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आशा पारेख-फरीदा जलाल को ‘रील लीजेंड्स’ अवॉर्ड

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मुंबई में आयोजित न्यूज18 शोशा रील अवॉर्ड्स 2026 में हिंदी सिनेमा की दिग्गज एक्ट्रेसेस आशा पारेख और फरीदा जलाल को उनके लंबे और प्रभावशाली फिल्मी सफर के लिए ‘रील लीजेंड’ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. पांच दशक से ज्यादा समय तक सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाली इन दोनों कलाकारों ने कई यादगार किरदारों से दर्शकों का दिल जीता. समारोह में मौजूद सितारों और दर्शकों ने खड़े होकर तालियों के साथ उनका सम्मान किया. यह अवॉर्ड भारतीय सिनेमा में उनके अमूल्य योगदान को समर्पित है.

मोस्टअवेटेड न्यूज18 शोशा रील अवॉर्ड्स 2026 की शाम कई बड़े सितारों के नाम रही. मनोरंजन जगत की बेहतरीन कहानियों और दमदार अभिनय का जश्न मनाने के लिए आयोजित इस समारोह में हिंदी सिनेमा की दो दिग्गज एक्ट्रेसेस फरीदा जलाल और आशा पारेख को ‘रील लीजेंड’ सम्मान से नवाजा गया. इन दोनों ने न केवल भारतीय सिनेमा को प्रभावित किया है, बल्कि टेलीविजन जगत में भी अपनी अमिट छाप छोड़ी है. न्यूज18 शोशा रील अवॉर्ड्स 2026 में उन कलाकारों, फिल्ममेकर्स और क्रिएटर्स को सम्मानित किया जा रहा है, जिन्होंने अपनी कहानियों और दमदार परफॉर्मेंस से दर्शकों का दिल जीता है.

यह खास पल उस समय और भी भावुक हो गया जब पूरे हॉल ने खड़े होकर इन दिग्गज एक्ट्रेसेस का स्वागत किया. अपने अभिनय से दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाली इन दोनों एक्ट्रेसेस का सम्मान सिनेमा की विरासत को सलाम करने जैसा था.

फरीदा जलाल की पांच दशकों की दास्तां

हिंदी सिनेमा की सबसे प्रिय और सम्मानित अभिनेत्रियों में से एक फरीदा जलाल ने अपने करियर में मां, बहन और मजबूत महिला पात्रों को अद्भुत गर्मजोशी और संवेदनशीलता से जीवंत किया है. पांच दशकों से अधिक के अपने करियर में वह बॉलीवुड की सबसे भरोसेमंद करेक्टर एक्ट्रेस बनी रहीं. 1967 में फिल्म ‘तकदीर’ से डेब्यू करने वाली फरीदा जलाल ने 1970 के दशक में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर की फिल्म ‘आराधना’ से पहचान बनाई. इसके बाद उन्होंने कभी जीवंत बहन तो कभी दोस्त का किरदार निभाकर फिल्मों में गहराई भरी. 1990 के दशक में वह मां के किरदारों का पर्याय बन गईं. ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (1995) में काजोल की मां, ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘कभी खुशी कभी ग़म’ में उनकी अभिनय ने दर्शकों का दिल जीता. फरीदा जलाल ने टेलीविजन पर भी अपनी छाप छोड़ी और ‘शरारत’ जैसे धारावाहिकों में नजर आईं.

सुनहरे दौर की हसीना आशा पारेख

हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग की सबसे चमकती सितारों में से एक आशा पारेख हैं. अपने परफॉर्मेंस, ग्रेसफुल डांसिंग और करिश्माई स्क्रीन प्रेजेंस ने 1960 और 1970 के शुरुआती दशक में सिल्वर स्क्रीन पर राज किया. आशा ने चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में शुरुआत की. फिल्म ‘आसमान’ और ‘बाप बेटी’ में काम करने वाली आशा पारेख को पहली बड़ी सफलता 1959 में शम्मी कपूर के साथ फिल्म ‘दिल देके देखो’ से मिली. इसके बाद उन्होंने ‘तीसरी मंजिल’, ‘लव इन टोक्यो’, ‘आया सावन झूम के’ और ‘कटी पतंग’ जैसी सुपरहिट फिल्में दीं. एक्टिंग के अलावा उन्होंने टेलीविजन धारावाहिकों के निर्माण और निर्देशन में भी योगदान दिया. वह सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) की अध्यक्ष भी रहीं. भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2022 में प्रतिष्ठित दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

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