लिमों का कत्ल हुआ उनमें इस्माइल के दादा मोहम्मद अली, पिता अब्दुल सत्तार, मां असगरी बेगम, तीन भाई इब्राहिम, यूसुफ और यूनुस, चार बहनें नूरबानो, नूरजहां, शबनम और मुन्नी, एक ममेरी बहन (जयबुनीश) भी थे।
31 मार्च, 2023 को मलियाना नरसंहार के 36 साल बाद मेरठ की लोअर कोर्ट ने इस केस में सभी 41 आरोपियों को बरी कर दिया है। करीब 800 सुनवाई के बाद ये फैसला आया। मलियाना में अब भी कई लोग हैं, जिनके शरीर पर उस दिन चलीं गोलियों के निशान हैं। जिन्होंने अपने बच्चों और बुजुर्गों को मरते देखा, घरों को जलते देखा। इन लोगों का सवाल है, अगर सभी आरोपी बेगुनाह थे, तो उस दिन 72 लोगों को किसने मारा, हमारे घर किसने जलाए थे…
उस दिन क्या हुआ था, ये जानने मैं दिल्ली से करीब 90 किमी दूर मलियाना पहुंचा। 7 किरदारों से पूरी कहानी सुनी। इनमें वकील अहमद और रईस अहमद हैं, जिन्हें उस दिन गोलियां लगी थीं। इस्माइल, जिनके पूरे परिवार को मार दिया गया। एक महिला मुन्नी, जिनके बच्चे को जलाकर मार दिया गया, FIR कराने वाले याकूब अली और दो पत्रकार कुरबान अली और सलीम अख्तर, जिन्होंने सब कुछ बहुत करीब से देखा।
वकील अहमद: दो गोलियां लगीं, एक किडनी के सहारे 36 साल से जी रहे
मलियाना पहले गांव हुआ करता था, अब मेरठ शहर का हिस्सा है। मैं यहां पहुंचा तो गांव के चौक पर कुछ बुजुर्ग बैठे मिले। अखबार पढ़ रहे जलीसुद्दीन से पूछा, 1987 वाली घटना के पीड़ितों से मिलना है। वे कहां रहते हैं? जलीसुद्दीन मुझे सीधे वकील अहमद की दुकान पर ले गए। 61 साल के वकील इस मामले में गवाह भी हैं।
मैं उनके पास पहुंचा, तब वे फोन पर किसी से बात कर रहे थे, ‘हफ्ते में कई बार अपने जख्मों को खोल-खोल कर दिखा रहा हूं। जितनी बार दिखाता हूं, वो फिर से 36 साल पहले के दर्द की याद दिलाते हैं।’
उस घटना में वकील अहमद को दो गोलियां लगी थीं। एक बाएं हाथ पर लगी और पार हो गई। दूसरी गोली कमर पर लगी और किडनी को चीरती हुई निकल गई। 36 साल से वकील सिर्फ एक किडनी के सहारे जी रहे हैं।
वकील बताते हैं, ‘मलियाना में 1987 को जो हुआ वो दंगा नहीं था, दो समुदायों के बीच लड़ाई नहीं थी। इससे पहले यहां हिंदू-मुस्लिम दंगा नहीं हुआ था। उस दिन कुछ लोगों ने दलित बस्ती में जाकर अफवाह फैलाई और भीड़ को उकसाया। मैंने खुद देखा कि 23 मई की सुबह करीब 10.30 बजे UP पुलिस की PAC ने पास का ही एक शराब ठेका लुटवाया। सारी शराब मलियाना की दलित बस्ती में बंटवा दी।’
‘दोपहर में दलित बस्ती की भीड़ और साथ में PAC के जवान मुस्लिम मोहल्लों में घुस गए। उन्होंने जवान मुस्लिम बच्चों को पकड़ लिया, घरों में घुसकर तलाशी लेने लगे, लूटमार भी मचाई। लोगों ने विरोध किया तो पहले लाठियां चलाईं, फिर फायरिंग करने लगे। PAC के सौ-डेढ़ सौ जवान थे, भीड़ की तादाद करीब तीन हजार रही होगी।’
इस्माइल खान: पूरा परिवार खत्म हुआ, उन्हें दफन भी नहीं कर सके
दंगे में पूरा परिवार खोने वाले इस्माइल उस दिन गाजियाबाद में एक रिश्तेदार के घर थे। जब लौटे तो पता चला कि परिवार के 11 लोग मार दिए गए हैं। मारकर उनकी लाशें कुएं में फेंक दी गई थीं। इस्माइल बताते हैं, ‘घटना के दूसरे दिन मैं गांव गया, लेकिन कर्फ्यू लगा था। फौज वालों ने कहा कि कर्फ्यू हटने तक तक आप अंदर नहीं जा सकते।’
‘मेरे परिवार को जिस तरीके से मारा गया, वो सोचकर आज भी नींद नहीं आती। पहले उन्हें हथियारों से मारा, घर में कुआं था, उसमें लाशें डालकर पेट्रोल डाला और आग लगा दी। बदबू न आए इसलिए कुएं में कई बोरी नमक भी डाला। मेरे जाने से पहले ही गांव के लोगों ने परिवार को दफना दिया था।’
इस घटना के बाद इस्माइल ने मलियाना गांव छोड़ दिया। वे अब गाजियाबाद में रहते हैं। उनके पास परिवार की यादों के नाम पर सिर्फ एक अटैची है। इसी में अखबारों की कतरनें, परिवार की पुरानी तस्वीरें और कोर्ट-कचहरी के कागज भरे हैं।
मोहम्मद याकूब: जिनकी तहरीर पर FIR दर्ज हुई, 36 साल केस चला
मोहम्मद याकूब अभी 66 साल के हैं। मलियाना नरसंहार के वक्त वे 30 साल के थे। उन्होंने ही सबसे पहले पुलिस को तहरीर दी थी, जिस पर FIR दर्ज की गई। इसी FIR पर 36 साल केस चला। याकूब उस दिन के बारे में बताते हैं, ‘दोपहर के 2 बजे होंगे। गांव के चारों तरफ पुलिस ही पुलिस दिख रही थी। उनके साथ दंगाई भी थे।’
‘अचानक से फायरिंग शुरू हो गई, दंगाई घर लूटने लगे, आग लगाने लगे। मैं बचने के लिए भागा, लेकिन पुलिस ने पकड़ लिया। मेरे हाथ-पैर बांध दिए और साथ ले गए। हम 6 लड़के थे, सभी को खूब पीटा। गांव में चारों तरफ आग लगी थी, धुआं उठ रहा था। दंगाइयों ने घरों में आग लगाकर बाहर से कुंडी लगा दी। 85 साल के बूढ़े से लेकर छोटे-छोटे बच्चों को आग में फेंक दिया।’
मुन्नी: जिनके 4 साल के बच्चे को आग में फेंक दिया
मलियाना में किराने की दुकान पर मुझे मुन्नी नाम की महिला मिलीं। उम्र करीब 70 साल होगी। मुन्नी के छोटे बेटे की भी उस दिन मौत हो गई थी। मुन्नी उसे याद करते हुए कहती हैं, ‘मेरा नौशाद 4-5 साल का ही था। दोपहर में अचानक शोर होने लगा। हमारे घरों में आग लगा दी। सामने से गोलियां चल रही थीं। हम घर में छिप गए। नौशाद चौक की तरफ भाग गया था। उसकी जली लाश मिली।’
रईस अहमद: छत से झांककर देख रहे थे, चेहरे पर गोली लगी
बुजुर्ग हो चुके रईस अहमद के चेहरे पर घाव का निशान साफ दिखाई देता है। ये घाव गोली से हुआ था। रईस बताते हैं कि ‘जब शोर हुआ, तो मैं छत से झांककर देखने लगा। वो मंजर ऐसा था, ऊपर वाला दोबारा न दिखाए। तभी एक गोली मुझे लगी, मैं पीछे की तरफ गिर गया। मैंने जेब से रूमाल निकाला और मुंह पर लगा लिया।’
‘हमारे यहां एक लड़का कौसर काम करता था, उसके हाथ पर गोली लगी। उसे सही इलाज नहीं मिला, इसलिए हाथ काटना पड़ा। मेरे पिता मोहम्मद यामीन रेलवे स्टेशन से गांव की ओर आ रहे थे। रास्ते में ही उन्हें मार दिया।’
आरोपी कैसे बरी हो गए, इस सवाल पर रईस कहते हैं कि कुछ तो हमारे वकीलों की ढील रही, कुछ पुलिस और सरकार की भी।
कुरबान अली: पत्रकार, जिन्होंने 3 महीने मेरठ दंगे कवर किए
मलियाना नरसंहार से करीब एक महीने पहले (अप्रैल, 1987) में मेरठ में दंगे शुरू हुए। ये दंगे तीन महीने तक चले। पत्रकार कुरबान अली ने मेरठ दंगा और मलियाना नरसंहार कवर किया था। वे कहते हैं, ‘ये कभी न भुलाई जाने वाली यादें हैं, जिसमें स्टेट का डरावना चेहरा दिखाई दिया। 19 मई की रात से मेरठ दंगे खतरनाक हो गए थे।’
‘हाशिमपुरा, कैचियान, इमलियान के आसपास कई मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया। PAC ने 42 लोगों को हिंडन नदी के किनारे ले जाकर मार दिया। इसमें से 3-4 लोग जिंदा बच गए, जिनकी गवाही के आधार पर आरोपियों को पकड़ा गया और दोषी आज तिहाड़ जेल में सजा काट रहे हैं। करीब 12 लोगों की कस्टडी में रहते हुए मौत हो गई।’
कुरबान बताते हैं कि ‘दंगों के दौरान सबसे बड़ी घटना मलियाना में हुई थी। PAC की 44वीं बटालियन के कमांडेंट आरडी त्रिपाठी जवानों के साथ मलियाना आए थे। एक तरफ गांव के दलितों को भड़काया गया और दूसरी तरफ PAC ने कवर दिया। इस केस में FIR भी बहुत कमजोर दर्ज की गई।’
सलीम अख्तर: घटना वाले दिन गांव में मौजूद थे, सब आंखों से देखा
एक्टिविस्ट और पत्रकार सलीम अख्तर मलियाना के ही रहने वाले हैं। वे घटना वाले दिन भी मौजूद थे। सलीम बताते हैं कि ‘1987 में गांव में आने के चार रास्ते थे। मुस्लिम आबादी गांव के बीच में रहती है, चारों तरफ दलित समुदाय के लोग रहते हैं। मुस्लिम करीब 10% हैं और बाकी हिंदू समुदाय के लोग हैं।
‘उस दिन सुबह से अजीब माहौल था। ऐसी अफवाह थी कि गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लोग डरे हुए थे। दोपहर में पुलिसवाले घरों में घुस गए, मारपीट करने लगे। वे नहीं रुके तो लोगों ने भी उन पर पथराव किया। तब PAC ने सीधे गोलियां चला दीं। लोग जख्मी थे, घरों में लाशें पड़ी थीं, आग लगी हुई थी। लोग बदहवासी में भाग रहे थे।’
‘हमारे पास मलियाना कांड की कोई तस्वीर नहीं हैं। उस रात गांव में BBC के पत्रकार जसविंदर आए थे, कुछ और भी पत्रकार थे। उन्होंने फोटो ली थीं, लेकिन PAC के जवानों ने फ्लैश देख लिया। उन्होंने रील निकालकर फेंक दी। रात में PAC हटा दी गई और फौज आ गई। इसके बाद घायलों को अस्पताल पहुंचाया। जिनके घर जल गए थे, वे मदरसे में रहे।’
1987 के बाद गांव में कभी हिंदू-मुस्लिम का झगड़ा नहीं हुआ
27 साल के शहजाद का जन्म मलियाना कांड के करीब 10 साल बाद हुआ। वे कहते हैं कि ‘इतनी बड़ी घटना के बाद भी कभी हमारे अंदर बदला लेने जैसा भाव नहीं रहा। हम फिर से मिलजुल कर रहते हैं। पर इतने लोगों की जान गई, तो उन्हें मारने वालों को कम से कम सजा तो होनी चाहिए।’
बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के बाद मेरठ में दंगा भड़का
फरवरी 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खोला गया, इसके बाद मेरठ में सांप्रदायिक घटनाएं शुरू हो गईं। उस वक्त गाजियाबाद के SP रहे विभूति नारायण राय बताते हैं कि ‘इन दंगों के लिए किसी एक घटना को ढूंढना मुश्किल है। छुटपुट घटनाएं बड़ी होती जा रही थीं।’ राय ने हाशिमपुरा में हुए हत्याकांड पर SP रहते हुए PAC जवानों पर केस दर्ज किया था। वही इस केस को फैसले तक ले गए।
72 लोगों की हत्या हुई और एक भी आरोपी को सजा नहीं हुई, ऐसा कैसे हुआ, इस सवाल का जवाब अब भी नहीं है। हमने FIR से लेकर कोर्ट के आदेश की स्टडी की। प्रॉसिक्यूशन और डिफेंस दोनों पक्षों के वकीलों, केस के गवाहों से बात की। इस केस पर दूसरी रिपोर्ट में हम मामले के कानूनी पक्ष को बताएंगे और समझेंगे कि कैसे सभी आरोपी बरी हो गए।

