मध्य प्रदेश के बुरहानपुर का अंडा बाजार नाम से जितना अनोखा है, कहानी उससे भी ज्यादा दिलचस्प है. इस बाजार में आज एक भी अंडे की दुकान नहीं है, फिर भी सरकारी दस्तावेजों में इसका नाम अंडा बाजार ही दर्ज है. करीब 200 साल पहले यहां देसी मुर्गियों के अंडों का बड़ा व्यापार हुआ करता था. समय के साथ कारोबार बदल गया और अब यहां फर्नीचर व लोहे की दुकानें हैं. यह कहानी बुरहानपुर के इतिहास और लोककथाओं की एक खास झलक दिखाती है.
मध्य प्रदेश के बुरहानपुर जिले में एक ऐसा बाजार है, जिसका नाम सुनते ही लोगों के दिमाग में अंडों की कतारें, टोकरियों में भरी मुर्गियां और चहल-पहल का नजारा घूमने लगता है. लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है. इस बाजार का नाम है अंडा बाजार, लेकिन यहां आज एक भी अंडे की दुकान नहीं है. न मुर्गियां दिखती हैं, न अंडों की खुशबू. सबसे दिलचस्प बात ये है कि सरकारी दस्तावेजों में भी आज तक इसका नाम अंडा बाजार ही दर्ज है.
नाम सुनकर लोग ढूंढते हैं अंडे की दुकान
जब कोई नया व्यक्ति इस इलाके में आता है और अंडा बाजार का नाम सुनता है, तो वह चारों तरफ नजरें दौड़ाने लगता है कि शायद कहीं अंडे की दुकान दिख जाए. लेकिन यहां ज्यादातर फर्नीचर और लोहे की दुकानें नजर आती हैं. स्थानीय व्यापारी मोहम्मद मर्चेंट बताते हैं कि लोग अक्सर उनसे पूछते हैं कि यहां अंडे की दुकान कहां है? तब उन्हें पूरी कहानी समझानी पड़ती है कि यहां अंडों का नाम सिर्फ इतिहास में रह गया है.
दादी-नानी की जुबानी 200 साल पुरानी कहानी
मोहम्मद मर्चेंट बताते हैं कि उन्होंने भी यह कहानी अपनी दादी-नानी से सुनी है. पुराने समय में यहां एक बड़ा पीपल का पेड़ हुआ करता था और उसके पास एक बरामदा था. गांव और आसपास के इलाकों से लोग अपनी देसी मुर्गियों को टोकरियों में रखकर यहां लाते थे. जैसे ही मुर्गियां अंडे देती थीं, वैसे ही हाथों-हाथ अंडे बिक जाते थे. उस दौर में यही जगह अंडों की खरीदी-बिक्री का बड़ा केंद्र बन गई थी, और तभी से इस इलाके का नाम पड़ गया अंडा बाजार.
देसी मुर्गियों के अंडों का था जोरदार कारोबार
स्थानीय लोगों के मुताबिक, उस समय देसी मुर्गियों के अंडों की जबरदस्त मांग थी. लोग मानते थे कि देसी अंडे ज्यादा ताकतवर और पौष्टिक होते हैं. इसी वजह से दूर-दराज से लोग यहां अंडे खरीदने आते थे. धीरे-धीरे यह बाजार पूरे इलाके में अंडों के व्यापार के लिए मशहूर हो गया. नाम इतना रच-बस गया कि पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन बाजार का नाम नहीं बदला.
वक्त बदला, कारोबार बदला, नाम वही रहा
समय के साथ हालात बदले. अंडों का कारोबार खत्म हो गया और यहां लोहे व फर्नीचर का व्यवसाय पनपने लगा. आज इस बाजार में आपको एक भी अंडे की दुकान नहीं मिलेगी, लेकिन फर्नीचर और हार्डवेयर की दर्जनों दुकानें जरूर दिख जाएंगी. इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड और स्थानीय पहचान में यह इलाका आज भी अंडा बाजार ही कहलाता है.
नाम में छुपी है बुरहानपुर की पहचान
अंडा बाजार सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि बुरहानपुर के इतिहास और लोककथाओं की एक झलक है. यह बाजार बताता है कि कैसे वक्त के साथ कारोबार बदल जाता है, लेकिन यादें और नाम पीढ़ियों तक जिंदा रहते हैं. शायद यही वजह है कि आज भी अंडा बाजार का नाम सुनते ही लोग मुस्कुरा उठते हैं और इसके पीछे की कहानी जानने को मजबूर हो जाते हैं.

