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ब्रेकिंग समाचार – पांच फैक्टर लोकसभा चुनाव को दे सकते हैं दिशा,चुनावी यात्रा के 17 अहम पड़ाव,किस राज्य में कैसे हैं समीकरण,Israel Gaza War: सुरक्षा और युद्ध कैबिनेट की बैठक आज

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आम चुनाव का ऐलान हो गया है। हालांकि चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले ही सियासी बिसात बिछने लगी है। बीजेपी ने तो अपने आधे उम्मीदवारों के नाम का ऐलान भी कर दिया है। वहीं, कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने चुनाव में अपने कुछ उम्मीदवारों सहित अजेंडे तक को घोषित कर दिया है। लेकिन जैसा कि हर चुनाव में होता है, कुछ ऐसे फैक्टर होते हैं, जो चुनाव और उसके नतीजे को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं। जानते हैं, इस आम चुनाव में ऐसे पांच फैक्टर जो इस सबसे बड़े चुनाव को दिशा दे सकते हैं।

1- राम मंदिर

लोकसभा चुनाव में राम मंदिर बड़ा मुद्दा है। इसी साल 22 जनवरी को अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी ने बड़ा मुद्दा बनाया है। बीजेपी ने विकास के साथ विरासत की थीम को पकड़ा और पिछले दस वर्षों में हिंदू परंपरा स्थापित करने के दावे किए। जवाब में विपक्ष ने आम लोगों से जुड़े मुद्दे उठाए तो कहीं न कहीं उन्हें भी सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़नी पड़ी। ऐसे में जब दोनों धड़ों में राम मंदिर के नाम पर भी नैरेटिव बनाने की पूरी कोशिश शुरू हो चुकी है, तो नतीजा बताएगा कि आखिर जनता किनके मुद्दों के साथ रही।

2- उत्तर बनाम दक्षिण

इस आम चुनाव में उत्तर बनाम दक्षिण भी बड़ा मुद्दा है। बीजेपी अपने मिशन 400 को पूरा करने के लिए इस बार दक्षिण में विस्तार करने की पूरी कोशिश कर रही है। इसमें पीएम मोदी का नेतृत्व भी पूरी ताकत लगा रहा है। आम चुनाव के प्रचार की शुरूआत ही पीएम मोदी ने दक्षिण के राज्यों से की है। बीजेपी की मंशा है कि उत्तर में 2019 का प्रदर्शन दोहराए और दक्षिण में पहले से बेहतर करे तो उनका मिशन 400 पूरा हो सकता है। वहीं विपक्ष दक्षिण में बीजेपी को पूरी तरह रोकने और उत्तर में बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए की सीटों में कमी की कोशिश में लगा है। विपक्ष को लगता है कि अगर दक्षिण में बीजेपी को रोका और उत्तर में उसकी सीटें थोड़ी भी घटीं तो बीजेपी को अपने दम पर बहुमत पाने से रोका जा सकता है।

3-गारंटी बनाम गारंटी

इस आम चुनाव में गारंटी भी बड़ा फैक्टर है। बीजेपी मोदी की गारंटी को बड़ा मुद्दा बनाकर मोर्चे पर है। खुद पीएम मोदी दावा कर रहे हैं कि जनता को मोदी की गारंटी पर भरोसा है, क्योंकि पिछले 10 वर्षों में उन्होंने जो भी गारंटी दी, उसे पूरा किया। इसके उलट विपक्ष अपनी गारंटी के साथ चुनाव में है और आरोप लगा रहा है कि बीते 10 वर्षों में मोदी ने जो भी वादे किए थे, वे पूरे नहीं हुए हैं। इसी गारंटी के बीच दोनों ओर से कई लोकलुभावन वादे भी किए जा रहे हैं। ऐसे में जनता को किसकी गारंटी पर अधिक भरोसा होगा और किनकी गारंटी से लोग अधिक कनेक्ट करेंगे, यह चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर बनेगा।

4-गठबंधन बनाम गठबंधन

यह आमचुनाव गठबंधन बनाम गठबंधन का होगा। विपक्षी दलों ने इस बार 2019 के मुकाबले बेहतर गठबंधन बनाने की कोशिश की। हालांकि अंतिम समय में नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के अलग होने से बड़ा झटका जरूर लगा। फिर भी कई दलों ने साथ आने की कोशिश की। उसी तरह बीजेपी ने भी एनडीए के कुनबे को अब तक का सबसे बड़ा बनाने की कोशिश की है। हालांकि 2019 के बीच एनडीए के कुछ साथी जरूर चले गए थे, लेकिन चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने कुनबा बड़ा किया और एनडीए के दम पर इस बार 400 सीट जीतने का दावा कर रही है। इस तरह यह आम चुनाव गठबंधन बनाम गठबंधन का होगा। इसमें तय होगा कि किस गठबंधन का अंकगणित सफल रहा।

5- महिला और युवा

हाल के वर्षों में हर चुनाव में महिला और युवा किसी चुनाव परिणाम को दिशा देने में सबसे अहम फैक्टर बन गए हैं। तमाम राजनीतिक दलों ने खासकर महिलाओं को अपने पाले में करने के लिए कई दांव भी खेले हैं। बीजेपी सरकार महिला आरक्षण, उज्ज्वला योजना सहित कई योजनाओं के दम पर महिलाओं को अपने पाले में करने की पूरी कोशिश कर रही है। वहीं, कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल महिलाओं को हर महीने पगार सहित सस्ते सिलेंडर का वादा कर रहे हैं। इसी तरह रोजगार के मुद्दे पर भी विपक्ष सियासी पिच पर बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस ने 30 लाख सरकारी नौकरी का वादा किया। इस तरह चुनाव में यह भी अहम फैक्टर होगा।

किस राज्य में कैसे हैं समीकरण, कहां, कौन, किसके लिए खड़ी करेगा मुसीबत

रणभेरी बज चुकी है…चुनाव आयोग के 7 चरणों में मतदान कराने के एलान के साथ ही अगले तीन महीने पूरा देश चुनावी रंग में रंग जाएगा। वादों-इरादों के अनोखे और अलग-अलग रंग देखने को मिलेंगे। मैदान में ताल ठोक रहे राजनेता सत्ता का सिंहासन पाने के लिए हर सियासी दांव-पेच आजमाते नजर आएंगे।सियासी नेताओं के हर बयान अब सुर्खियों में होंगे, तो जवाबी हमले भी राजनीतिक गर्मी पैदा करेंगे। देश के मुद्दे छाएंगे, तो राज्यों के समीकरण भी असर दिखाएंगे। आयोग की सख्ती के बावजूद निजी हमले होंगे…बाल की खाल उधेड़ी जाएगी। अब जनता जनार्दन तय करेगी कि साथ किसका देना है, देश को किस रंग में रंगना है।

जम्मू-कश्मीर, लद्दाख : 370 के खात्मे का दिखेगा नया रंग
बीते चुनाव के बाद सबसे चर्चित राज्य अब दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बंट गया है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद भाजपा यहां सकारात्मक बदलाव को मुद्दा बना रही है। तैयारी घाटी तक पहुंच बनाने की है। दो ताकतवर क्षेत्रीय दलों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी का मुख्य मुद्दा पूर्ण राज्य के दर्जे के साथ 370 की फिर से बहाली है। कांग्रेसी दिग्गज रहे गुलामनबी आजाद अब डेमोक्रेटिक प्रगतिशील आजाद पार्टी बनाकर नई पारी खेल रहे हैं। एनसी-पीडीपी ने गठबंधन तोड़ दिया है। कांग्रेस फिलहाल अकेली है।पिछला परिणाम

  1. कुल सीटें- 6
  2. भाजपा- 3
  3. एनसी- 3

गुजरात: तीन दशक से भाजपा का अभेद्य किला
पश्चिम भारत और पीएम मोदी के गृह राज्य के तौर पर पहचान। लोकसभा के बीते दो चुनावों में क्लीन स्वीप के अलावा बीते विधानसभा चुनाव में तीन चौथाई से भी बड़ी प्रचंड जीत से भाजपा के हौसले बुलंद। कांग्रेस यहां आप के साथ गठबंधन कर चुनौती पेश करने की कोशिश कर रही है। हालांकि मुश्किल यह है कि पार्टी के नेता एक-एक कर भाजपा का दामन थाम रहे हैं। चुनाव में भाजपा का मुद्दा हमेशा की तरह हिंदुत्व व राष्ट्रवाद है। पीएम मोदी व गृह मंत्री अमित शाह का गृह प्रदेश होने के कारण राज्य की अस्मिता के मुद्दे का लाभ भी भाजपा को मिलता रहा है।

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  1. कुल सीटें- 26
  2. भाजपा- 26

हिमाचल प्रदेश : बगावत के चलते संकट में कांग्रेस
उत्तर भारत में कांग्रेस शासित इकलौता राज्य। सैनिकों की बहुतायत वाले प्रदेश में बीते साल भाजपा को कांग्रेस के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी। हालांकि, सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू के खिलाफ अब पार्टी में ही असंतोष चरम पर है। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह बगावत की कमान संभाले हुए हैं। भाजपा के सामने फिर से क्लीन स्वीप करने की, तो कांग्रेस की खाता खोलने की चुनौती है।

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  1. कुल सीटें- 4
  2. भाजपा- 4

पंजाब : किसान आंदोलन के बीच बहुध्रुवीय दिख रही लड़ाई
पांच साल में राज्य की सियासत पूरी बदल गई। कांग्रेस और अकाली दो ध्रुव थे। अब सत्ता आप के पास है। अकाली दल ने किसान आंदोलन के बहाने भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया, तो कांग्रेस के स्तंभ रहे कैप्टन अमरिंदर सिंह, सुनील जाखड़ भाजपाई हो गए। आप विपक्षी गठबंधन में शामिल है, मगर कांग्रेस संग सीटों का बंटवारा उलझा है। किसान आंदोलन नए सिरे से शुरू हुआ है। इन सबके बीच अकाली दल फिर भाजपा से गठजोड़ में जुटा है। यहां बहुध्रुवीय लड़ाई नजर आ रही है।

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  1. कुल सीटें- 13
  2. कांग्रेस- 8
  3. भाजपा- 2
  4. अकाली दल- 2
  5. आप- 1

(उपचुनाव में आप ने इकलौती व कांग्रेस ने एक सीट गंवा दी।)

उत्तराखंड
देवभूमि और भाजपा का मजबूत किला। पिछले चुनाव में क्लीन स्वीप करने वाली भाजपा ने राज्य की सत्ता बरकरार रख हर चुनाव में परिवर्तन की परंपरा से पार पाने में सफलता हासिल की। पार्टी का मुख्य मुद्दा देवभूमि में किया गया विकास है। मोदी सरकार ने धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के भी कई प्रयास किए हैं।

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  1. कुल सीटें- 5
  2. भाजपा- 5

हरियाणा
जाटलैंड कहे जाने वाले हरियाणा में जाट बिरादरी लोकसभा और विधानसभा के बीते दो चुनावों में हाशिये पर रही है। भाजपा को लगातार ब्रांड मोदी और गैरजाट राजनीति का लाभ मिला है।

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  1. कुल सीटें- 10
  2. भाजपा- 10

पिछले लोकसभा चुनाव में क्लीन स्वीप करने वाली भाजपा की चुनौती पुराना प्रदर्शन बरकरार रखने की है। वहीं, कांग्रेस आधार पाने की जद्दोजहद में है। विपक्ष महिला पहलवानों के कथित यौन उत्पीड़न व किसान आंदोलन को मुद्दा तो बना रहा है, पर अन्य राज्यों की तरह यहां भी विपक्ष बिखरा है। विधानसभा में भाजपा का जेजेपी से गठबंधन था। हालांकि सियासी उठापटक में मनोहरलाल की जगह नायब सिंह सैनी सीएम बने और जेजेपी से गठबंधन तोड़ दिया।

दिल्ली : राजधानी में दो बार से भाजपा का दबदबा
देश की राजधानी के मतदाता राजनीति के माहिर खिलाड़ी साबित हो रहे हैं। बीते दो लोकसभा चुनाव में सभी सीटें भाजपा को जबकि विधानसभा में 90 फीसदी सीटें आप को देते रहे हैं। इस बार कांग्रेस और आप ने गठजोड़ कर लिया है, लेकिन बीते दो चुनावों में दोनों पार्टियों को मिले वोटों का जोड़ भी भाजपा के वोटों के पार नहीं गया है। ऐसे में इस गठजोड़ का कितना लाभ विपक्ष को मिलेगा, कहना कठिन है। स्थानीय सांसदों के खिलाफ किसी भी असंतोष से निपटने के लिए भाजपा केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी सहित 4 सांसदों का पत्ता काट चुकी है।

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  1. कुल सीटें- 7
  2. भाजपा- 7

महाराष्ट्र : असली-नकली के बीच दिलचस्प लड़ाई
बीते विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की सियासत कई उलटफेर का शिकार रही। शिवसेना ने स्वाभाविक सहयोगी भाजपा से नाता तोड़ धुर विरोधी कांग्रेस व एनसीपी के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी सरकार बनाई। उद्धव सीएम तो बन गए, पर पहले शिवसेना और बाद में एनसीपी ही टूट गई। चुनाव आयोग ने भले ही शिवसेना और एनसीपी के असली-नकली का अपने हिसाब से फैसला कर दिया हो, लेकिन जनता किसे असली मानती है, फैसला लोकसभा चुनाव में होना है।पिछला परिणाम

  1. कुल सीटें- 48
  2. भाजपा- 23
  3. शिवसेना- 18
  4. एनसीपी- 4
  5. कांग्रेस- 1
  6. अन्य- 2

उत्तर प्रदेश : सत्ता बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका
सियासी दृष्टि से देश का सबसे अहम राज्य। दो चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत ने केंद्र में पहली बार कांग्रेस के इतर किसी दल की बहुमत की सरकार बनाने में निभाई भूमिका। बीते चुनाव में बसपा के साथ मैदान में उतरी सपा इस बार कांग्रेस के साथ। पूरब में अपना दल, निषाद पार्टी, सुभासपा तो पश्चिम में रालोद को साधने के बाद भाजपा को फिर बड़ी जीत की उम्मीद। सपा-कांग्रेस की सामाजिक न्याय के पिच पर राजग को घेरने की योजना जबकि भाजपा सामाजिक न्याय और राम मंदिर उद्घाटन से उठे ज्वार के सहारे मैदान मारने की जुगत में। बसपा के अपने दम पर चुनाव मैदान में उतरने के फैसले से भाजपा के हौसले बुलंद।

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  1. कुल सीटें- 80
  2. भाजपा+- 64
  3. बसपा- 10
  4. सपा- 5
  5. कांग्रेस- 1

बिहार : जाति गणना के रंग से कौन होगा बेरंग
देश में जाति आधारित राजनीति का केंद्र। बीते दो साल में राज्य के सीएम नीतीश कुमार के दो बार पाला बदलने और जातिगत गणना की देशव्यापी चर्चा। बीते दो दशक से नीतीश ही सत्ता का संतुलन हैं। जिसके साथ गए, उसी की बादशाहत रही। विपक्ष से जदयू को झटक कर भाजपा ने अंतिम समय में झटका दिया। हालांकि लोजपा के दो धड़ों के कारण सीट बंटवारे की गुत्थी सुलझाना अहम चुनौती है। एनडीए और विपक्ष में शामिल दोनों दलों की निगाहें जातीय समीकरण साधने पर हैं। राजद, कांग्रेस, सामाजिक न्याय की पिच पर एनडीए को घेर रहे हैं, तो सामाजिक न्याय की राजनीति के पुरोधा कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर भाजपा ने विपक्ष को उलझा दिया है।पिछला परिणाम

  1. कुल सीटें- 40
  2. भाजपा- 17
  3. जदयू- 16
  4. लोजपा- 6
  5. कांग्रेस- 1

मध्यप्रदेश: शिव-मोहन राज से फिर भगवा आस
हिंदी पट्टी का अहम राज्य और देश का दिल। भाजपा का मजबूत किला। तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए भाजपा ने अभिनव प्रयोगों के सहारे विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज की। भाजपा कांग्रेस की अजेय सीट छिंदवाड़ा पर फोकस कर रही है, तो पूर्व सीएम कमलनाथ की नाराजगी और सांसद पुत्र नकुलनाथ के भाजपा में जाने की अटकलों से गहराया संकट टिकट मिलने के बाद फिलहाल टल गया है। भाजपा को शिवराज चौहान के बाद मोहन यादव सरकार के भरोसे फिर भगवा लहराने की उम्मीद है।

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  1. कुल सीटें- 29
  2. भाजपा- 28
  3. कांग्रेस- 1

राजस्थान: अभेद्य किले को भेदना कांग्रेस की बड़ी चुनौती
बीते साल के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली। लोकसभा में दो चुनावों से यह राज्य भाजपा के अभेद्य किले में तब्दील हो चुका है। बीते चुनाव में भाजपा की सहयोगी आरएलपी ने नई राह चुनी है। भाजपा वसुंधरा राजे जैसे पुराने दिग्गजों से परे नया नेतृत्व उभारने में जुटी है। कांग्रेस की सारी उम्मीदें पूर्व सीएम अशोक गहलोत व सचिन पायलट पर टिकीं हैं।पिछला परिणाम

  1. कुल सीटें- 25
  2. भाजपा- 25

तमिलनाडु : सनातन पर टिप्पणी का दिखेगा असर
यहां की राजनीति द्रमुक व अन्नाद्रमुक के बीच सिमटी रही है। राष्ट्रीय दल इन्हीं के साथ गठबंधन कर मैदान में उतरते हैं। पिछले चुनाव में द्रमुक की अगुवाई में यूपीए ने 39 में से 38 सीटें जीतीं। इस बार द्रमुक प्रमुख स्टालिन के बेटे उदयनिधि के सनातन धर्म विरोधी बयानों और सरकार के मंत्रियों पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों ने भाजपा को तीसरा कोण बनाने का मौका दिया। राज्य भाजपा प्रमुख के. अन्नामलाई की सभाओं में भीड़ अलग संदेश दे रही है।

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  1. कुल सीटें- 39
  2. द्रमुक- 20
  3. कांग्रेस- 08
  4. अन्य- 10
  5. अन्नाद्रमुक- 01

आंध्रप्रदेश : टीडीपी बड़ी चुनौती में घिरी
लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी होंगे। विपक्षी टीडीपी के सामने अभी नहीं, तो कभी नहीं की चुनौती है। टीडीपी की एनडीए में वापसी व भाजपा और जनसेना के साथ गठबंधन से नया समीकरण बना है। राज्य की सत्ता और आम चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने वाली वाईएसआरसीपी के सामने प्रदर्शन दोहराने की चुनौती। 

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  1. कुल सीटें- 25
  2. वाईएसआरसीपी- 22 
  3. टीडीपी- 3

ओडिशा: दूर रहकर भी बीजद साथ
सीएम नवीन पटनायक के चेहरे के साथ बीजद राज्य में सबसे ताकतवर। संसद में बीते दस साल से बीजद-भाजपा की दोस्ती चर्चा का विषय रही, मगर गठबंधन पर फैसला नहीं। बीते चुनाव में मुख्य विपक्षी दल बनकर भाजपा ने चौंका दिया था। हालांकि अस्वस्थ चल रहे पटनायक को लेकर कई तरह की अटकलों का बाजार गर्म है। वहीं, कांग्रेस के सामने राज्य में नेतृत्व और संगठन की बड़ी चुनौती सामने है।

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  1. कुल सीटें- 21
  2. बीजेडी- 12
  3. भाजपा- 8
  4. कांग्रेस- 1

तेलंगाना
बीते साल के अंत में हुए विधानसभा चुनाव में दक्षिण भारत के इस राज्य ने कांग्रेस को जीत के साथ राहत दी। भाजपा के सामने बीते चुनाव में जीती सीटें बचाने और आधार बढ़ाने की, तो बीआरएस के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है। कांग्रेस राज्य की अस्मिता का मुद्दा उठा रही है। हैदराबाद क्षेत्र में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम बड़ी ताकत है।

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  1. कुल सीटें- 17
  2. बीआरएस- 9 
  3. भाजपा- 4
  4. कांग्रेस- 3 
  5. एआईएमआईएम- 1

झारखंड
झामुमो की अगुवाई में गठबंधन की सरकार, पर लोकसभा के बीते दो चुनावों में भाजपा का पलड़ा भारी रहा है। सीएम रहे हेमंत सोरेन के जेल जाने से झामुमो संकट में है। पहली बार राज्य की सत्ता सोरेन परिवार के इतर दूसरे हाथों में है। यूपीए आदिवासी अस्मिता को मुद्दा बना रहा है। वहीं, बाबू लाल मरांडी की घर वापसी को भाजपा फायदे के रूप में देख रही है। पिछला परिणाम 

  1. कुल सीटें- 13
  2. भाजपा- 11
  3. आजसू, झामुमो, कांग्रेस 1-1

कर्नाटक: दक्षिण में भाजपा के लिए अंतिम आसरा
दक्षिण भारत का अंतिम किला गंवाने के बाद भाजपा की चुनौती बढ़ी है। जद-एस से गठबंधन के बाद उसका विश्वास बढ़ा है। यह राज्य दक्षिण में उसका अंतिम आसरा है। बीते चुनाव में महज एक सीट जीतने वाली कांग्रेस सत्ता में वापसी के बाद बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद पाले बैठी है।

पिछला परिणाम 

  1. कुल सीटें- 28
  2. भाजपा- 25 
  3. भाजपा समर्थित निर्दलीय- 1 
  4. कांग्रेस- 1 
  5. जदएस- 1

असम : पूर्वोत्तर में भाजपा का नया गढ़
सियासी दृष्टि से पूर्वोत्तर भारत का सबसे अहम राज्य और भाजपा का नया गढ़। मुस्लिमों की बड़ी आबादी के बावजूद भाजपा दो विधानसभा चुनावों और दो आम चुनावों में बेहतर प्रदर्शन में सफल रही है। सीएम हिमंत बिस्व सरमा हिंदुत्व के नए ब्रांड के रूप में उभरे हैं। कांग्रेस की चुनौती एआईयूडीएफ है, जिसका मुसलमानों में प्रभाव है। 

पिछला परिणाम 

  1. कुल सीटें- 14
  2. भाजपा- 9 
  3. कांग्रेस- 3 
  4. एआईयूडीएफ- 1
  5. निर्दलीय- 1

त्रिपुरा
भाजपा को शून्य से अचानक शिखर पर पहुंचाने वाला राज्य। जिस दल के पास एक भी विधायक नहीं था, उसने दशकों पुरानी वाम मोर्चा सरकार को हरा कर सनसनी मचा दी थी। पार्टी लगातार दो बार से राज्य की सत्ता में। कांग्रेस-वाम मोर्चा साथ-साथ मैदान में।  पिछला परिणाम 

  1. कुल सीटें- 2
  2. भाजपा- 2

केरल
लोकसभा में प्रचंड जीत दर्ज करने वाला कांग्रेस की अगुवाई वाला यूडीएफ वाम दलों की अगुवाई वाले एलडीएफ से पार नहीं पा सका। अब तक खाता खोलने में नाकाम रही भाजपा ने चर्च से संबंध बेहतर करने के साथ कांग्रेसी एके एंटनी सहित कई नेताओं को साधा है। 

पिछला परिणाम 

  1. कुल सीटें- 20
  2. यूडीएफ- 19
  3. एलडीएफ- 1

अरुणाचल प्रदेश
सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से पूर्वोत्तर और देश का अहम राज्य। भाजपा ने इस बार भी अपने दोनों पुराने चेहरों केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और तापिर गाव पर भरोसा जताया है।

पिछला परिणाम 

  1. कुल सीटें- 2
  2. भाजपा- 2

पश्चिम बंगाल : संदेशखाली में छिपा संदेश
तृणमूल के अभेद्य दुर्ग में बीते चुनाव में 18 सीटें जीत कर भाजपा ने चौंका दिया। हालांकि विधानसभा में प्रचंड जीत हासिल कर ममता बनर्जी ने वापसी की। वर्तमान में संदेशखाली में महिलाओं के उत्पीड़न के आरोपी शाहजहां शेख को बचाने को लेकर ममता की खूब किरकिरी हुई। भाजपा की निगाहें इस राज्य में विस्तार पर टिकी हैं। महिला सुरक्षा, तृृणमूल कार्यकर्ताओं का आतंक और मुस्लिम तुष्टीकरण मुख्य मुद्दा।  तृृणमूल 28% मुसलमानों को साधे रहने की रणनीति पर चल रही है। उसका कांग्रेस से गठबंधन भी नहीं हो पाया। कभी वामपंथ की राजनीति का अभेद्य दुर्ग रहे राज्य में वाम दल अंतिम सांसें गिन रहे हैं।

पिछला परिणाम

  1. कुल सीटें- 42
  2. टीएमसी- 22
  3. भाजपा- 18
  4. कांग्रेस- 2

Israel Gaza War: सुरक्षा और युद्ध कैबिनेट की बैठक आज, बैठक में इन मुद्दों पर होगा जोर

इस्राइल और हमास के युद्ध के बीच सुरक्षा कैबिनेट और युद्ध कैबिनेट की रविवार को बैठक होगी। इसका उद्देश्य दोहा के लिए प्रस्थान से पहले वार्ता के प्रभारी प्रतिनिधिमंडल के जनादेश पर निर्णय लेना होगा। प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि गाजा में संघर्ष विराम पर बातचीत के लिए दोहा की यात्रा के कारण एक प्रतिनिधिमंडल के जनादेश पर चर्चा करने के लिए इस्राइल की सुरक्षा कैबिनेट रविवार को बैठक करने वाली है।प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को 7 अक्तूबर को दक्षिणी इस्राइल पर हमास के हमले के दौरान पकड़े गए बंधकों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए घरेलू राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिससे गाजा पट्टी में चल रहे युद्ध की शुरुआत हुई।

एक बयान में कहा गया है, ‘सुरक्षा कैबिनेट और छोटी, पांच सदस्यीय युद्ध कैबिनेट रविवार को बैठक करेगी। इस दौरान दोहा के लिए रवाना होने से पहले वार्ता के प्रभारी प्रतिनिधिमंडल के जनादेश पर निर्णय लिया जाएगा।’

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को 7 अक्तूबर को दक्षिणी इस्राइल पर हमास के हमले के दौरान पकड़े गए बंधकों की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए घरेलू राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है, जिससे गाजा पट्टी में चल रहे युद्ध की शुरुआत हुई। आतंकवादियों ने उस दिन लगभग 250 बंधकों को पकड़ लिया था, और इस्राइल का मानना है कि गाजा में लगभग 130 लोग बचे हैं, जिनमें 32 मृत मान लिए गए हैं।

क्या कहता है स्वास्थ्य मंत्रालय
इस्राइली आंकड़ों की एएफपी तालिका के अनुसार, हमले में लगभग 1,160 लोग भी मारे गए, जिनमें ज्यादातर नागरिक थे। हमास द्वारा संचालित क्षेत्र में स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, हमास को नष्ट करने के लिए इस्राइल के जवाबी सैन्य अभियान में गाजा में कम से कम 31,553 लोग मारे गए हैं, जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं। 

बता दें कि दोहा में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का निर्णय तब आया है जब हमास ने कुछ बंधकों के साथ-साथ फलस्तीनी कैदियों की रिहाई के बदले में लड़ाई को छह सप्ताह के लिए रोकने के लिए एक नया प्रस्ताव प्रस्तुत किया है।  

हरियाणा में भाजपा की चुनौती बनाम कांग्रेस की चाहत, सबका बहेगा पसीना

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हरियाणा में जिस तरह से सियासी उथल-पुथल हुई है, इसके दूरगामी परिणाम होंगे। इस प्रयोग का असर सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों की रणनीति को भी प्रभावित करेगा। इससे हासिल परिणाम पर ही विधानसभा चुनाव की नींव रखी जाएगी। जाटलैंड में जातीय समीकरणों को साधने के लिए सभी पार्टियों को खूब गहरे तक मंथन करना होगा। सियासी दलों की प्रयोगशाला बने हरियाणा में इस चुनाव में भाजपा को छोड़कर किसी भी दल के पास खोने को कुछ नहीं है। भाजपा के समक्ष 2019 में हासिल सभी दस सीटें चुनौती है, तो 2014 में एक सीट और पिछले चुनाव में शून्य पर सिमटी कांग्रेस को दस साल का सूखा तोड़ने के लिए पसीना बहाना होगा। हरियाणा में मंथन सा चुनाव…जातियों को साधने की जद्दोजहद, भाजपा को 2019 की स्थिति बनाए रखना व कांग्रेस को 10 साल का सूखा तोड़ने के लिए बहाना होगा पसीना…

हरियाणा में ऐसा प्रयोग पहली बार हुआ कि चुनाव से ऐन पहले सत्तारूढ़ दल ने मुख्यमंत्री बदलने का दांव खेला। भाजपा का मकसद एंटी इंकम्बेंसी फैक्टर कम करना है, पर यह विश्वास जनता में पैदा करना होगा कि केवल चेहरा ही नहीं, व्यवस्था भी बदली है। मंत्रिमंडल में पुराने ही चेहरे ज्यादा शामिल हैं। आचार संहिता लगने से अब नए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के पास समय व अवसर नहीं है कि यह संदेश दे सकें कि वह सरकार बदल चुकी है जिसके प्रति विरोध था।

संगठन की चाक-चौबंदी से लेकर प्रत्याशी तय करने में भाजपा ने तेजी दिखाई। छह प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। इनमें जातीय समीकरणों का ध्यान रखा। मनोहर को लोकसभा चुनाव लड़वाना दिग्गजों को मैदान में उतारने के उसी प्रयोग का हिस्सा है, जो भाजपा ने दो अन्य राज्यों कर्नाटक व उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्रियों को मैदान में उतार कर किया है। कांग्रेस इसी पर उससे सवाल कर रही है कि जनता को बताए कि सीएम को क्यों हटाया। क्या परफार्मेंस ठीक नहीं थी? 

अढ़ाई प्रतिशत आबादी वाले सैनी समुदाय से संबंधित नायब को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा अन्य पिछड़ा वर्ग की 40 प्रतिशत आबादी को साधना चाहती है। 25 प्रतिशत जाट वोट बैंक उसके लिए दूर की कौड़ी रहा है। सांसद बृजेंद्र सिंह के कांग्रेस का दामन थामने, उनके पिता बीरेंद्र सिंह के भी पार्टी से नाराज चलने से जाट बेल्ट में भाजपा ने नुकसान भांप लिया है। जाट मतों के विभाजन की भाजपा ने चाल चली। जननायक जनता पार्टी (जजपा) से नाता तोड़कर एक और हलचल पैदा की। उसे यह उम्मीद है कि अगर जजपा अकेले मैदान में उतरती है, तो जाट मतों का विभाजन कांग्रेस, जजपा और इनेलो में हो सकता है, जिसका लाभ उसे मिल सकता है। पंजाबी यानी जीटी रोड बेल्ट की तीन सीटों से भाजपा को इसलिए भी उम्मीद है, क्योंकि मनोहर व सैनी दोनों यहां से हैं, लेकिन पिछले पांच साल में उनका जनता से कितना जुड़ाव रहा है, यह अब मतदाता आंकेगा जरूर। भाजपा ने यादव व गुर्जर मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए राव इंद्रजीत व कृष्णपाल गुर्जर को फिर मैदान में उतारकर अहीरवाल बेल्ट व एनसीआर में मजबूती पाने की कोशिश की है।

कांग्रेस ने भी गठबंधन में सहयोगी आम आदमी पार्टी को कुरुक्षेत्र सीट देकर प्रयोग किया है। कांग्रेस नेता वहां आप के प्रत्याशी के लिए जुट भी गए हैं, लेकिन क्या बाकी क्षेत्रों में कांग्रेस को भी इस सहयोगी से वैसा समर्थन मिलेगा, यह कहना मुश्किल है। गुटबाजी कांग्रेस की बड़ी मुसीबत है, लेकिन जातिगत समीकरण उसके पक्ष में बनते हैं। कांग्रेस इस बार भी जाट व दलित वोट बैंक से ही ताकत मिलने की उम्मीद में है। दस में से लगभग पांच सीटों पर जाट व दलित मतदाता जीत-हार तय करते हैं। विधायक दल के नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष व दीपेंद्र हुड्डा गुट और दूसरी ओर कुमारी सैलजा, रणदीप सुरजेवाला और किरण चौधरी का गुट है। कांग्रेसी मानते हैं कि पार्टी के भीतर बेशक खींचतान है, लेकिन वोटर जाट व दलित कंबीनेशन वाले इन दोनों गुटों के नेताओं को वोट देगा तो फायदा कांग्रेस को होगा। देसवाली व बांगर बेल्ट में कांग्रेस इसी फैक्टर का लाभ लेने की फिराक में है। छठे चरण में चुनाव होने से प्रत्याशी तय करने के लिए कांग्रेस को कुछ समय मिल गया है।

जजपा के लिए अपने विधायकों व नेताओं को संभाले रखना ही चुनौती है। वह लोकसभा चुनाव लड़ती है तो जीतने नहीं, वोट काटने की ही स्थिति में होगी। जजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अजय चौटाला व मनोहर सरकार में िडप्टी सीएम रहे दुष्यंत चौटाला आगामी रणनीति तय नहीं कर पाए हैं। दूसरी ओर जिस इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) से टूटकर जजपा बनी, वह जरूर इस उम्मीद में है कि जजपा में बिखराव हुआ तो उसके नेताओं की घर वापसी होगी। पार्टी के प्रधान महासचिव अभय चौटाला की नजरें इस चुनाव से ज्यादा विधानसभा चुनाव पर होंगी। 

भाजपा मोदी के नाम, केंद्र सरकार के राष्ट्रीय एजेंडे- राम मंदिर, अनुच्छेद 370 के साथ ही मनोहर सरकार के कार्यों को भुनाएगी। कानून-व्यवस्था, महिला पहलवानों का शोषण व उनको इंसाफ न िमलने, बेरोजगारी और भाजपा सरकार की नाकामियों को कांग्रेस मुद्दा बनाएगी। दावों व वादों की झड़ी के बीच ऊंट किस करवट बैठेगा, यह प्रदेश के 1.98 करोड़ मतदाताओं को तय करना है।

ऐसे-ऐसे जवान हुआ देश का लोकतंत्र, जानें चुनावी यात्रा के 17 अहम पड़ाव

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दर्जा रखने वाले भारत के नागरिक हर पांच साल में अपना मत देकर न सिर्फ अपनी पसंद की सरकार चुनते हैं, बल्कि साल-दर-साल जनतंत्र में विश्वास और बढ़ाते जा रहे हैं। यह भरोसा इतना बड़ा है कि चुनावों के बाद राजनीतिक सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होता है। सत्ताधारी दल हो या विपक्ष, प्रतिकूल चुनावी फैसले को स्वीकार करते हैं। भारत की कल्याणकारी और सुरक्षात्मक प्रतिबद्धता नीतियों में परिलक्षित होती है। सभी सरकारें इन्हीं नीतियों पर चलती हैं। बीते 17 चुनावों के साथ हमारा लोकतंत्र लगातार परिपक्व होता जा रहा है।स्वतंत्र भारत के दूसरे चुनाव तक पंडित जवाहरलाल नेहरू का आभामंडल चुनावी लोकतंत्र पर छा चुका था। 403 क्षेत्रों में 494 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव हुए और कांग्रेस ने 47.78 फीसदी वोट के साथ पिछली बार से भी बेहतर प्रदर्शन कर 371 सीटें जीत लीं। 

952: लोकतंत्र की दस्तक
आजाद भारत के नागरिकों ने संविधान तैयार होने के बाद पहली बार अपनी सरकार चुनने के लिए वोट डाला। कुल 401 लोकसभा क्षेत्रों में 489 सांसदों के लिए 17.32 करोड़ मतदाता थे। चक्कर खा गए? दरअसल पहले और दूसरे संसदीय चुनावों में कुछ लोकसभा सीटों पर दो प्रत्याशी चुने गए थे। पहली लोकसभा में 86 क्षेत्र ऐसे थे, जहां दो सांसद चुने गए। वहीं, उत्तरी बंगाल स्वतंत्र भारत की इकलौती सीट थी, जहां पहले चुनाव में तीन सांसद चुने गए थे। इन चुनावों में कांग्रेस ने 364 सीटें जीतीं, जबकि भारतीय जनसंघ को सिर्फ 3 सीटें मिलीं। निर्दलीय 37, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 16, सोशलिस्ट पार्टी 12 और अन्य को 57 सीटें मिलीं। कुल 44.87 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले।

1957: नेहरू का आभामंडल
स्वतंत्र भारत के दूसरे चुनाव तक पंडित जवाहरलाल नेहरू का आभामंडल चुनावी लोकतंत्र पर छा चुका था। 403 क्षेत्रों में 494 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव हुए और कांग्रेस ने 47.78 फीसदी वोट के साथ पिछली बार से भी बेहतर प्रदर्शन कर 371 सीटें जीत लीं। जयप्रकाश नारायण की अगुवाई वाली प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 19, जबकि भाकपा ने 27 सीटें जीतीं। निर्दलीय भी पिछली बार से ज्यादा रहे। उन्होंने 42 सीटें जीतीं। जनसंघ इस बार भी संघर्ष करती रही और 4 सीटें हासिल हुईं। इस चुनाव में मतदाताओं की संख्या 19.36 करोड़ हो गई, जिनमें से 45.44 फीसदी ने मताधिकार का प्रयोग किया।

1962: कांग्रेस का जादू बरकरार
भारतीय लोकतंत्र के तीसरे चुनाव में मतदाताओं ने कोई खास बदलाव नहीं किया। एक संसदीय क्षेत्र से दो सांसद चुनने की परंपरा खत्म हो गई और 494 सीटों पर चुनाव हुआ। नेहरू का यह आखिरी चुनाव साबित हुआ। उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 361 सीटें जीतीं। भारतीय जनसंघ को 14, स्वतंत्र पार्टी को 18, भाकपा को 29 और प्रजा सोशलिस्ट को 12 सीटें मिलीं। कुल 21.63 करोड़ वोटरों में से 55.42% ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया।

1967: नेहरू विहीन कांग्रेस
यह पहला चुनाव था, जिसमें कांग्रेस का नेतृत्व पंडित नेहरू नहीं कर रहे थे। उनकी बेटी इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया मानकर कांग्रेस नेताओं ने 1966 में पीएम की कुर्सी पर बिठाया था, इसलिए चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा गया। 520 सीटों में से कांग्रेस को 283 सीटें मिलीं, जबकि दूसरे दलों व निर्दलीयों ने 237 सीटों पर जीत दर्ज की। पहली बार सत्ता पक्ष के सामने इतनी बड़ी संख्या में विपक्ष की मौजूदगी थी। स्वतंत्र पार्टी को 44, जनसंघ को 35 सीटें मिलीं थीं।

1971 : गरीबी हटाओ के नारे से शिखर पर इंदिरा
आजाद भारत में पहली बार तय समय से करीब एक साल पहले मध्यावधि चुनाव हुए। 1969 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस के पुराने नेताओं ने पार्टी से निष्कासित कर दिया। हालांकि ज्यादातर सांसद उनके साथ रहे, जिसके कारण वह प्रधानमंत्री बनी रहीं और 1971 में मध्यावधि चुनाव करवाया। उन्होंने देश से गरीबी हटाओ का नारा दिया और इस नारे ने उन्हें फिर पीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया। 518 सीटों के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस को 352 व जनसंघ को 22 सीटें मिलीं।

1977 : आपातकाल के बाद नई सुबह, कांग्रेस सत्ता से बाहर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के संसदीय निर्वाचन को रद्द किया, तो 1975 में उन्होंने आपातकाल लगा दिया। विपक्ष के बड़े नेता जेलों में बंद कर दिए गए। 1977 में उन्होंने स्थिति अपने मनमुताबिक समझ कर चुनाव का एलान किया। समाजवादी, दक्षिण और मध्यमार्गी पार्टियां जनता पार्टी के रूप में एकजुट हुईं और भारतीय लोकदल के निशान पर चुनाव लड़ा। कांग्रेस को सिर्फ 154 सीटें मिलीं। भारतीय लोकदल को 295 सीटें मिलीं। उत्तर भारत में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया।

1980 : इंदिरा फिर सत्ता में
\जनता पार्टी की ओर से पहले मोरारजी देसाई और फिर पार्टी में विभाजन कर जनता पार्टी (सेक्यूलर) बनाकर चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने। हालांकि सिरफुटौव्वल से दोनों सरकारें गिर गईं। 1980 में हुए चुनाव में जनता ने फिर कांग्रेस का रुख किया और उसे 353 सीटें सौंप दी। 1980 में ही अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी बनाई।

1984: राजीव राज
31 अक्तूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की उनके ही अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी, जिसके चलते चुनाव कराना पड़ा। सहानुभूति के रथ पर सवार इंदिरा के बेटे राजीव के नेतृत्व में कांग्रेस ने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। कांग्रेस को 542 सीटों में से 414 पर जीत मिली। उसे कुल मतदान के 48.12% वोट मिले। आजाद भारत के इतिहास में किसी पार्टी को अब तक इतने वोट या सीटें नहीं मिलीं।

1989: बोफोर्स से उड़ा राजीव राज
राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बोफोर्स तोप सौदे में उन पर दलाली का आरोप लगाया। जनता दल बनाया।  मतदाताओं की नाराजगी के चलते कांग्रेस 197 सीटें ही जीत पाईं। जनता दल सरकार बनी। वीपी सिंह पीएम बने। बाद में चंद्रशेखर सरकार से अलग हुए और कांग्रेस के सहयोग से पीएम बने।

1991: फिर सहानुभूति लहर
कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार से समर्थन वापस लिया, तो फिर चुनाव कराने पड़े। चुनाव के दौरान तमिलनाडु में आत्मघाती हमलावरों ने बम धमाके में राजीव गांधी की हत्या कर दी। सहानुभूति लहर में कांग्रेस को 244 सीटें मिलीं। आंध्र के दिग्गज कांग्रेसी पीवी नरसिंह राव पीएम बने। पांच साल अल्पमत सरकार चलाने वाले पहले पीएम रहे।

1996: भाजपा का अभ्युदय पर 13 दिन चली सरकार
भारतीय राजनीति में 1996 मील का पत्थर है क्योंकि दक्षिणपंथ की राजनीति सत्ता के केंद्र में आई। 1992 में अयोध्या का विवादित ढांचा गिरने के बाद भाजपा पहली बार 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। अटल बिहारी वाजपेयी गैर कांग्रेसी पृष्ठभूमि के पहले प्रधानमंत्री बने। हालांकि सरकार 13 दिन ही चली। इसके बाद कांग्रेस के बाहरी समर्थन से एचडी देवगौड़ा, फिर आईके गुजराल पीएम बने। 1998 में फिर चुनाव घोषित हो गए।

1998: 13 दिन से 13 महीने
जॉर्ज फर्नांडिस और नीतीश कुमार की समता पार्टी पहले ही साथ आ चुकी थी। तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक, आंध्र प्रदेश की टीडीपी समेत कई छोटे दलों की मदद से भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। अटल फिर पीएम बने, लेकिन 13 माह बाद अन्नाद्रमुक ने समर्थन वापस ले लिया।

1999 : 24 दलों की सरकार
सिर्फ 13 माह में सरकार गिरने से नाराज जनता ने फिर अटल पर भरोसा जताया और 24 दलों वाले एनडीए को 269 सीटें सौंप दी। भाजपा को 182 सीटें मिलीं। कांग्रेस की सीटें गिरकर 114 पर आ गईं। आंध्र में तेलुगू देशम पार्टी को 29 सीटें मिलीं। उसने एनडीए को समर्थन दिया। इसके चलते अटल कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बन गए। हालांकि समाजवादी पृष्ठभूमि वाले सहयोगियों के दबाव में वे पार्टी के तीन मुख्य मुद्दों को अमल में नहीं ला सके। इससे जनता में नकारात्मक राय बनने लगी। हालांकि एनडीए के सफल प्रयोग को देखते हुए कांग्रेस ने भी गठबंधन की राजनीति का रुख कर लिया।

2004 : मनमोहन सिंह पार्ट-1
2003 में तीन हिंदी भाषी राज्यों में भाजपा की जीत से उत्साहित अटल के सलाहकारों ने उन्हें समय से पहले ही चुनाव कराने की सलाह दी। इंडिया शाइनिंग के नारे के साथ चुनाव की घोषणा हो गई। हालांकि, जनता को इंडिया जगमगाता नहीं लगा और एनडीए 187 सीटों पर सिमट गई। भाजपा को 138 सीटें मिलीं। सोनिया गांधी की अगुवाई में लड़ी कांग्रेस को 145 सीटें मिलीं और उसने गैर एनडीए दलों के साथ यूपीए सरकार बनाई।

2009 : मनमोहन सिंह पार्ट-2
किसान कर्ज माफी जैसे लोकलुभावन फैसले ने यूपीए को लगातार दूसरी जीत दिलाई। कांग्रेस की सीट संख्या 206 आैर यूपीए की 322 पहुंच गई। मनमोहन दूसरी बार पीएम बने, लेकिन सहयोगी दलों के भ्रष्टाचार के कारण टूजी घोटाला, कोयला घोटाला, बढ़ती महंगाई को लेकर सरकार की लोकपि्रयता लगातार गिरती गई।

2014: राजनीति का मोदी युग
2014 में नरेंद्र मोदी केंद्रीय राजनीति में धूमकेतु की तरह उभरे। उन्होंने वह कमाल करके दिखाया, जो कोई गैर कांग्रेसी नेता नहीं कर पाया था। उनके नेतृत्व में भाजपा पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई। यूपीए सरकार की भयंकर अलोकप्रियता और हिंदू हृदय सम्राट की छवि को जोड़कर चुनाव मैदान में उतरे नरेंद्र मोदी ने भाजपा को पहली बार अपने दम पर बहुमत दिला दिया। पार्टी को 282 सीटें और एनडीए को 325 सीटें मिलीं। कांग्रेस 44 पर सिमट गई। इतनी सीटें भी नहीं पा सकी कि संसद में नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए दावा कर सके। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। मोदी के इस कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि महंगाई पर सख्ती से लगाम लगाना रही।

2019:  मोदी नाम केवलम
सबका साथ, सबका विकास नारे के साथ नरेंद्र मोदी की अपार लोकप्रियता के रथ पर सवार भाजपा ने अपने दम पर 303 सीटों का आंकड़ा हासिल कर लिया। पश्चिम बंगाल, पूर्वोत्तर, दक्षिण के कर्नाटक और तेलंगाना जैसे क्षेत्रों में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। साबित हो चुका था कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा उन राज्यों में पैठ बना चुकी है, जहां कभी उसका झंडा उठाने वाले भी मुश्किल से मिलते थे। 

मुंबई: कांग्रेस की भारत जोड़ो न्याय यात्रा धारावी पहुंची।

लोकसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, “सात (चरणों) का मतलब है कि लगभग सभी विकास कार्य रुक जाएंगे और लगभग 70-80 दिनों तक रुकने का मतलब है कि आप कल्पना कर सकते हैं कि देश कैसे प्रगति करेगा क्योंकि चुनाव आचार संहिता के अनुसार, लोग नहीं चलेंगे, सामग्री की आपूर्ति नहीं की जाएगी, बजट खर्च नहीं होगा, इसलिए मेरे हिसाब से ये ठीक नहीं है। चुनाव तीन या चार (चरणों) के भीतर पूरे हो सकते थे।”

बीजेपी में शामिल हुईं मशहूर सिंगर अनुराधा पौडवाल

अपने जमाने की मशहूर सिंगर रहीं अनुराधा पौडवाल ने शनिवार को चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले बीजेपी का दामन थाम लिया है। कहा जा रहा है कि अनुराधा पौडवाल चुनाव भी लड़ सकती हैं।

दिल्ली में रेहड़ी-पटरी वालों को सीएम केजरीवाल ने दी बड़ी सौगात

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, “दिल्ली के सभी रेहड़ी-पटरी वालों के लिए खुशखबरी है… MCD ने फैसला लिया है कि हम सभी रेहड़ी-पटरी वाली दुकानों का सर्वे कराएंगे… हम रेहड़ी-पटरी वालों के लिए और दिल्ली के लोगों के लिए भी अच्छी व्यवस्था करना चाहते हैं ताकि रेहड़ी-पटरी वाले सम्मान के साथ अपना काम कर सकें…”

बीजेपी की कन्याकुमारी में रैली

400 पार का आंकड़ा छूने के लिए बीजेपी को दक्षिणी राज्यों में सीटें जीतना जरूरी है। कनार्टक के अलावा अन्य दक्षिणी राज्यों में बीजेपी को अब तक अच्छे नतीजे नहीं मिले थे इसलिए मोदी आज सुबह तमिलनाडु के कन्याकुमाारी में रैली करने की तैयारी में थे। रोड शो भी हैं। मोदी तेलंगाना के हैदराबाद में भी प्रचार कर रहे हैं। इसके बाद केरल के पथनमथिट्टा में अनिल एंटनी के लिए आज प्रचार करेंगे। अनिल कांग्रेस नेता एके एंटनी के बेटे हैं और कुछ समय पहले बीजेपी में आ गए थे। मोदी कल कर्नाटक के कलबुर्गी, शिवमोगा अन्य जगह पर रहेंगे। वह आंध्र प्रदेश में भी प्रचार करेंगे। दूसरी तरफ राहुल गांधी की न्याय यात्रा रविवार 17 तारीख को मुंबई पहुंच रही है। उससे पहले सीटों की गांठ को सुलझाने के लिए आज मुंबई में शरद पवार की एनसीपी, उद्धव शिवसेना और कांग्रेस की बैठक हो रही है। कल नासिक में राहुल की रैली में शरद पवार और उद्धव गुट के संजय राउत भी शामिल हुए थे। सूत्रों के मुताबिक, राहुल ने फंसे पेच के बारे में उद्धव ठाकरे से फोन पर बात की है।

ममता बनर्जी को लेकर कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी का बड़ा बयान

कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “… INDIA गठबंधन की ओर से बार-बार यह कहा गया है कि अगर भाजपा से मुकाबला करना है तो INDIA गठबंधन के तहत एकजुट होकर हम यह कर सकते हैं… पहले हमने देखा था कि बिहार-बंगाल की पार्टियां इसे लेकर एकजुट भी हुई थीं… ममता बनर्जी ने तो राहुल गांधी को अपना नेता भी मान लिया था लेकिन इसके बाद क्या हुआ यह उनसे पूछना चाहिए… अंदर की बात क्या है यह पता नहीं, शायद इसके पीछे कोई दूसरा राज़ हो सकता है…”

ममता बनर्जी को लेकर कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी का बड़ा बयान

कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “… INDIA गठबंधन की ओर से बार-बार यह कहा गया है कि अगर भाजपा से मुकाबला करना है तो INDIA गठबंधन के तहत एकजुट होकर हम यह कर सकते हैं… पहले हमने देखा था कि बिहार-बंगाल की पार्टियां इसे लेकर एकजुट भी हुई थीं… ममता बनर्जी ने तो राहुल गांधी को अपना नेता भी मान लिया था लेकिन इसके बाद क्या हुआ यह उनसे पूछना चाहिए… अंदर की बात क्या है यह पता नहीं, शायद इसके पीछे कोई दूसरा राज़ हो सकता है…”

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