प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को कहा कि पोलिंग बूथ पर विजय ही किसी भी चुनाव में जीत की आत्मा होती है और कार्यकर्ताओं को आगामी लोकसभा चुनाव में अपने बूथ के पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ने के लक्ष्य के साथ काम करना होगा। विश्व बैंक ने 2024 में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।वायनाड वासियों के सभी मुद्दों पर उनके साथ खड़ा हूं: राहुल गांधी,कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दिल्ली में ‘घर-घर गारंटी’ अभियान की शुरुआत की, आम आदमी पार्टी (आप) की वरिष्ठ नेता आतिशी ने बुधवार को दावा किया कि 21 मार्च को गिरफ्तार किए जाने के बाद से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का वजन तेजी से घट रहा है
ताइवान में भूकंप से 9 की मौत, 1000 घायल, 7० लोग इमारतों में फंसे, दो भारतीय लापता
ताइवान में 25 वर्षों में आए सबसे भीषण भूकंप में बुधवार को 9 लोगों की मौत हो गई और 1000 से ज्यादा घायल हो गए। दो भारतीयों के लापता होने की खबर है, जिनमें एक महिला भी है। भूकंप निगरानी एजेंसी ने कहा, भूकंप की तीव्रता 7.2 थी जबकि अमेरिकी सर्वेक्षण ने इसे 7.4 बताया। इसके चलते 70 लोग विभिन्न जगहों पर फंस गए। इसका केंद्र हुलिएन में जमीन से 35 किमी नीचे था।
भूकंप के केंद्र के पास, हुलिएन के पहाड़ी क्षेत्र स्थित कम आबादी वाले पूर्वी काउंटी में सरकारी एजेंसी ने खतरनाक कोणों पर झुकी हुई इमारतों की कई तस्वीरें दिखाईं। इस दौरान 2.3 करोड़ की आबादी वाले देश में इमारतें झुक गईं, विद्यार्थियों को स्कूल से निकाल कर खेल के मैदान में ले जाया गया। झटकों के चलते भूस्खलन की 24 घटनाएं हुईं तथा 35 सड़कें, पुल और सुरंगे क्षतिग्रस्त हो गईं।
ताइवान के साथ खड़ा है भारत: पीएम मोदी
पीएम नरेंद्र मोदी ने ताइवान में आए भूकंप से लोगों की मौत पर शोक जताया और कहा कि भारत दुख की इस घड़ी में ताइवान के लोगों के साथ खड़ा है। सोशल मीडिया में उन्होंने कहा, आज ताइवान में भूकंप के कारण हुए जानमाल के नुकसान से बहुत दुखी हूं।
चुनावी पिच पर गुगली में उलझे महारथी, बदली फिजां में मतदाता भी जुटे गुणा-भाग में
अपनी काष्ठ कला के लिए मशहूर सहारनपुर में आजकल चुनावी नक्काशी चल रही है। मोदी लहर के बावजूद पिछले चुनाव में सहारनपुर में कमल मुरझा गया था और यहां हाथी चिंघाड़ा था। मतदाता धीरे-धीरे ही सही, पर अपने मन की गांठ खोल रहा है। फिलहाल यहां इस बार मुकाबला कड़ा है। बदले समीकरणों के हिसाब से मतदाता भी उम्मीदवारों को अपनी कसौटी पर परख रहे हैं। आईपीएल सीजन में मतदाता और नेता का रिश्ता कुछ क्रिकेटिया हो गया है। प्रत्याशी डाल-डाल, तो मतदाता पात-पात। नेता समझता है मतदाता की गेंद बल्ले पर आ रही है, पर बल्ला उठाते ही चकमा दे जाती है। सहारनपुर में चुनावी चौसर का भी कुछ ऐसा ही मिजाज है। प्रत्याशी समीकरण साधने में जुटे हैं। मतदाता हैं कि गुगली फेंक रहे हैं। सियासी सवालों के सियासी जवाब दे रहे हैं। ये गुगली सबका इम्तिहान लेगी। सहारनपुर के मतदाताओं के मिजाज, अंदाज को बताती ये खास रिपोर्ट…
सहारनपुर का जिक्र हो और भला उसमें देवबंद शामिल न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। दोपहर का वक्त है और नमाज के बाद लोग वापस लौट रहे हैं। यहीं मिले बुजुर्ग अख्तर हुसैन से चुनावी माहौल को लेकर सवाल किए, तो वह बोल पड़े-रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा…। अब आप ही बताइए इसके आगे हम क्या कहें।
अख्तर के मुंह से भगवान राम का नाम भले ही चौंकाने वाला हो, पर वह पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं- सही बात तो सही ही है। उससे कैसे इन्कार करें। पास में खड़े उन्हीं के हमउम्र मोहम्मद यासीन खान भी तपाक से कहते हैं- सब अच्छा चल रहा है। हम तो मोदी के ही साथ हैं। सच बताऊं, मोदी की जब कोई काट करता है, तो दिल पर सांप-सा लोट जाता है। फरीद भी उन्हीं की हां में हां मिलाते हैं।
देवबंद का मिजाज सब जानते हैं, पर यह बदलाव है या राजनीतिक पैंतरेबाजी, इसे समझने में प्रत्याशियों के पसीने छूट रहे हैं। हालांकि सभी मतदाता गोल-गोल जवाब दे रहे हों, ऐसा नहीं है। सलमान और राशिद साफ-साफ कहते हैं, सपा-कांग्रेस का गठबंधन सहारनपुर में इस बार नया रंग दिखाएगा। इमरान मसूद की पुरानी हवा लौट रही है।
समीकरण बदले, माहौल भी बदल रहा
हम बड़गांव में ग्राम सचिवालय भवन पहुंचे तो वहां भी चुनावी मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। चंद्रपाल कहते हैं, महंगाई बहुत बढ़ रही है। काम मिल नहीं रहा है। चंद्रपाल की बातों को काटते हुए विनोद तपाक से कहते हैं, पेंशन का भी तो जिक्र करो। मुफ्त में राशन की बात क्यों नहीं उठाते?
- इस पर पूर्व प्रधान नाथीराम हस्तक्षेप करते हैं। वह कहते हैं, माहौल बदल रहा है। सहारनपुर में इस बार समीकरण बदला है। राघव लखनपाल पहले लोगों से कम मिलते थे, पर अब वह बदल गए हैं। गिले-शिकवे दूर हुए हैं। इस बार कमल खिलेगा।
- चंद्रपाल फिर बीच में कूदते हुए कहते हैं, इस बार चुनाव आसान नहीं है। देश में केवल किसान ही रहते हैं क्या, जो उनका ही बिजली बिल माफ किए। हम गरीबों के भी तो करते। विनोद प्रजापति, अशोक रुहेला कहते हैं, इस बार सहारनपुर में कमल खिलने में कोई दिक्कत नहीं है।
मतदाता भी जुटे हैं गुणा-भाग में
नांगल का बाजार भी चुनावी रंग से गुलजार है। यहां मिले प्रमोद त्यागी कहते हैं, इस बार मुकाबला कड़ा है। कैसे? इस सवाल पर वह कहते हैं, त्रिकोणीय पेच है। किसी की भी राह आसान नहीं है। पिछले चुनाव में भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल इसलिए हार गए थे, क्योंकि दलित-मुस्लिमों का काफी वोट फजलुर्रहमान को मिला था। चूंकि, पिछली बार की तरह का गठबंधन नहीं है, इसलिए इस बार कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद और बसपा के माजिद अली के बीच मुस्लिम बंटता दिख रहा है। अब आप ही बताइए, सपा का मुस्लिम वोटर भला बसपा को वोट क्यों करेगा?
मुद्दे तो हैं, पर गोलबंदी हावी
लाखनौर पहुंचे तो वहां ताश खेलने वाले जमे हुए थे। ताश के पत्तों के साथ-साथ चुनावी शह-मात का भी खेल चल रहा था। बातों-बातों में ही किसी को हराया, तो किसी को जिताया जा रहा था। चुनावी चर्चा छिड़ते ही बात रोजगार पर पहुंच गई। एक ने कहा, रोजगार होता तो क्या यहां बैठकर ताश पीटते। एक ने तेजी से अपना पत्ता चलते हुए जवाब दिया- पहले कौन सा किसी फैक्टरी में अधिकारी थे, जो अब नहीं हो। इन्हीं में से एक महाराम कहते हैं, सरकार क्या करे, जनसंख्या ही इस कदर बढ़ रही है। सरकार तो खूब सुविधाएं दे रही है। इसका असर चुनाव में भी होगा।
- विनोद कुमार कहते हैं, कानून-व्यवस्था बेहतर है, पर इस समय काम कम मिल रहा है। गोध्यान कहते हैं, सब सही है। बहनजी खुलकर नहीं खेल पा रही हैं। यदि वो खुलकर खेलतीं, तो दूसरे दलों के छक्के छूट जाते। फिर भी काफी वोट बसपा के माजिद को जाएगा और बसपा यह सीट बचा लेगी। हां, यह भी सही है कि काफी दलित वर्ग भाजपा को भी वोट कर रहा है।
- सहारनपुर शहर में भी चुनावी रंग पक्का हो चुका है। गौरव सुखीजा, मोंटू कालड़ा कहते हैं, यहां के काष्ठ पर काम हुआ। अब यह सरकार की प्राथमिकताओंे में है। हालांकि अभी और सुविधाओं की दरकार है। इस बार इस सीट पर भी बदलाव होगा। शक्ति, दीपक, विजय, भूपेंद्र का भी मानना है कि यहां बदलाव होगा, पर वे यह भी जोड़ते हैं कि लड़ाई कड़ी होगी।
बड़ा सवाल- मुस्लिम किस ओर
सहारनपुर सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक होने से सभी की नजर उनपर है। बड़ा सवाल है कि मुसलमान किसे वोट देंगे। बसपा के माजिद और कांग्रेस के इमरान मसूद दोनों ही के अपने-अपने दावे हैं। उधर, भाजपा को इसका लाभ तो दिख रहा है, पर पिछले चुनाव के समीकरणों पर भी गौर करना होगा। पिछले चुनाव में इसी तरह से दो मुस्लिम प्रत्याशी थे और बसपा के हाजी फजलुर्रहमान जीत गए थे। हालांकि उस समय समय सपा, बसपा और रालोद का गठबंधन भी था।
हर बार बदल रही हाथी की सवारी
बसपा उम्मीदवार हर साल बदल रहे हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में जगदीश राणा, 2019 में हाजी फजलुर्रहमान और अब माजिद अली मैदान में हैं। माजिद भी पुराने धुरंधर हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरे हैं। देखना यह है कि इस बार हाथी की सवारी का कितना लाभ उन्हें मिलता है। (इनपुट विनीत तोमर)
कानून-व्यवस्था अहम
सवाल तो बहुत हैं, पर एक मुद्दा ऐसा है जिसकी चर्चा सब जगह मिली। वह है-कानून-व्यवस्था। हकीकतनगर चौक में मिलीं महिलाओं से हमने इसपर चर्चा की। सुनीता रानी बोलीं, यह सबसे बड़ा मुद्दा था। इसमें काफी सुधार हुआ है। नीना, दीपिका आशा, विनिता, सिमी भी उनकी हां में हां मिलाती हैं। वे कहती हैं, सुरक्षा हर किसी के लिए जरूरी है। इसका लाभ भाजपा को मिल रहा है।
ज्यादातर चेहरे पुराने, दांव नए
सहारनपुर लोकसभा सीट पर चुनावी दंगल में उतरे दिग्गजों में अधिकतर पुराने ही हैं। भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल और कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद पहले भी दो बार आमने-सामने हो चुके हैं। वहीं बसपा के माजिद अली पहली बार मैदान में हैं।
- 2014 के चुनाव में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। भाजपा की तरफ से राघव लखनपाल और कांग्रेस की तरफ से इमरान मसूद मैदान में थे। भाजपा के राघव लखनपाल ने 4,72,999 वोट हासिल कर जीत का परचम फहराया था। दूसरे स्थान पर रहे इमरान मसूद को 4,07,909 वोट और तीसरे स्थान पर रहे बसपा के जगदीश राणा को 2,35,033 वोट मिले थे।
- 2019 के चुनाव में पहिया एक बार फिर घूमा और इन्हीं दलों से दोनों फिर से मैदान में आ गए। हालांकि गठबंधन में बसपा की तरफ से चुनाव लड़ रहे हाजी फजलुर्रहमान ने 5,14,139 वोटों के साथ जीत दर्ज की। वहीं 4,91,722 वोटों के साथ भाजपा के राघव लखनपाल दूसरे स्थान पर और 2,07,068 वोटों के साथ इमरान मसूद तीसरे स्थान पर रहे थे।
कच्चातिवु: इस विवाद का कोई अंत नहीं…, क्षेत्रीय खींचतान के बीच सबसे पहले राष्ट्रीय हित पर विचार जरूरी
भारत और श्रीलंका के बीच स्थित कच्चातिवु द्वीप पर मौजूदा चुनाव के दौरान छिड़ी बहस के मुख्य निशाने पर मछुआरे हैं, जो महत्वपूर्ण वोटबैंक हैं। हैरानी की बात नहीं कि राजनीति ने दोनों पड़ोसी देशों के नाजुक रिश्ते और कूटनीति को इस बहस में खींच लिया है।
तमिलनाडु के नेता नियमित रूप से मांग करते रहे हैं कि कच्चातिवु को श्रीलंका से ‘वापस’ लिया जाए, क्योंकि इसे ‘बिना सोचे-समझे’ सौंपा गया था। उन्हें अदालत से भी यही जवाब मिला कि इसके मूल में एक समझौता है, जिसे पलटा नहीं जा सकता। पर इसमें सबसे ज्यादा नुकसान मछुआरों के अधिकारों का हो रहा है।
यह भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई है। तमिलनाडु में बारी-बारी से राज करने वाली द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच वास्तव में 1974 के समझौते पर कोई विवाद नहीं है, जिसके तहत कच्चातिवु श्रीलंका का हिस्सा बन गया। न तो द्रमुक, जो समझौते के समय भी राज्य की सत्ता में थी और अब भी सत्ता में है, और न ही अन्नाद्रमुक ने, जो अब विपक्ष में है, समझौते पर सवाल उठाया है, लेकिन वे मछुआरों के हितों की रक्षा करना चाहते हैं। अन्नाद्रमुक की ओर से विरोध हो सकता था, लेकिन वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में बहस में शामिल नहीं हुई, जिन्होंने इस मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ हमला बोला था। लगभग 50 साल पहले इंदिरा गांधी की सरकार ने करुणानिधि के नेतृत्व में तमिलनाडु की सरकार से परामर्श करने के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर किया था। अन्नाद्रमुक किसी राष्ट्रीय पार्टी से गठबंधन किए बिना अपने दम पर लोकसभा का चुनाव लड़ रही है। वह यही चाहती है कि उसकी संस्थापक नेता और चार बार की मुख्यमंत्री रह चुकीं जयललिता को मछुआरों के एकमात्र उद्धारकर्ता के रूप में देखा जाए।
इस मुद्दे पर फिर से बयानबाजी शुरू हो गई है। अन्नाद्रमुक के महासचिव एडापड्डी के. पलानीस्वामी ने विगत दो अप्रैल को कच्चातिवु की ‘पुनर्प्राप्ति’ के लंबित मामले में भाजपा को सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर करने की चुनौती दी। इसे जयललिता ने दायर किया था। पलानीस्वामी ने मोदी सरकार को चुनौती दी कि केंद्र सुप्रीम कोर्ट को बताए कि कच्चातिवु द्वीप को सौंपने के मामले पर पुनर्विचार किया जाएगा। वह जानते हैं कि केंद्र श्रीलंका के साथ ताजा विवाद नहीं चाहता है। इसलिए हमारे पास बहस का तीसरा पक्ष है।
मौजूदा बहस तमिलनाडु भाजपा प्रमुख के. अन्नामलाई के एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) जवाब को लेकर है। उन्होंने कहा है कि ‘भारत का महत्वपूर्ण टुकड़ा’ देने से तमिलनाडु के ‘मछुआरे भाइयों और बहनों’ के लिए परेशानी पैदा हो गई है। एक वीडियो में, उन्होंने ‘श्रीलंका को कच्चातिवू सौंपने में मिलीभगत’ के लिए कांग्रेस और द्रमुक पर निशाना साधा। मीडिया के एक वर्ग द्वारा सामने लाए गए ‘नए तथ्यों’ पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मोदी ने उन्हें ‘आंखें खोलने वाला’ और ‘चौंकाने वाला’ बताया और इंदिरा गांधी सरकार पर राष्ट्रीय हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया। उनकी पार्टी और गठबंधन के अन्य लोग भी इसमें शामिल हो गए।
प्रधानमंत्री मोदी की बयानबाजी का जवाब देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पूछा कि क्या मोदी सरकार एक पुराने समझौते और एक ऐसे मुद्दे को फिर से खोलना चाहती है, जो श्रीलंका के साथ संबंधों को खराब कर सकता है। यह बयानबाजी भी है, लेकिन एक चेतावनी भी, क्योंकि कोलंबो में मछुआरे और सरकार, दोनों इस मुद्दे पर काफी संवेदनशील हैं।
चुनाव चाहे तमिलनाडु, भारत या श्रीलंका में हो और सत्ता में चाहे जो भी रहे, चुनाव से पहले या बाद में असली मुद्दा दोनों तरफ मछुआरों के मछली पकड़ने का अधिकार है। भारतीय क्षेत्र में मछली उत्पादन तेजी से कम हो रहा है और कई ट्रॉलर चलाने वाले भारतीय मछुआरों पर श्रीलंका तट के करीब पानी में मछली पकड़ने के आरोप लगाए गए हैं। स्वाभाविक रूप से इससे श्रीलंका परेशान है। यह कभी नहीं खत्म होने वाला मुद्दा है। इस क्षेत्र में सदियों से मछली पकड़ने वाले तमिलनाडु के मछुआरे कई बार कच्चातिवु से आगे श्रीलंकाई पानी में चले जाते हैं और उत्तरी श्रीलंकाई तट के पास मछली पकड़ते हैं। उन्हें श्रीलंकाई नौसेना गिरफ्तार कर लेती है। तमिलनाडु में राजनीतिक दल जब हंगामा करते हैं, तो केंद्र सरकार कूटनीतिक हस्तक्षेप करती है और फिर उन्हें छोड़ा जाता है।
साल-दर-साल यह चक्र दोहराया जाता है और इसका कोई अंत नहीं दिखता। तमिलनाडु के राजनेता नियमित रूप से मांग करते हैं कि कच्चातिवु को श्रीलंका से ‘वापस’ लिया जाए, क्योंकि भारत ने इसे ‘बिना सोचे-समझे’ सौंप दिया था। वर्ष 2008 में अन्नाद्रमुक और वर्ष 2013 में द्रमुक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन केवल यह बताया गया कि द्वीप की वर्तमान स्थिति एक समझौता है, जिसे पलटा नहीं जा सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के समर्थन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि तमिलनाडु की सरकारें केंद्र सरकार से शिकायतें करती रही हैं। यह मुद्दा मूलतः मछुआरों का है। उन्होंने कहा कि ‘श्रीलंका ने 6,184 मछुआरों और 1,175 नावों को हिरासत में लिया है।’ यह सच है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है और न ही इसके खत्म होने की संभावना है। इसमें किसी देश की ‘संप्रभुता’ नहीं, बल्कि मछली पकड़ने का अधिकार शामिल है। यह ध्यान देना जरूरी है कि गुजरात के मछुआरों का पाकिस्तान के साथ विवाद है और पश्चिम बंगाल एवं ओडिशा के मछुआरों का बांग्लादेश के साथ। गुजरात में सौराष्ट्र एवं कच्छ के सैकड़ों लोगों को पाकिस्तान के जल क्षेत्र में जाने के लिए हिरासत में लिया गया है और हजारों पाकिस्तानी भी भारतीय जेलों में तब तक के लिए बंद हैं, जब तक कि उनके मामले कूटनीतिक रूप से और दोनों देशों की अदालतों द्वारा हल नहीं हो जाते। तमिलनाडु में यह मुद्दा क्यों चर्चा में है, सिवाय इसके कि अभी लोकसभा के चुनाव हैं? यह मुद्दा मछुआरों के अधिकारों और वोट व सत्ता के लिए होड़ करने वाली दो द्रविड़ पार्टियों के बीच राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित है।
वर्ष 2009 में जातीय हिंसा खत्म होने के बाद से श्रीलंका के साथ भारत के रिश्ते धीरे-धीरे सुधरे हैं। क्या कच्चातिवु का मुद्दा इस रिश्ते को बिगाड़ने वाला है? सबसे महत्वपूर्ण बात है कि चीन पूरे दक्षिण एशिया में भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है। इस पूरे क्षेत्र में खींचतान को देखते हुए हमें सोचना होगा कि क्या इस तरह के घरेलू और चुनावी मुद्दे हमारे राष्ट्रीय हित में हैं!
कोचिंग राष्ट्र बनने की दिशा में देश,नौकरियों को पुनर्जीवित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता देना जरूरी
शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट 2023, ग्रामीण भारत के 14 से 18 वर्ष की आयु के युवाओं के बीच शिक्षा के निराशाजनक परिदृश्य पर रोशनी डालती है। पढ़ने के कौशल में आठवीं कक्षा के 30 फीसदी ग्रामीण छात्र दूसरी कक्षा के मानक पाठ नहीं पढ़ सकते। इसी तरह अंकगणित कौशल में आठवीं कक्षा के 55 फीसदी ग्रामीण छात्र बुनियादी भाग करने में असमर्थ थे। जबकि अंग्रेजी समझ एवं कौशल में, आठवीं कक्षा के आधे ग्रामीण छात्र आसान वाक्यों को पढ़ने में असमर्थ थे और जो पढ़ सकते थे, उनमें से लगभग एक तिहाई छात्र अर्थ बताने में असमर्थ थे।

स्कूली शिक्षा में सीखने के अपर्याप्त परिणामों को देखते हुए समकालीन भारत में कोचिंग संस्थानों का विस्तार होना स्वाभाविक है। शिक्षा की वार्षिक स्थिति रिपोर्ट 2022 ने बताया कि कक्षा एक से आठवीं तक के 30.5 फीसदी ग्रामीण छात्र सशुल्क निजी कोचिंग कक्षाएं ले रहे थे। स्कूली शिक्षा में मूलभूत कौशल और गहन सोच कौशल की कमी के कारण निजी कोचिंग पर निर्भरता जरूरी हो गई है। जैसे-जैसे छात्र उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, कोचिंग पर निर्भरता बढ़ती जाती है। भारत एक कोचिंग राष्ट्र में बदल गया है, न केवल महानगरीय शहरों में, बल्कि छोटे शहरों में भी।
सरकारी नौकरियों की इच्छा, जो सामाजिक सुरक्षा के साथ आती है, शायद ग्रामीण छात्रों को आगे बढ़ने के लिए यही एकमात्र रास्ता हो। भारत के 91 फीसदी कार्यबल अनौपचारिक रोजगार में है, जिसे सामाजिक बीमा के बिना रोजगार के रूप में परिभाषित किया गया है, अर्थात वृद्धावस्था पेंशन, मृत्यु/विकलांगता बीमा, स्वास्थ्य और मातृत्व लाभ इत्यादि से वंचित रोजगार।
वर्ष 2022-23 में स्नातकों के लिए बेरोजगारी दर 13.4 फीसदी और स्नातकोत्तर और उससे ऊपर के लोगों के लिए 12.1 फीसदी रही, जो राष्ट्रीय औसत बेरोजगारी दर 3.2 फीसदी (15 वर्ष और उससे अधिक आयु) से लगभग चार गुना है।
भारत में बेरोजगारी की स्थिति एक प्रमुख सामाजिक मुद्दा बनी हुई है। अगर नौकरियां नहीं मिलेंगी, तो छात्र कहां जाएंगे? वर्ष 2017-18 से 2022-23 की अवधि में कृषि क्षेत्र में छह करोड़ श्रमिकों की वृद्धि हुई है! आखिरी पीएलएफएस जुलाई, 2022 और जून, 2023 के बीच भी 80 लाख श्रमिकों को कृषि में जोड़ा गया था। निजी नौकरियों में रोजगार की अनिश्चितता को देखते हुए यह उनकी मजबूरी ही थी।
अधिकांश सरकारी नौकरियों के लिए भी परीक्षा में अंग्रेजी कौशल मुख्य घटकों में से एक है। जबकि आबादी की मुख्य भाषा और स्कूली शिक्षा का माध्यम हिंदी बनी हुई है। प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए अंग्रेजी कौशल की आवश्यकता होती है, जिसके लिए कोचिंग अपरिहार्य हो जाती है।
माता-पिता की उम्मीदें ऊंची बनी हुई हैं और उम्मीदवारों को प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग लेने के लिए प्रेरित किया जाता है। सफलता और विफलता को परिभाषित करने में कोचिंग एक महत्वपूर्ण कारक साबित हो सकती है।
सभ्य गैर-कृषि रोजगार की अनुपलब्धता, रुकी हुई सरकारी नौकरियां और सीमित सरकारी नौकरियों के साथ-साथ उच्च शिक्षा के लिए युवाओं के बीच अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा है, जिसने छात्रों को ट्यूशन और कोचिंग में धकेल दिया है। कुल मिलाकर, शिक्षा का मौलिक अधिकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार में तब्दील नहीं हुआ है, इसलिए निजी ट्यूशन और कोचिंग संस्थान तेजी से बढ़ रहे हैं।
कोचिंग संस्थान लंबे समय तक एक अनियमित बाजार बने रहे, और कई शिकायतों और छात्रों की आत्महत्याओं के बाद ही सरकार कोचिंग सेंटरों को संचालित करने के लिए दिशा-निर्देश लेकर आई है। ‘कोचिंग सेंटर का पंजीकरण और विनियमन, 2024’ दिशा-निर्देश कोचिंग सेंटरों को भ्रामक वादे करने या सफलता की गारंटी देने से रोकते हैं।
हालांकि, इसका उपाय स्कूली शिक्षा, उच्च अध्ययन और प्रतियोगी परीक्षाओं की नींव में सीखने के परिणामों में सुधार करना है। इसके अलावा, हर कोई कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकता और सरकारी नौकरी की आकांक्षा नहीं कर सकता। गैर-औद्योगिकीकरण और संरचनात्मक परिवर्तन के उलट होने की स्थिति में जो कुछ बचा है, वह है गिग इकनॉमी, जो बिना किसी सामाजिक सुरक्षा जाल के कार्यबल को केवल निर्वाह प्रदान करती है। इस प्रकार, समकालीन भारत में नौकरियों को पुनर्जीवित करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
शिंदे का दिया साथ लेकिन उन्होंने ही काटा भावना गवली और हेमंत पाटील का टिकट
शिवसेना में बगावत के बाद उद्धव का साथ छोड़ शिंदे सेना का साथ देने वाले दो सांसदों को एकनाथ शिंदे पर भरोसा करना महंगा पड़ गया है। शिंदे ने हिंगोली के सांसद हेमंत पाटील को टिकट न देकर भी उनका पत्ता काट दिया है। वहीं, यवतमाल वाशिम से पांच बार की सांसद भावना गवली का भी टिकट कट गया है। रामटेक के सांसद कृपाल तुपाने का टिकट पहले ही काटा जा चुका है। हंगोली से हेमंत की जगह पर बाबूराव कदम कोहलीकर को टिकट दिया है, जबकि यवतमाल वाशिम से भावना की जगह राजश्री पाटील को उम्मीदवारी दी है। बीजेपी विधायक तानाजी मुटकुले ने हेमंत की उम्मीदवारी का विरोध किया था। आखिरकार, बीजेपी के दबाव के बाद हेमंत की उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। इस फैसले से हेमंत सहमत नहीं थे। मंगलवार देर रात तक मुख्यमंत्री के बंगले पर हेमंत के समर्थक जमा थे। आखिरकार, शिंदे ने उन्हें आश्वासन दिया कि पत्नी को यवतमाल-वाशिम से उम्मीदवार बनाया जाएगा। इसके बाद रात 2 बजे वर्षा बंगले पर हंगामा समाप्त हुआ।
बुधवार शाम भावना की जगह राजश्री ने नाम की घोषणा कर दी गई। राजश्री गुरुवार को यवतमाल लोकसभा क्षेत्र के लिए आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में आवेदन पत्र दाखिल करने जा रही हैं।
अब भावना गवली क्या करेंगी?
इस फैसले से नाराज भावना ने मीडिया से कहा कि उन्होंने अब तक यवतमाल-वाशिम सीट पर दावा नहीं छोड़ा है। वह यवतमाल-वाशिम से उम्मीदवारी दाखिल करने जा रही हैं। देखना है कि क्या भावना महायुति की आधिकारिक उम्मीदवार राजश्री के खिलाफ बगावत करेंगी? अगर भावना सच में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा भरती हैं, तो राजश्री को बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
दो और सांसदों पर तलवार लटकी
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में दो और सांसदों पर टिकट कटने की तलवार लटक रही है। इनमें नासिक के वर्तमान सांसद हेमंत गोडसे और हातकणंगले के सांसद धैर्यशील माने हैं। हेमंत की लाख कोशिशों के बावजूद उनके नाम की घोषणा नहीं हुई है। वहीं, पहली लिस्ट में धैर्यशील के नाम की घोषणा की गई थी, लेकिन उनकी उम्मीदवारी भी संकट में है। स्थानीय बीजेपी नेता उनका कड़ा विरोध कर रहे हैं। खबर है कि हेमंत पाटील की तरह ही धैर्यशील की मां निवेदिता माने को उम्मीदवारी दी जा सकती है।
शिंदे के साथ जाने वाले सांसदों के टिकट कटने पर शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के नेता अंबादास दानवे ने सोशल मीडिया पर लिखा है, ‘गद्दारो, अब कहां जाओगे? लोकसभा तो ट्रेलर है, विधानसभा में पूरी पिक्चर दिखेगी। शिवसेना में मातोश्री से मिल रहे सम्मान को हेमंत पाटील पचा नहीं पाए और उन्होंने अपनी आजादी को छोड़कर बीजेपी की गुलामी स्वीकार कर ली, इसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा है। इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि उनकी घोषित उम्मीदवारी केवल बीजेपी के दबाव के कारण बदलनी पड़ रही है। किसी ने कभी भी उद्धव साहब पर इस तरह का दबाव बनाने की हिम्मत नहीं की।’
गूगल हुआ देसी! महंगी अंग्रेजी बोल नहीं कर पाएंगे फ्रॉड,
ऑनलाइन फ्रॉड के केस में देखा जाता है, कि सामने वाला हाई-फाई अंग्रेजी बोलकर ऑनलाइन ठगी को अंजाम दे जाता है। साथ ही अगर कोई यूजर फेक वेबसाइट या फोटो की जांच करना चाहता है, तो अंग्रेजी न आने की वजह से मायूस होना पड़ता है। हालांकि अब ऐसा नहीं होगा, क्योंकि गगूल देसी हो चला है। कहने का मतलब है कि गूगल ने अपने दो फैक्ट चेक टूल को अंग्रेजी समेत 40 लोकल लैंग्वेज का सपोर्ट दे दिया है।
चेक कर पाएंगे बैकग्राउंड
गूगल ने ऐलान किया है कि उसके दो फीचर जैसे – About this image और About this page को हिंदी समेत कुल 40 लैंग्वेज में उपलब्ध करा दिया गया है। इन टूल की मदद से यूजर किसी भी कंटेंट का गूगल सर्च पर बैकग्राउंड चेक कर पाएंगे।जबकि “About this result” यूजर्स किसी भी वेबसाइट पर क्लिक करने से पहले उसकी बैकग्राउंड को चेक कर पाएंगे। इसके अलावा “About this image” की मदद से फोटो के सोर्स और कॉन्टेक्स्ट को चेक कर पाएंगे।
इन लैंग्वेज का मिलेगा सपोर्ट
गूगल ब्लॉग पोस्ट की मानें, तो इन फीचर को पिछले साल ग्लोबली अंग्रेजी लैंग्वेज सपोर्ट के साथ पेश किया गया था, जिसमें वर्ल्ड वाइड 40 अतिरिक्त लैंग्वेज को ऐड किया गया है। इसमें फ्रेंच, जर्मन, हिंदी, इटैलियन, जापानी, कोरियन, पुर्तगाल, स्पेनिश, वियतनामीज शामिल हैं।
फर्जी खबरों पर लगा पाएंगे लगाम
पिछले माह Google ने अपने सर्च पेज पर मौजूद फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं पर रोक लगाने को कई कदम उठाने का ऐलान किया है। Google डीपफेक जैसी फर्जी ऑनलाइन सूचनाओं का पता लगाने का काम कर रहा है। इसके साथ ही गूगल जेमिनी एआई चैटबॉट को चुनाव से जुड़े किसी सवाल का जवाब देने से रोक रही है।
भाजपाइयों से हमारा कार्यकर्ता डरने वाला नहीं है- आप नेता संजय सिंह
तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद आप नेता संजय सिंह ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपाइयों से हमारा कार्यकर्ता डरने वाला नहीं है। आप लाठी चलाओगे न? आपके पास जितनी मजबूत लाठी है उससे ज्यादा मजबूत हमारे कंधे हैं, उससे मजबूत आम आदमी पार्टी के एक-एक कार्यकर्ता का जज़्बा है।
जेल के ताले टूटेंगे और सारे नेता छूटेंगे- संजय सिंह
जेल से बाहर आते ही समर्थकों को संबोधित करते हुए संजय सिंह ने कहा कि ये संघर्ष करने का समय है, जेल के सभी ताले टूटेंगे और सारे नेता छूटेंगे। बता दें कि संजय सिंह दिल्ली आबकारी नीति मामले में जेल में बंद थे।
7 अप्रैल को देशभर में AAP रखेगी सामूहिक उपवास
दिल्ली सरकार में मंत्री और AAP नेता गोपाल राय ने कहा कि सात अप्रैल को देशभर में सामूहिक उपहास किया जाएगा। CM अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के विरोध में AAP के सभी मंत्री, विधायक, सांसद और पार्टी नेता 7 अप्रैल को जंतर-मंतर पर ‘सामुहिक उपवास’ रखेंगे। हम लोगों से यह भी अपील करते हैं कि जो लोग CM अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी के खिलाफ हैं और लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं और इस देश से प्यार करना चाहते हैं, वे भी अपने घरों, गांवों, ब्लॉकों पर ‘सामुहिक उपवास’ कर सकते हैं।
विदेश नीति की समस्याओं को कांग्रेस के जमाने से ट्रेस किया जा सकता है: हर्ष वर्धन श्रृंगला
पूर्व विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने कहा कि अगर इतिहास की ओर देखें तो विदेश नीति की समस्याओं को कांग्रेस के जमाने से ट्रेस किया जा सकता है, यह या तो प्रधानमंत्री(पूर्व) नेहरू के समय से या फिर प्रधानमंत्री(पूर्व) इंदिरा गांधी के समय से आती हैं। चीन की समस्याओं की बात करें तो यह भी नेहरू की समयकाल से आ रही हैं… आखिरकार आपने लद्दाख का इतना हिस्सा चीन को कैसे दिया? अभी के समय में आप अगर प्रधानमंत्री के कार्यकाल के दौरान की विदेश नीति देखें, जो घटनाएं 2020 में हुई हैं, हमने इन्हें एक इंच भी नहीं दी है… डोकलाम के विषय में भी हम बिल्कुल पीछे नहीं हटे थे, इसका नतीजा था कि उन्होंने और जगह लेने की कोशिश नहीं की। जब हमारे क्षेत्रीय अखंडता का सवाल होता है तो इन मुद्दों पर प्रधानमंत्री की दृढ़ नीति रही है जिससे हम पीछे नहीं हटेंगे। इतिहास में हुई समस्याओं को हम देख सकते हैं कि हम इन्हें किस प्रकार सुधार सकें।