प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 44वें स्थापना दिवस के मौके पर शनिवार को कहा कि भाजपा भारत की पसंदीदा पार्टी बन गई है।छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में तीन नक्सली मारे गए।कविता ने तिहाड़ में उनसे पूछताछ की सीबीआई की याचिका के विरोध में अदालत का रुख किया,आबकारी नीति घोटाला मामला: मनीष सिसोदिया की न्यायिक हिरासत 18 अप्रैल तक बढ़ाई गई,लोकसभा चुनाव : कांग्रेस ने छह और उम्मीदवार घोषित किए, दक्षिण गोवा के सांसद का टिकट कटा, दिल्ली की एक अदालत ने कथित आबकारी नीति घोटाला मामले आम आदमी पार्टी नेता मनीष सिसोदिया की न्यायिक हिरासत शनिवार को 18 अप्रैल तक बढ़ा दी।
सोनम वांगचुक और एलएबी का सीमा मार्च रद्द, प्रशासन पर आरोप के साथ कहा- जारी रहेगा शांतिपूर्ण आंदोलन

लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) ने सात अप्रैल को चीन सीमा तक मार्च निकालने के फैसले को स्थगित कर दिया है। एलएबी के पदाधिकारियों ने शनिवार को आरोप लगाया कि सीमा मार्च से पहले प्रशासन ने लेह को युद्ध क्षेत्र में बद दिया है। इसलिए किसी भी प्रकार के टकराव से बचने के लिए प्रस्तावित कार्यक्रम को रद्द किया जाता है।एलएबी के पदाधिकारियों ने शनिवार को आरोप लगाया कि सीमा मार्च से पहले प्रशासन ने लेह को युद्ध क्षेत्र में बद दिया है। इसलिए किसी भी प्रकार के टकराव से बचने के लिए प्रस्तावित कार्यक्रम को रद्द किया जाता है।
पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक और एलबीए के अध्यक्ष छेरिंग दोर्जे ने शनिवार को प्रेसवार्ता में कहा कि शांतिपूर्ण आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने चांगथांग के पशमीना उत्पादकों की दुर्दशा के बारे में देश के लोगों के बीच जागरूकता पैदा करने का उद्देश्य पहले ही हासिल कर लिया है, जो दक्षिण में विशाल औद्योगिक संयंत्र और उत्तर में चीनी अतिक्रमण के कारण चारागाह भूमि खो रहे हैं।
लेह में मौजूदा स्थिति को देखते हुए सरकार एक पागल हाथी की तरह काम कर रही है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा या लोगों की भावनाओं व उनकी समस्याओं की कोई परवाह नहीं। इसकी एकमात्र चिंता चुनाव जीतना है और यह किसी भी कीमत पर लोगों को मार्च करने से रोक सकती है। हम राष्ट्रीय सुरक्षा और शांतिपूर्ण माहौल को लेकर चिंतित हैं।
लद्दाख में जमीनी स्थिति के बारे में देश में जागरूकता पैदा करने का हमारा उद्देश्य हासिल हो गया है, इसलिए हम लोगों के हित में और टकराव से बचने के लिए प्रस्तावित सीमा मार्च को वापस ले रहे हैं। चरवाहों की स्थिति को उजागर करने के लिए एलएबी ने चीन सीमा के पास चांगथांग तक सीमा (पश्मीना) मार्च की घोषणा की थी।
इससे पहले जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) संतोष सुखदेव ने शुक्रवार को कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत जारी निषेधाज्ञा सात अप्रैल को लागू होगी और निर्देश दिया कि प्रशासन की मंजूरी के बिना कोई जुलूस नहीं निकलेगा।
वांगचुक ने कहा कि वे पहले से उम्मीद कर रहे थे कि सरकार मार्च को रोक देगी, क्योंकि कई चीजें हैं, जिन्हें छिपाकर रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्ण दंगा सामग्री के साथ पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती, वॉलंटियर्स को पुलिस स्टेशनों पर बुलाना और उन्हें धमकाना, इसके अलावा लेह को युद्ध क्षेत्र में बदलने के बाद लोगों को असुविधा पैदा करना दर्शाता है कि एक सोची समझी साजिश के तहत झड़प की संभावना है।
वांगचुक ने कहा कि वे अपनी मांगों को उजागर करने के लिए शांति और शांतिपूर्ण तरीकों में दृढ़ता से विश्वास करते हैं, जिनमें पश्मीना चरागाहों की मौजूदा स्थितियों से जुड़ी मांगें भी शामिल हैं। एलएबी ने लोगों, विशेषकर मरीजों, पर्यटकों और छात्रों को किसी भी असुविधा से बचने के लिए निषेधाज्ञा आदेशों को तत्काल वापस लेने और इंटरनेट सेवाओं को सामान्य गति से बहाल करने की मांग की।
कीटनाशकों से विषाक्त हुई कृषि-बागवानी, धरातल पर नहीं उतरीं प्राकृतिक खेती की योजनाएं
हिमाचल की कृषि और बागवानी में कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से विषाक्त हो रही है। राज्य में प्राकृतिक खेती के लिए सरकारें कई तरह के अभियान चलाने की बातें करती हैं, बजट में भी हर साल घोषणाएं होती हैं, लेकिन धरातल पर काम नहीं हो रहा। इससे देवभूमि की कृषि-बागवानी में जहर घुलने का सिलसिला कम नहीं हो रहा है। हर पांच साल के बाद जनता सांसद भी इसी उम्मीद के साथ चुनती हैं कि वे भी प्राकृतिक खेती करने की दिशा में प्रयास कर केंद्रीय योजनाओं के तहत बजट लाएंगे, मगर वे भी इस दिशा में कुछ कर नहीं पाए। प्राकृतिक खेती के नाम पर 10-20 करोड़ रुपये का बजट तय कर इतिश्री कर ली जाती है।राज्य में प्राकृतिक खेती के लिए सरकारें कई तरह के अभियान चलाने की बातें करती हैं, बजट में भी हर साल घोषणाएं होती हैं, लेकिन धरातल पर काम नहीं हो रहा
प्रदेश में सेब बागवानी का करीब 5,000 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार है। ज्यादातर बागवानों को सेब बागवानी प्राकृतिक तरीके से करना संभव नहीं लगती है। परिवार के भरण-पोषण के लिए राज्य के लाखों बागवान सेब की फसल पर ही निर्भर रहते हैं। वे बागवानी की प्रचलित तकनीकों को त्यागकर इस स्थिति में नहीं हैं कि प्राकृतिक खेती के लिए प्रयोग करें। कुछ जगहों पर प्राकृतिक विधि से सेब की फसल उगाने के प्रयास हुए हैं, मगर अपनी फसल से मुनाफा नहीं कमा पाए। वजह इसके लिए मार्केट न होना है। दूसरी बात यह भी है कि सेब की फसल में कई तरह के रोगों से निपटने के लिए पहले तो जैविक दवाएं ही उपलब्ध नहीं हो पातीं और अगर हो भी जाएं तो इनकी कीमत रासायनिक दवाओं से ज्यादा होती है। रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल भी जरूरी हो गया है।
इसी तरह से राज्य में उगाए जाने वाले प्रमुख खाद्यान्नों की बात करें तो इनमें मक्की, गेहूं और धान शामिल हैं। दलहनों में राजमाह, माश, चना आदि हैं। सब्जियों की बात करें तो प्रदेश में टमाटर, शिमला मिर्च, मटर आदि की खेती भी खूब हो रही है। मशरूम भी उगाई जाती है। इनमें से शायद ही कोई फसल ऐसी हो, जो बड़े स्तर पर प्राकृतिक तरीके से ही उगाई जाती हो।
घर पर बनी दवा का छिड़काव करके कर सकते हैं बचाव
आज बीमारियों का कारण ही यही है कि हमें जहर युक्त खाना परोसा जा रहा है। धरती रसायनों के डालने से बीमार हुई है। प्राकृतिक तरीके से रोगों और कीटों का निदान करने वाली प्रणाली प्रभावित हुई है। जमीन में लाभकारी बैक्टीरिया खत्म हो गए। फसल को प्राकृतिक तरीके से घर पर बनी दवा का छिड़काव कर बचाया जा सकता है। लस्सी का प्रयोग भी फफूंदनाशक के रूप में किया जा सकता है। जंगलों में जो फल उगते हैं, उनमें बीमारियां क्यों नहीं होती है, क्योंकि वहां रसायनों का छिड़काव नहीं किया जाता है। अब प्रदेश के कृषि और बागवानी विश्वविद्यालयों में इस संबंध में अध्ययन हो रहे हैं, यह सुखद बात है। -पद्मश्री नेक राम शर्मा, करसोग
प्राकृतिक खेती के नाम पर भाजपा ने ड्रामेबाजी
प्राकृतिक खेती के नाम पर भाजपा ने सिर्फ ड्रामेबाजी की। हमारी सरकार ने ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए न सिर्फ जमीनी स्तर पर काम किया है, बल्कि ऑर्गेनिक खेती से तैयार उपज के लिए समर्थन मूल्य भी घोषित किया है। ऑर्गेनिक तरीके से गेहूं और मक्की पैदा करने वालाें को पूरे देश में सबसे अधिक 40 और 30 रुपये किलो एमएसपी देने का घोषणा की है। आर्गेनिक खेती से कम उत्पादन के चलते किसानों को नुकसान न हो इसके लिए यह व्यवस्था की गई है। मानव स्वास्थ्य के साथ मृदा स्वास्थ्य के लिए आर्गेनिक खेती महत्वपूर्ण है।-चंद्र कुमार, कृषि मंत्री, हिमाचल सरकार
डेढ़ साल की अपनी उपलब्धि बताए कांग्रेस
भाजपा सरकार में कृषि मंत्री रहे वीरेंद्र कंवर का कहना है कि कांग्रेस आंखों में धूल झोंकने का प्रयास कर रही है। सरकार को अपनी डेढ़ साल की उपलब्धि बतानी चाहिए। भाजपा सरकार के समय प्रदेश में डेढ़ लाख किसान प्राकृतिक खेती के लिए चुने गए थे। प्राकृतिक उत्पादों के विपणन के लिए अलग मंडियां स्थापित करने की भी योजना बनाई थी। प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना समय की मांग है। जो शुरुआत हमने की उसे मौजूदा सरकार आगे बढ़ा रही है यह अच्छी बात है। सरकार को अपने प्रयासों के परिणाम भी बताने चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी नेचुरल खेती के प्रति गंभीर हैं।
1,78,643 किसानों ने प्राकृतिक खेती का विकल्प चुना
प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत राज्य में 1,78,643 किसानों ने 24,210 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती का विकल्प चुना है। वित्त वर्ष 2023-24 में अतिरिक्त 50 हजार बीघा भूमि को कवर करने का लक्ष्य रखा गया।
प्राकृतिक खेती से उत्पादन बढ़ा, गुणवत्ता में भी सुधार
छह सालों से प्राकृतिक खेती कर रहा हूं। इससे न सिर्फ सेब का उत्पादन बढ़ा है बल्कि गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। प्राकृतिक खेती से जमीन में केंचुओं और मित्र कीटों की संख्या बढ़ी है। कीटनाशकों के प्रयोग से मित्र कीट और शत्रु कीट दोनों मर जाते हैं और मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है। प्राकृतिक खेती को समय देना जरूरी है। कुछ साल प्रयास करने के बाद वापस रसायनोंं पर नहीं आना चाहिए।-बृज मोहन रुपटा, प्रगतिशील बागवान, नेरवा
धूप, अगरबत्ती के बाद गाय के गोबर से साबुन भी तैयार, स्वयं सहायता समूह की पहल
धूप, अगरबत्ती के बाद अब गाय के गोबर से साबुन भी तैयार हो गया है। कंडाघाट विकास खंड की देलगी पंचायत की महिलाओं ने गाय के गोबर से नहाने और कपड़े धोने का साबुन बनाया है। यही नहीं, शैंपू और वाशिंग पाउडर भी महिलाओं की ओर से निर्मित किया गया है। इस सामान की बाजार में मांग बढ़नी शुरू हो गई है। खास बात यह है कि तैयार किया गया वाशिंग पाउडर की पैकिंग भी काफी आकर्षक बनाई गई है। इसी के साथ गाय के गोबर से मूर्तियां, लक्ष्मी पांव समेत हवन सामग्री का भी उत्पादन महिलाएं कर रही हैं। इसके लिए मात्र सांचे का प्रयोग किया जा रहा है और चंद मिनट में साबुन और मूर्तियां तैयार हो रही हैं।कंडाघाट विकास खंड की देलगी पंचायत की महिलाओं ने गाय के गोबर से नहाने और कपड़े धोने का साबुन बनाया है।
हैरत की बात तो यह है कि सामान को तैयार करने के लिए महिलाएं कच्चा माल भी स्वयं बना रही हैं। इसके लिए अलग-अलग जड़ी-बूटियां भी मिलाई जा रही हैं। गौर रहे कि गाय के गोबर से महिलाएं धूप, अगरबत्तियां आदि पहले से तैयार कर रही थीं। लेकिन अब महिलाओं ने स्वरोजगार को बढ़ावा देते हुए कई अन्य प्रकार के उत्पाद बनाने भी शुरू कर दिए है। बीते वर्ष से पंचायत देलगी के कोठी गांव की स्वयं जागृति सहायता समूह की महिलाओं ने नया तरीका भी निकाला है। साथ ही सिद्ध कर दिया है कि गाय के गोबर को व्यर्थ फेंकने के बजाय इससे कई उत्पाद निर्मित किए जा सकते हैं।
डेढ़ साल पहले लिया था प्रशिक्षण
स्वयं जागृति सहायता समूह की प्रधान मीरा ने बताया कि उन्होंने यह प्रशिक्षण डेढ़ वर्ष पहले ही लिया है। इसके बाद से वह उत्पादों को तैयार करने में महिलाओं के साथ जुटी हुई हैं। मुख्य उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि दूध और घी ही गाय का प्रयोग में नहीं आता, बल्कि गोबर भी काम आता है। उन्होंने बताया कि गो माता की रक्षा भी हमारा पहला कर्तव्य है। गाय दूध आदि देना बंद कर दे तो लोग उसे बाजार में छोड़ देते हैं, जबकि यह करना गलत है।
पक्षी आपका इंतजार कर रहे हैं, दुनिया से भागना नहीं है इनके ‘पास जाना’
लोग पक्षी-पालन जैसी चीजों को सेवानिवृत्ति के बाद का विषय मानते हैं। सामान्य सोच यह है कि ऐसी चीजें तब की जाती हैं, जब आप कोई काम नहीं कर रहे होते हैं, क्योंकि इनका कोई आर्थिक लाभ नहीं होता। लेकिन हाल के कुछ वर्षों ने मुझे सिखाया है कि पक्षियों में दिलचस्पी का जो सुख है, वह दुनिया में और किसी में नहीं। पक्षियों से प्यार करना दुनिया से भागना नहीं है, बल्कि यही असली जीवन है।
अपनी जिंदगियों में हम इतने व्यस्त होते हैं कि पक्षियों को देखने का हमारे पास वक्त ही नहीं होता। रोजमर्रा के कार्यों में हम इतने खोए रहते हैं कि अपने आस-पास मौजूद पक्षियों की दिलचस्प दुनिया को नहीं देख पाते। अपने घरों की बालकनी में खड़े होकर, या सड़क पर यों ही घूमते हुए या कार पर जाते हुए, ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपको कोई पक्षी दिखाई न दे। एक बार आप उन्हें देखना शुरू तो करें, धीरे-धीरे आप उन्हें पहचानने लगेंगे, उनमें फर्क करने लगेंगे। फिर एक दिन ऐसा आएगा, जब वे आपको पहचानने लगेंगे और तभी उनकी जादुई दुनिया आपके सामने खुद-ब-खुद अपने रहस्य खोलने लगेगी।
विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं
पिछले साल सितंबर की बात है। मैं कैलिफोर्निया स्थित अपने घर के पास ही एक संरक्षित आर्द्र भूमि के अंतिम छोर तक गया और तरह-तरह के पक्षियों को देखने लगा। इससे पहले मैं गर्मियों में अपने कुत्ते को घुमाते हुए दूरबीन साथ में लेकर लंबी पैदल यात्रा करना पसंद करता था, लेकिन यह पहली बार था, जब मैं सिर्फ और सिर्फ पक्षियों को देखने निकला था। अमूमन माना जाता है कि पक्षियों को लगातार निहारते रहने वाला व्यक्ति एक पेशेवर या विशुद्ध पक्षी प्रेमी होता है। पर मैं ऐसा नहीं मानता। किसी क्षेत्र में रुचि रखने वाला व्यक्ति उसमें पारंगत हो, यह जरूरी तो नहीं। मेरा यह मतलब नहीं कि पेशेवर बनने के लिए कौशल जरूरी नहीं है। मैं तो यह कह रहा हूं कि कौशल न भी हो. पर गंभीर प्रयास और इरादे तो दिखने ही चाहिए। मसलन, नाच तो कोई भी सकता है, पर जरूरी नहीं कि हर नाचने वाला नर्तक हो। ठीक यही बात मुझ पर लागू होती है। पूरी जिंदगी पशुओं व पक्षियों में मेरी रुचि रही है, पर अपने भीतर पक्षियों को लेकर पेशेवर विशेषज्ञता मैं कभी विकसितु नहीं कर पाया।
देखने का अभ्यास
दो दशकों तक एक विज्ञान लेखक के रूप में मैंने पक्षियों के बारे में विस्तार से लिखा है, लेकिन मेरे लिए वह पल विशेष महत्व रखता है, जब मैंने सिर्फ पक्षियों लिए अपना समय और अपनी ऊर्जा समर्पित करने का फैसला किया। यह पहली बार था, जब पक्षियों को लेकर मैंने पेशेवर ढंग से सोचना शुरू किया। पेशेवर ढंग से मेरा आशय है कि पक्षियों को देखने में एक तरह की विशेषज्ञता का मैंने अभ्यास करना शुरू किया। पिछले सात महीनों में मैंने पक्षियों की तकरीबन 452 प्रजातियां देखी हैं। पक्षियों को देखने का मेरा अनुभव इस प्रकार हो चुका है कि में आवाज सुनकर ही बहुत-सी पक्षी प्रजातियों की पहचान कर सकता हूं। मैं बड़े और छोटे पीले पैरों, घरेलू और बैंगनी फिंच, कूपर और तेज-चमड़ी वाले बाजों में स्पष्ट अंतर कर सकता हूं। दुर्लभ पक्षियों की तलाश में भी मैंने काफी समय गुजारा है। हालांकि पक्षियों के बारे में मुझे पहले से भी काफी जानकारी थी। पक्षियों के आवासों और उनके तौर-तरीकों के बारे में काफी कुछ समझता भी हूं। सोशल मीडिया पर पक्षी प्रेमियों के कई समूहों का भी हिस्सा हूं और उनसे बातें भी करता रहता हूं।
देखेंगे तभी समझेंगे
पक्षी-प्रेमी होने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है पक्षियों का ज्ञान और इसके लिए पक्षियों को जानना महत्वपूर्ण है। पक्षियों को जानने के लिए उन्हें देखना शुरू करना जरूरी है। मेरे पक्षी-प्रेम ने मुझे कैलिफोर्निया में ऐसे स्थानों का पता लगाने के लिए प्रेरित किया, जहां पक्षी हो सकते हैं। मैं पक्षियों को देखने में इतना खो जाता हूं कि मुझे गर्मी, सर्दी, भूख और प्यास से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब मैं पहली बार किसी नई प्रजाति को देखता हूं, तो मुझे एक अजीब शांति का अनुभव होता है, मानो मैंने कोई नशा किया हो।
पक्षियों से दोस्ती का एक प्रयोग
जब मैं सुबह अपने घर से बाहर निकलता हूं, तो आस- पड़ोस में पक्षियों के चहकने पर ध्यान देता हूं, जो हमेशा वहां रहते थे, लेकिन जिन पर पहले मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। पक्षी प्रेमियों के लिए ऋतुओं को समझना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऋतु परिवर्तन विशेष प्रजातियों के आगमन और प्रस्थान का एक महत्वपूर्ण संकेत है। मैं मौसम में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों और निवास स्थान के फर्क पर विशेष ध्यान देता हूं। पक्षियों से दोस्ती करनी हो, तो आप एक प्रयोग कर सकते हैं। आप जहां भी रहते हों, अपनी बालकनी या छत पर अनाज के कुछ दाने और पीने का थोड़ा पानी पक्षियों के लिए रखना शुरू कीजिए। हो सकता है कि शुरुआती कुछ दिन एक भी पक्षी न आए, लेकिन आप क्रम न तोड़िए। एक दिन आप देखेंगे कि कुछ पक्षियों ने आना शुरू किया, फिर कुछ और दिन बाद पक्षियों की संख्या बढ़ने लगेगी, और कुछ पक्षी तो लौट-लौट कर आने लगेंगे। उन पक्षियों के पास न जाइए, पर उनके व्यवहार को दूर से देखने-समझने की कोशिश करते रहिए।
खुद से करें सवाल
जब मैंने पक्षियों को देखना शुरू किया, तो मुझे लगा था कि अधिकांश पक्षी प्रजातियों को शायद ही देख पाऊं। मेरा मानना था कि रॉबिन और वेस्टर्न ब्लूबर्ड जैसे पक्षियों को देखना आसान होगा, वहीं ब्लैक स्कीमर या पेरेग्रीन फाल्कन या लॉगरहेड श्राइक, सुनहरी चीलों, बड़े सींग बाले उल्लुओं जैसे दुर्लभ पक्षियों को देखना मुश्किल होगा, पर पक्षियों के प्रति मेरी जिज्ञासा ने इसे सरल बना दिया। रैत की पहाड़ी पर नाचते हुए क्रेनों को देखकर और प्रशांत महासागर में उनकी गोताखोरी देखते हुए उत्सुकता भरा मेरा प्रश्न कि ‘मैं उसे कभी नहीं देख पाऊंगा’ अब ‘मैं उसे कहां पा सकता हूं?’ में बदल गया है।
यही वास्तविक जीवन है
निस्संदेह, पक्षियों के लिए समय निकालना बहुत बड़ा विषय है, क्योंकि लोग इसे सेवानिवृत्ति के बाद का विषय मानते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि पक्षियों को पालने जैसी चीजें तब की जाती हैं, जब आप काम नहीं कर रहे होते हैं, क्योंकि इनसे कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलता है। पर मैं ऐसा नहीं मानता हूं, क्योंकि हाल के वर्षों ने मुझे सिखाया है कि पक्षियों को पालने जैसे कामों में जो खुशी, आश्चर्य और जगह से जुड़ाव होता है, वह किसी और कार्य में नहीं है। पक्षियों में दिलचस्पी लेना वास्तविक दुनिया से भागना नहीं है. बल्कि यही तो असली जीवन है। सोशल मीडिया पर घंटों बिताने से ज्यादा सुख किसी पक्षी की खोज में है। वसंत के दिनों में पक्षियों को देखने के लिए में बेहद उत्साहित हूं, क्योंकि गाने वाले और अन्य प्रवासी पक्षी खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजर रहे हैं। जिन पक्षियों को मैंने केवल हल्के भूरे रंग में देखा है, वे इस मौसम में अपने नए आकर्षक पंखों को धारण करने वाले हैं। जिन प्रजातियों को मैं पहले से जानता हूं, उनके नए सुरों को मुझे सीखना होगा। मैं अब और इंतजार नहीं कर सकता, क्योंकि नए पक्षी मेरा इंतजार कर रहे हैं।
म्यांमार और बांग्लादेश के लोगों की तरफ मिजो लोगों ने बढ़ाए मदद के हाथ; सरकारें भी इनसे सीख सकती हैं
मिजो लोगों ने जिस तरह से म्यांमार और बांग्लादेश के पीड़ितों और हाल ही में मणिपुर के जातीय संघर्ष से भागे कुकियों के प्रति उन जिम्मेदारियों को उठाया, जो वास्तव में केंद्र सरकार की हैं, उससे तथाकथित ‘मुख्य भूमि’ के लोग काफी कुछ सीख सकते हैं।
पिछले महीने मैंने कई उत्साहवर्धक दिन मिजोरम में बिताए। मुझे राज्य के राजनीतिक इतिहास के बारे में थोड़ी जानकारी थी। अपने जीवन में मैं कई मिजो लोगों से मिला भी, लेकिन इससे पहले कभी राज्य का दौरा नहीं किया था। सबसे पहले मैंने गुवाहाटी के लिए उड़ान भरी, जहां मैं अपने कुछ पुराने दोस्तों से मिला। ब्रह्मपुत्र नदी के दर्शन का आनंद लिया, विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं छात्रों से गांधी के बारे में बातें भी कीं।
हवाई जहाज की तुलना में ग्रामीण इलाकों को देखने के लिए यात्री ट्रेन एक बेहतर विकल्प है, लेकिन कार शायद अब भी बेहतर तरीका है। लेगपुई हवाई अड्डे से राज्य की राजधानी आइजॉल तक की यात्रा में डेढ़ घंटे का समय लगा, जो परिदृश्य को समझने के लिए पर्याप्त था। पहाड़ियों के आकार ने मुझे उप-हिमालयी जिलों की याद दिला दी, जो तब उत्तर प्रदेश में थे, अब उत्तराखंड में हैं, जहां मैं पैदा हुआ और पला-बढ़ा।
संकरी व घुमावदार सड़कें और तेज बहती जलधाराएं वैसी ही थीं। वनस्पति कुछ अलग थीं, प्रचुर मात्रा में बांस और पर्णपाती पेड़, लेकिन उत्तराखंड के विपरीत कोई शंकुधारी प्रजाति नहीं थी। और मानव आबादी भी बहुत कम लग रही थी। आइजॉल शहर में हर पहाड़ी के हर स्तर पर घर एक-दूसरे से सटे थे, जो नैनीताल और मसूरी की याद दिला रहे थे। सड़कों पर घूमना, खरीदारी करना, कैफे में बातचीत करना, ये सभी राज्य में महिलाओं की उन्नति की गवाही देते हैं।
भारत के सभी राज्यों में महिला साक्षरता दर मिजोरम में दूसरी सबसे अधिक है। करीब 60 फीसदी मिजो महिलाएं घर से बाहर काम करती हैं, यह अखिल भारतीय दर (30 फीसदी से कम) से दोगुने से भी ज्यादा है। और देश के किसी भी हिस्से की तुलना में मिजो महिलाओं के बेहतर वेतन पाने या ज्यादा जिम्मेदारी वाला काम करने की संभावनाएं अधिक हैं। जुलाई, 2022 में प्रकाशित पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘मिजोरम में विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों के रूप में काम करने वाले महिला-पुरुषों का अनुपात सबसे अधिक 70.9 फीसदी है, उसके बाद सिक्किम (48.2 फीसदी) और मणिपुर (45.1 फीसदी) का स्थान है।’
मिजो लोगों की सामाजिक प्रगति कई मायनों में हैरान करती है। यह उनके भौगोलिक अलगाव के विपरीत है और ऐसा तब है, जब कई वर्षों तक विद्रोहियों और राज्य के बीच हिंसक संघर्ष जारी रहा। जिस आइजॉल में मैं अब घूम रहा था और लोगों से बात कर रहा था, वह हलचल भरा और सबकी निगाह में बिल्कुल शांत शहर था, जिसे एक बार भारतीय वायु सेना द्वारा संचालित पहली भारतीय बस्ती होने का गौरव प्राप्त हुआ था।
यह 1966 के वसंत में हुआ था, जब एक सशस्त्र समूह मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने भारतीय राज्य के खिलाफ विद्रोह शुरू किया था। एमएनएफ का नेतृत्व लालडेंगा कर रहे थे, जो कुछ वर्ष पहले मिजो हिल्स में पड़े अकाल से बुरी तरह प्रभावित थे, जब व्यापक भुखमरी के प्रति नई दिल्ली की सरकार ने अपर्याप्त प्रतिक्रिया जताई थी। यह सोचकर कि मिजो लोगों का भारत में कोई सम्मानजनक भविष्य नहीं है, लालडेंगा ने पूर्वी पाकिस्तान के सैन्य शासन से संपर्क किया, जिसने उन्हें हथियार और आर्थिक सहायता देने का वादा किया।
फरवरी, 1966 में एमएनएफ ने सरकारी कार्यालयों पर आक्रमण किया और संचार प्रणाली को बाधित कर दिया। उन्होंने घोषणा की कि मिजो लोगों ने अपना एक ‘स्वतंत्र’ गणराज्य बना लिया है। फिर भारतीय राज्य ने सेना की बड़ी टुकड़ियां भेजीं और वायु सेना को भी भेजा गया। फिर भी विद्रोहियों ने जमकर संघर्ष किया और संघर्ष खत्म होने तथा समझौता होने में दो दशक लग गए। बाद में लालडेंगा भारतीय राज्य मिजोरम के मुख्यमंत्री बने।
समझौता होने के बाद मिजो लोगों ने बहुत जल्दी और पूरी तरह से अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया, यह उनकी बुद्धिमत्ता और उनके साहस का प्रमाण है। पीड़ा लोगों को प्रतिशोधी बना सकती है, खुद सहे कष्टों के कारण वे दूसरों से बदला लेने पर उतारू हो सकते हैं। लेकिन जहां तक मिजो लोगों की बात है, उनके अपने इतिहास ने उन्हें दूसरे लोगों की पीड़ा के प्रति अधिक दयालु बना दिया है। उन्होंने जिस तरह से म्यांमार और बांग्लादेश के पीड़ितों का स्वागत किया है, जरा उस पर विचार कीजिए, जिनमें से कई उनकी तरह ईसाई हैं, तो कुछ बौद्ध भी। अभी हाल ही में, मिजो लोगों ने मणिपुर के जातीय संघर्ष से भागे कुकियों का बोझ अच्छी तरह से उठाया है, और उन्होंने उन जिम्मेदारियों को उठाया है, वास्तव में केंद्र सरकार की हैं।
शानदार पत्रिका ‘ग्रासरूट्स ऑप्शंस’ में हाल ही में प्रकाशित निबंध में मिजो जीवन की सामुदायिक भावना का श्रेय झूम या स्वीडन खेती की विरासत को दिया गया है, जो ऐतिहासिक रूप से उन्हें आजीविका का मुख्य साधन प्रदान करता है। पारिवारिक इकाइयों में सहयोग को शामिल करते हुए झूम की खेती ने एक-दूसरे के साथ और प्रकृति के साथ एक सामाजिक रिश्ता बनाया। ये सभी साझा मूल्य और विचार अंततः सामाजिक आचरण संहिता में बदल गए।
मिजो लोगों का सामुदायिक लोकाचार इस क्षेत्र में ईसाई धर्म के आगमन से पहले का है। चर्च ने मिलकर काम करने की इस भावना को सुदृढ़ किया है। हालांकि, कुछ मामलों में अनावश्यक शुद्धतावाद भी दिखा है। बिशपों के क्रोध के डर से लगातार राज्य सरकारों ने निषेध लागू किया है, जिसके कारण शराब का अवैध व्यापार और नकली शराब की खपत बढ़ गई है। वैध रूप से बनाई और उपभोग की जाने वाली शराब पर कर लगाकर मिजोरम की खस्ताहाल सड़कों को सुधारने में काफी मदद मिल सकती है।
दुखद है कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह मिजोरम को भी बहुत कम महत्व दिया गया है। इस क्षेत्र के साथ नई दिल्ली की सरकारों ने बड़े पैमाने पर उपेक्षा का व्यवहार किया है, क्योंकि यहां लोकसभा की बहुत कम सीटें हैं। फिर भी तथाकथित ‘मुख्य भूमि’ के लोगों को मिजो लोगों से बहुत कुछ सीखना है-उनकी सामुदायिक भावना से, हार और निराशा से उबरने की उनकी क्षमता से, जातिगत पूर्वाग्रहों की कमी से और उनकी महिलाओं की अपेक्षाकृत उच्च स्थिति से, जीवन और संगीत के प्रति उनके प्यार से।
मनोविज्ञान: हाथ भी बातें करते हैं…सोचने और महसूस करने पर भी असर, मनुष्य को भी मिलती है संतुष्टी
जब आप अपने हाथों से काम कर रहे होते हैं, तब त्रिआयामी दुनिया से उसकी ही भाषा में बात कर रहे होते हैं। अपने हाथों को कम मत समझिए। पृथ्वी पर किसी भी अन्य प्राणी, यहां तक कि मानव के निकटतम प्राइमेट रिश्तेदारों के हाथ भी हमारे जैसे नहीं हैं, जो इतनी सटीक पकड़ और हेरफेर करने में सक्षम हों। यह दीगर बात है कि पहले के समय की तुलना में आज हम अपने हाथों से कम जटिल कार्य कर रहे हैं। पर क्या आप जानते हैं कि हाथों से कम, जटिल काम करते रहने का हमारे सोचने और महसूस करने पर भी असर पड़ता है? वर्जीनिया की एक यूनिवर्सिटी में व्यावहारिक मनोविज्ञान की प्रोफेसर डॉ. लैंबर्ट का कहना है कि जब हम किसी चीज के लिए प्रयास करते हैं, और वह चीज हमें मिलती है, तो दोनों के बीच एक संबंध होता है। वह यह भी मानती हैं कि अपने हाथों से काम करना मनुष्य को अद्वितीय रूप से संतुष्टि दे सकता है।
जानवरों पर किए गए एक शोध में भी यह बात सामने आई है कि जो चूहे भोजन खोदने के लिए अपने पंजों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें तनाव झेलने की क्षमता दूसरे चूहों से ज्यादा होती है। डॉ लैबर्ट इस शोध के निष्कर्षों की तुलना मनुष्यों पर किए अध्ययनों से करती हैं। उन्होंने पाया कि बुनाई, बागवानी और रंग भरने जैसे काम करने वालों को संज्ञानात्मक और भावनात्मक लाभ होता है, जिससे याददाश्त भी अच्छी रहती है। कनाडा की ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी में ऑक्युपेशनल थेरेपी की प्रोफेसर कैथरीन बेकमैन कहती हैं कि कढ़ाई जैसे कामों में दोहराव तो होता है, पर बार-बार एक ही चीज करने से इसके प्रभान ‘ध्यान’ करने जैसे होते हैं।
नौवें की एक यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर ऑड्रे वॉन डेर मोर के अनुसार, हाथ से लिखने के फायदे कंप्यूटर पर टाइप करने से कहीं ज्यादा होते हैं। प्रोफेसर डॉ. रस्टी गेज कहती हैं कि हाथ से की गई क्रियाएं मस्तिष्क में नई कोशिकाओं के विकास में सहायक होती हैं। उनके अनुसार, जब आप कोई जटिल काम करते हैं, जिसमें निर्णय लेना और योजना बनाना शामिल होता है, तब यह काफी मायने रखता है कि आप अपने हाथों का उपयोग कर रहे हैं या नहीं। जैसे, जब आप बागवानी, हस्तशिल्प, चित्रकेला करते या फिर वाद्ययंत्र बजाते हैं, आपके हाथ और दिमाग एक आदर्श तालमेल दिखाते हैं। वह कहती हैं कि यह दुनिया त्रिआगामी है और ऐसे हाथ व दिमाग के तालमेल वाले रचनात्मक कार्यों की मदद से आप दुनिया से उसकी ही भाषा में बात कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले केंद्रीय बलों की 100 और कंपनियां होंगी तैनात
पश्चिम बंगाल में अगले सप्ताह केंद्रीय बलों की कुल 100 और कंपनियां पहुंचेंगी। एक अधिकारी ने शनिवार को यह जानकारी देते हुए बताया कि राज्य में 19 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के लिए निर्वाचन आयोग 277 कंपनियों को तैनात करने की योजना बना रहा है।उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों में इस समय केंद्रीय बलों की 177 कंपनियां तैनात हैं।
AAP के पूर्व विधायक संदीप कुमार ने अरविंद केजरीवाल को सीएम पद से हटाने के लिए हाईकोर्ट में डाली याचिका
आम आदमी पार्टी(आप) के पूर्व विधायक संदीप कुमार ने अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया है। ऐसी मांग वाली यह तीसरी याचिका है। पिछली दो याचिकाएं एक्टिंग चीफ जस्टिस मनमोहन की अध्यक्षता वाली डिविजन बेंच द्वारा खारिज की जा चुकी हैं। केजरीवाल फिलहाल शराब नीति से जुड़े ईडी मामले में न्यायिक हिरासत में हैं। याचिका में कहा गया है कि दिल्ली के मौजूदा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ यथास्थिति वारंट(क्यो वॉरंटो) जारी करें और उन्हें यह बताने के लिए कहें कि वह संविधान के अनुच्छेद 239एए में किस अधिकार, योग्यता और पदवी के तहत दिल्ली के मुख्यमंत्री का पद संभाल रहे हैं। कोर्ट से मांग की कि जांच के बाद उन्हें पूर्वव्यापी प्रभाव से या उसके बिना दिल्ली के मुख्यमंत्री के पद से हटा दें। (इनपुट- प्राची यादव, NBT)
तेलंगाना की सरकार कुछ समय बाद 50 हजार लोगों को नौकरी देने जा रही है- राहुल गांधी
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने रंगारेड्डी में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब हमने आपको गारंटी दी थीं तो उसे हमने कांग्रेस पार्टी की गारंटी जरूर कहा था लेकिन सचमुच में वो आपकी गारंटी थी, आपकी आवाज थी। जब हमने 500 रुपये सिलेंडर, 200 युनिट मुफ्त बिजली, गृह लक्ष्मी योजना, मुफ्त बस सेवा की बात की थी तो वो गारंटी हमने आपकी आवाज सुनकर निकाली थी। आज तेलंगाना के सभी लोग जानते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने जो वादे किए थे उन्हें कांग्रेस पार्टी पूरा कर रही है। तेलंगाना की सरकार ने 30 हजार लोगों को सरकारी नौकरी दी है और कुछ ही समय में 50 हजार और लोगों को सरकारी नौकरी मिलने जा रही है। ये जो घोषणापत्र है, ये हिंदुस्तान की जनता की आवाज है।
आपके सामने तस्वीर साफ है। हम हैं जिसका मिशन है भ्रष्टाचार हटाओ और एक तरफ वे हैं उनका कमीशन कहता है भ्रष्टाचारी बचाओ…लेकिन ये मोदी है। पीछे हटने वाला नहीं है। भ्रष्टाचार पर तेज कार्रवाई जारी रहेगी। ये मोदी की गारंटी है…: PM मोदी
PMC घोटाला: वधावान बंधुओं को जमानत
बॉम्बे हाई कोर्ट ने पीएमसी बैंक के चार हजार करोड़ रुपये से अधिक के कथित घोटाला मामले में आरोपी और एचडीआईएल के प्रमोटर राकेश वधावन और सारंग वधावन को जमानत दी है। दोनों को इस केस में साढ़े चार साल बाद जमानत मिली है।
भीमा कोरेगांव केस में शोमा को बेल
सुप्रीम कोर्ट ने भीमा कोरेगांव हिंसा-एल्गार परिषद मामले में शोमा कांति सेन को जमानत दी। महिला अधिकार कार्यकर्ता शोमा को 6 जून 2018 को गिरफ्तार किया गया था। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि जमानत के बाद इजाजत के बिना महाराष्ट्र से बाहर नहीं जाएंगी।