फिल्म को लेकर एसडीपीआई ने जताया कड़ा विरोध, राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जूरी से की पुनर्विचार की अपील
नई दिल्ली। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने 71वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में ‘द केरल स्टोरी’ को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन और छायांकन जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार दिए जाने की तीखी आलोचना की है। पार्टी ने इसे धर्मनिरपेक्ष भारत की आत्मा और सिनेमा की गरिमा पर सीधा प्रहार करार दिया है।
एसडीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव पी. अब्दुल मजीद फैज़ी ने कहा कि यह फिल्म अपने कथानक में भ्रामक तथ्यों और सांप्रदायिक ज़हर के कारण पहले ही विवादों में घिरी रही है। उन्होंने कहा कि जिस फिल्म पर देश के कई हिस्सों में प्रतिबंध लगे, उसे सरकारी स्तर पर पुरस्कार देना खतरनाक प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है।
झूठे दावों पर आधारित है फिल्म
फिल्म में यह दावा किया गया है कि केरल की 32,000 महिलाएं आईएसआईएस में भर्ती हुईं, जबकि ऑल्ट न्यूज़ की पड़ताल और गृह मंत्रालय की आरटीआई के अनुसार यह आंकड़ा पूरी तरह निराधार है। 2014 से 2020 के बीच देशभर में आईएसआईएस से जुड़े मामलों में 177 गिरफ्तारियों में से सिर्फ 19 केरल से थीं।
राजनीतिक एजेंडे की झलक
फैज़ी ने कहा कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इस फिल्म को लेकर हुए विरोध और प्रतिबंध इस बात के प्रमाण हैं कि इसका सामाजिक असर विषाक्त रहा है। वहीं, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे भाजपा-शासित राज्यों में इसे टैक्स फ्री किया जाना इस फिल्म के पीछे की राजनीतिक मंशा को उजागर करता है।
सिनेमा का उद्देश्य मेल-जोल होना चाहिए, नफ़रत नहीं
उन्होंने कहा कि ‘द केरल स्टोरी’, ‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘साबरमती रिपोर्ट’ जैसी फिल्में एक खास राजनीतिक नैरेटिव को बढ़ावा देती हैं और समाज में इस्लामोफोबिया फैलाती हैं। महाराष्ट्र के अकोला में वर्ष 2023 में हुई सांप्रदायिक हिंसा इसी फिल्म से जुड़ी सोशल मीडिया पोस्ट के बाद भड़की थी।
जूरी से पुनर्विचार की अपील
एसडीपीआई ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जूरी से अपील की है कि वह ऐसे फैसलों से बचे जो समाज को बाँटते हों। सिनेमा एक सृजनात्मक माध्यम है, जिसका उद्देश्य मेल-जोल, समावेश और सत्य की स्थापना होना चाहिए — न कि नफ़रत और ग़लतबयानी को सम्मान देना।
जनता से आह्वान
पार्टी ने देशवासियों से अपील की है कि वे घृणा फैलाने वाले नैरेटिव्स को नकारें और भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करें।

