मदन कोथुनियां
जाति है कि लाख जतन करने पर भी भारतीय समाज से जाती ही नहीं। व्यक्ति चाहे ऊँचे पद पर आसीन हो जाए, उसकी पहचान और खास जगहों पर उसके प्रति सलूक उसकी जाति के हिसाब से ही होता है।
समाज को दिमागी रूप से गुलाम बनाने की साजिश के तहत जाति व्यवस्था का जटिल व कुटिल जंजाल रचा गया था। सदियों पुरानी व्यवस्था है यह। भारतीय समाज की एक अत्यंत उत्पीड़नकारी, शोषणकारी, घृणित व्यवस्था।
जिस चीज ने भारतीय समाज को भीतर से संवेदनहीन, न्यायपूर्ण चेतना से रहित और अमानवीय बना दिया, वह है जाति व्यवस्था। जाति व्यवस्था पर टिका समाज हमें रोज़-ब-रोज़ अतार्किक, विवेकहीन, कायर, पाखंडी और ढोंगी बनाता है तथा व्यक्ति के आत्मगौरव और मानवीय गरिमा को क्षरित करता है।
जाति व्यवस्था ने एक ऐसा श्रेणीक्रम रचा, जिसमें हर जाति किसी दूसरी जाति की तुलना में नीचे स्तर की है। इसने श्रम न करने वाले परजीवियों को श्रेष्ठ तथा शारीरिक श्रम करने वालों को नीच तथा महानीच (अछूत) बना दिया।
उत्पादन तथा सेवा करने वालों को शूद्र तथा अंत्यज कहकर घृणा, उपेक्षा, अपमान, तिरस्कार का पात्र बना दिया गया, यहाँ तक कि उनमें से बड़े हिस्से को अछूत घोषित कर दिया गया। मनुष्य जाति के इतिहास में मानव को अछूत घोषित करने की शायद यह एकमात्र व्यवस्था है।
देश में इतने सारे सामाजिक बदलाव हुए, मगर यह व्यवस्था जस की तस है। विगत दशक से तो जात-पात की डफली-मंजीरे जोर-शोर से बजाने का प्रचलन परवान पर है। जातियों की अपनी ‘सेनाओं’ का गठन व संचालन अपने आप में अभूतपूर्व है।
जो भी विदेशी शासक भारत आए, उन्होंने यहाँ की जाति व्यवस्था को स्वीकार किया, उसे बदला नहीं। जातियाँ बनी रहीं, जातियों के अंदर भी उपजातियाँ पनपती रहीं, जिनमें ऊँच-नीच का फर्क किया गया। हमारी व्यवस्था ने इसे इतना मजबूत कर दिया कि हमारे नाम के साथ लिखना शुरू करवा दिया। यह हमारे जन्म-मरण के साथ जोड़ दिया गया है। हमारे दिमाग में इसका जहर कूट-कूट के भर दिया गया है। जाति व्यवस्था ने हमें मानसिक रूप से गुलाम कर दिया और हमने इस गुलामी को स्वीकार कर लिया।
जाति प्रथा को अतीत में कम से कम दो बार गंभीर चुनौती मिली है। पहला दौर था जैन और बौद्ध धर्मों के फैलने का। लेकिन जैन धर्म एक खास जाति तक सीमित होकर रह गया और बौद्ध धर्म को एक साजिश के तहत भारत में टिकने नहीं दिया गया।
जाति प्रथा पर दूसरा बड़ा प्रहार भक्ति आंदोलन ने किया। लेकिन यह मुख्यतः उन जातियों का आंदोलन था, जिन्हें समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था। जाति की उनकी आलोचना वस्तुतः उनकी निजी और सामाजिक पीड़ा का ही चीत्कार था। इस चीत्कार को सवर्ण चित्त ने सुना जरूर, लेकिन इससे व्यवस्था के ढांचे में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ।
मसलन, कबीर ने जात-पात के खोखलेपन को उजागर करते हुए कहा:
कबीरा कुआँ एक है, पानी भरे अनेक।
बर्तन में ही भेद है, पानी सब में एक।।
गुरु नानक ने भी ऊँच-नीच के भेदभाव की निरर्थकता को उजागर करते हुए यह कहा:
अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत दे सब बंदे।
एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे।।
जातीय शोषण झेलते हुए आए इन संतों/कवियों ने आडंबरों को धता बताते हुए निराकार ईश्वर की आराधना पर जोर दिया। मंदिर-प्रवेश पर पाबंदी को उन्होंने यह कहकर चुनौती दी कि ईश्वर मंदिर-मस्जिद में नहीं, मनुष्य के हृदय में वास करता है।
भक्ति आंदोलन से निकले हुए ये संत बाद में स्वयं भिन्न-भिन्न जातियों की संपत्ति हो गए और उनके प्रगतिशील संदेश को क्रमशः भुला दिया गया। कबीर और रैदास अपनी सामाजिक और आध्यात्मिक चेतना में एक थे, पर उनके शिष्यों के बीच तरह-तरह की दूरियाँ बनी रहीं
जाति व्यवस्था की खुली खिलाफत
जाति के पेचीदा प्रश्न व ‘जाति’ की जड़ और जद की बात हो तो महात्मा ज्योतिबा फुले, पेरियार, डॉ. भीमराव आंबेडकर और डॉ. राममनोहर लोहिया की बातों को इसमें शामिल किए बिना बात सी बात नहीं बनती।
ज्योतिराव फुले जाति, पंथ, धर्म, संप्रदाय, लिंग, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव के प्रबल विरोधी थे। ज्योतिबा ने वर्ण व्यवस्था और जातिगत व्यवस्था की खिलाफत करते हुए कहा: “ये दोनों शोषण की व्यवस्थाएँ हैं, और जब तक इसका पूरी तरह खात्मा नहीं हो जाता, तब तक एक अच्छे समाज की निर्मिति असंभव है।”
फुले ऐसे पहले भारतीय थे, जिन्होंने इस प्रकार के विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की हिम्मत की। जाति व्यवस्था निर्मूलन की कल्पना कर उसे साकार करने हेतु आंदोलन का मार्ग प्रशस्त करने का श्रेय फुले को जाता है।
दक्षिण में नव विचारों की जनक्रांति के नायक पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर का यह कथन काबिल-ए-गौर है: “जब तक भारतीय समाज में जातियों का पदक्रम बना रहेगा, तब तक यह संभावना भी रहेगी कि इस पदक्रम की हर सीढ़ी पर खड़ी जाति अपने से नीची सीढ़ी की जाति का दमन करने का प्रयास करेगी।”
पेरियार ने पाखंड और प्रपंच पर करारी चोट करते हुए दो टूक शब्दों में यह कहा कि आज विदेशी लोग दूसरे ग्रहों पर संदेश और अंतरिक्ष यान भेज रहे हैं। हम बिचौलियों द्वारा श्राद्धों में परलोक में बसे अपने पूर्वजों को चावल और खीर भेज रहे हैं। क्या यह बुद्धिमानी है?
‘जाति’ को डॉ. लोहिया ने एक ‘जड़ वर्ग’ के रूप में परिभाषित किया है। वस्तुतः जाति को जकड़न का दूसरा नाम माना जा सकता है। इसी जाति-पाश के कारण भारत का जीवन निष्प्राण-सा हो गया है। यहाँ का व्यक्ति पहले हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी आदि के नाम पर विभाजित है, फिर जातियों और उपजातियों के नाम पर। देश का हिंदू (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के साथ-साथ) असंख्य उपजातियों में विभाजित है। जातीय जकड़न एकता की दुश्मन होती है।
जाति प्रथा के मामले में डॉ. लोहिया का मत खारिज नहीं किया जा सकता कि देश की जनता पर जाति प्रथा थोपने वाले लोगों ने ऐसी व्यवस्था निर्मित की, जिसमें ब्राह्मण को मस्तिष्क का स्वामी और वैश्य को धन का मालिक बनाकर युद्ध और सेवा का दायित्व क्रमशः क्षत्रिय और शूद्र पर लाद दिया गया। यही कार्य-विभाजन ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, शासक-शासित के गैर-समाजवादी भाव के परिणाम के रूप में सामने आया।
डॉ. लोहिया ने भारत की हजार वर्षीय गुलामी का कारण आंतरिक कलह और छल-कपट को नहीं, बल्कि जाति को माना है। डॉ. लोहिया के दिमाग में जाति प्रथा के विरुद्ध एक सशक्त तूफान आजीवन उमड़ता रहा। उन्होंने जाति प्रथा पर चौतरफा प्रहार किया।
कठोपनिषद् के एक मंत्र “एकस्तथा सर्वं भूतांतरात्मा। रूपं-रूपं प्रतिरूपो बभूव” को ब्रह्मज्ञान का मूल आधार बताते हुए उन्होंने मूल रूप से सबको एक बताया है। 27 मई 1960 को हैदराबाद में आर्य समाज की एक सभा में अपने उद्बोधन में डॉ. लोहिया ने कहा कि अपने व्यक्तिगत संकुचित शरीर और मन से हटकर सबके प्रति अपनेपन का अनुभव करना ही सच्चा ब्रह्मज्ञान है।
जाति प्रथा से कालांतर में घातक जातिवाद उदित हुआ। डॉ. लोहिया ने स्पष्ट किया कि इसी प्रथा के चलते छोटी जातियाँ सार्वजनिक जीवन से बहिष्कृत की जाती हैं, जिससे दासता उत्पन्न होती है। जो शोषण की जननी है। भेदभाव को जन्म देकर समाज को विघटित करने वाली जाति प्रथा आत्मीयता और सौहार्द समाप्त कर देती है और सामाजिकता का लोप हो जाता है
जाति का पिशाच
भारतीय परंपरावादी समाज में व्यक्ति, स्थान या धर्म परिवर्तन करके भी decaste (निरजात/जाति-मुक्त/बिना जाति का) नहीं हो सकता। जाति का टैग उसके साथ जीवन-पर्यंत चिपका रहता है। हम आधुनिक व उत्तर-आधुनिक जरूर हो रहे हैं, पर decaste नहीं। यह एक भयावह त्रासदी है।
सुभाष गटाड़े अपने एक लेख ‘Cast Away Caste: Breaking New Grounds’ की शुरुआत डॉ. आंबेडकर के इन दो उद्धरणों से करते हैं:
“Turn in any direction you like, caste is the monster that crosses your path. You cannot have political reform, you cannot have economic reforms unless you kill the monster.” (From Annihilation of Caste, 1936)
आप चाहे जिस राह/दिशा में चले जाइए, जाति का पिशाच हर राह पर आपका रास्ता रोके खड़ा मिलेगा। जब तक आप इस पिशाच को मौत के घाट नहीं उतारेंगे, तब तक आप न तो राजनीतिक सुधार ला सकते हैं, न ही आप आर्थिक सुधार ला सकते हैं।
“If Lenin was born in India, he would not have even let the idea of revolution come to his mind before he had completely buried casteism and untouchability.”
अगर लेनिन का जन्म भारत में होता तो वह जातिवाद और अस्पृश्यता का पूरी तरह खात्मा करने से पहले अपने दिमाग में क्रांति के विचार को कौंधने नहीं देता।
जैसे कार्ल मार्क्स ने वर्गविहीन समाज की अवधारणा दी थी, इसी तरह डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी जाति-विहीन समाज का सपना देखा था। डॉ. आंबेडकर ने भारतीय समाज में चतुर्वर्ण व्यवस्था, जाति प्रथा तथा अस्पृश्यता को अवैज्ञानिक, अमानवीय, अन्यायपूर्ण, अत्याचारपूर्ण, शोषणकारी सामाजिक षड्यंत्र करार देते हुए इनकी कटु आलोचना की। यह व्यवस्था श्रम के विभाजन पर आधारित न होकर श्रमिकों के विभाजन पर अवलंबित थी।
जातीय आधार पर व्यक्तियों के कार्यों का जन्म से ही निर्धारण हो जाता है। इसमें व्यक्ति की खुद की काबिलियत और उसका प्रशिक्षण महत्वहीन हो जाता है। इस व्यवस्था से सामाजिक जड़ता (social stability) पुख्ता होती है, क्योंकि कोई व्यक्ति अपनी जाति का स्वेच्छा से परिवर्तन नहीं कर सकता।
फलतः यह व्यवस्था संकीर्ण प्रवृत्तियों को जन्म देती है, क्योंकि हर व्यक्ति अपनी जाति के अस्तित्व के लिए अधिक जागरूक होता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि विभिन्न जातियों के लोगों में राष्ट्रीयता का संचार नहीं हो पाता। जातीय विद्वेष और घृणा का प्रसार इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है।
उपर्युक्त तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए ही हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत ‘हम भारत के लोग’ शब्दों से करना उचित समझा। इसकी व्याख्या करते हुए डॉ. आंबेडकर ने अपने भाषण में कहा था:
“मेरा विचार है कि ‘हम एक राष्ट्र हैं’, ऐसा मानकर हम एक बड़े भ्रम को बढ़ावा दे रहे हैं। हजारों जातियों में बँटे लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं हैं। इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा। तभी हम राष्ट्र बनने की जरूरत को बेहतर समझ पाएँगे। जाति प्रथा के रहते इस उद्देश्य की प्राप्ति कठिन है… जातियाँ राष्ट्र-विरोधी हैं। पहला कारण तो यह कि वे सामाजिक जीवन में अलगाव को बढ़ावा देती हैं। दूसरे, वे एक जाति और दूसरी जाति के बीच ईर्ष्या और असहिष्णुता को ले आती हैं।”
जाति के साथ एक बात और भी जुड़ी हुई है, जिसका उल्लेख करते हुए डॉ. आंबेडकर Annihilation of Caste में लिखते हैं:
“Each caste takes its pride and its consolation in the fact that in the scale of castes it is above some other caste.”
यानी हर जाति इस बात पर अभिमान करती है और अपने को तसल्ली देती है कि जातियों के मापक्रम में वह किसी दूसरी जाति से ऊपर है।
जातीय श्रेष्ठता का दंभ और जातीय नीचता की कुंठा लोगों में आत्मसम्मान की भावना को नष्ट कर देती है, उनकी चेतना को कुंद कर देती है, संवेदना को मार देती है, स्वयं को तथा दूसरे को सिर्फ इंसान समझने की संवेदना को कुचल देती है। उसे आदमी नहीं, जाति विशेष के प्रतिनिधि कठपुतली में तब्दील कर देती है। डॉ. आंबेडकर अपनी पुस्तक जाति का विनाश में लिखते हैं कि “इसमें कोई संदेह नहीं कि जाति आधारभूत रूप से हिंदुओं का प्राण है, लेकिन इसने सारा वातावरण गंदा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं।”
डॉ. आंबेडकर दो टूक शब्दों में कहते हैं कि “हिंदू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबंधों का जमघट है। हिंदू धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों का खिचड़ी संग्रह मात्र है और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिकता के सिद्धांतों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व में सभी समुदायों के हर काम में उपयोगी हो, हिंदुओं में पाया ही नहीं जाता और यदि कुछ थोड़े से सिद्धांत पाए भी जाते हैं तो हिंदुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पाई जाती।”
वस्तुतः जाति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इन्हें उखाड़ फेंकना आसान नहीं है। जाति व्यवस्था वर्चस्व की लड़ाई है। चातुरवर्ण उसका आधार है। दरअसल, जाति व्यवस्था को कुछ इस तरह से निर्धारित किया गया है कि यह हमारे मस्तिष्क में ‘by default’ है और स्वतः रिसाइकिल (recycle) और रिचार्ज (recharge) होती रहती है।
जाति के जंजाल से निजात के उपाय
अगर हम सच में राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें जातीयता के तंग दायरे से मुक्ति पानी होगी। डॉ. लोहिया ने जातिवाद को दूर करने के लिए दो उपाय सुझाए: सहभोज और अंतर्जातीय विवाह। इन दोनों उपायों को वे कानूनी जामा पहनाना चाहते थे। इन दोनों शर्तों से इनकार करने वाले को नौकरी व अन्य सेवाओं के लिए अयोग्य घोषित किए जाने के पक्षधर रहे। डॉ. आंबेडकर के अनुसार, जब तक जातियों के बाहर शादी-ब्याह की स्थितियाँ पैदा नहीं होतीं, तब तक जाति का इस्पाती साँचा तोड़ा नहीं जा सकता।
जाति का मूल स्वरूप सामंती होता है। उसकी एकमात्र काट सच्चे लोकतंत्र में है, जिसमें शासन व्यक्तियों का नहीं, अपितु कानून का होता है। जाति से मुक्ति का एकमात्र रास्ता यही है कि आभासी लोकतंत्र को वास्तविक लोकतंत्र/कानून का शासन (Rule of Law) में बदला जाए।
छोटे-छोटे जाति समूहों का उनके समान हितों के आधार पर एकीकरण करते हुए वर्ग में बदला जाए। नागरिकों को नागरीकरण के जरिए इस तरह जोड़ा जाए कि नागरिक अपनी निजी/जाति/धर्म के बजाय सामूहिक पहचान को वरीयता देने लगें। यहाँ निजी पहचान से ध्यान हटाने का अभिप्राय अपने व्यक्तित्व को विलीन कर देना नहीं है।
लोकतंत्र जनताकरण (व्यक्तियों का जाति-धर्म के दायरों से मुक्त होकर खुद को जनता के विशाल समुदाय में सम्मिलित मानना) की सतत प्रक्रिया है। उसमें लोग एक-साथ घुल-मिलकर सामूहिक बड़े हितों की पहचान करते हैं। बाहरी पहचान, जिससे उनके व्यक्तित्व, उत्पादकता या बुद्धि-विवेक का सीधा संबंध न हो, को बिसरा देते हैं।
फलस्वरूप, नागरिकों की पहचान उनकी योग्यता, ज्ञान-अनुभव, कार्यक्षमता और मनुष्यता के प्रति समर्पण भाव से होने लगती है। ऐसे ही लोग लोकतंत्र में अपने सच्चे प्रतिनिधि चुनने में सफल हो सकते हैं। उस समय वे जो प्रतिनिधि चुनते हैं, वे केवल प्रतिनिधित्व करते हैं, शासक बनने का साहस नहीं कर पाते। वस्तुतः जाति उन्मूलन का सही रास्ता समाज के लोकतांत्रिकरण में है।
लगता है कि भारत में जाति प्रथा ने स्थायित्व का अमृत पी रखा है। इसका कारण हम भारतीयों ने आधुनिक विचार कम, आधुनिक जीवन पद्धति ज्यादा आत्मसात की है। आधुनिक विचार की विफलता का सर्वाधिक रोचक दृश्य हमारे यहाँ 21 सितंबर 1995 को देखने को मिला, जब टेलीफोन के सहारे फैलाई गई एक अफवाह मात्र से देश के एक बड़े हिस्से में शंकर-सुत गणेश की मूर्तियों को टनों दूध ‘पिलाया’ गया।
बेशक आधुनिक विचार का ज्यादातर असर खास लोगों के निजी जीवन में हुआ है, परंतु यह किसी सामाजिक आंदोलन की शक्ल नहीं ले सका है। इस मामले में भारत के मध्य वर्ग ने काफी निराश किया है। यूरोप के मध्य वर्ग ने अनेक सामंती मूल्यों से विद्रोह कर प्रगतिशील काम किया था, किंतु भारत के मध्यवर्ग ने अधिकांशतः सामंती मूल्यों को संरक्षण दिया है।
भारत में जाति के जहर के दुष्प्रभाव से प्रलाप की अवस्था में गिरफ्त हो चुकी जातियाँ अपनी-अपनी जाति के अपराधियों व भ्रष्ट नेताओं को अपना तारणहार व गौरव समझकर उन्हें हीरो का दर्जा दे चुकी हैं। सत्ता का रास्ता छल-बल-कपट से होकर गुजरने लगा है।
जातिवाद को चुनाव में अलोकतांत्रिक तरीकों से वोट जुगाड़ना माना जाता था, वही शुद्ध जातिवाद अब ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के नाम से लोकलुभावन होकर स्वघोषित ‘राष्ट्रवादी पार्टी’ की आँखों का तारा बन चुका है। जहर वही है, आधुनिक शब्दावली की तश्तरी में सजाकर खुले-आम धर्म व राष्ट्रवाद की अफीम के साथ मिलाकर फ्री में युवा पीढ़ी को चटाया जा रहा है। वर्तमान सत्ताधारी पार्टी के लिए हिंदू एकता राजनीतिक मुद्दा है, सामाजिक मुद्दा नहीं। सामाजिक स्तर पर तो विभाजित हिंदू समाज ही उसे स्वीकार्य है।
जाति एक सामाजिक परिघटना
जाति के जहर के बारे में उक्त विवेचन पढ़ने के बाद अब पढ़िए वैचारिक रूप से समृद्ध पूर्व आई.सी.एस. अधिकारी प्रदीप कासनी की नेक नसीहत। बात दिल को छूने वाली है। वक्त की जरूरत के अनुरूप। राजनीति-मत्ता (statesmanship) को बखूबी परिलक्षित करने वाली सधे शब्दों में बंधी उनकी बात का संशोधित स्वरूप में सारांश प्रस्तुत है।
“जाति… हमारे समाज का एक यथार्थ है। कड़वा सच है… ऐतिहासिक अतीत का एक ठोस अवशेष। निष्कपट भाव से अनजान लोग भी आपसे आपकी जाति पूछ लेते हैं और आप बता भी देते हैं। चलता है। चल ही रहा है। परंतु जाति से अलग, ये जो जातिवाद है, यह कैंसर की तरह समाज को निष्प्राण कर रहा है।
…परंतु जातिवाद की भावना, जातिवादी रुख, जातिवादी गर्रा, जातिवादी मिथ्याभिमान, जातिवादी संकीर्णताएँ और मार्गावरोध तो जीवन से जितना जल्दी जाएँ, उतना ही अच्छा हो।
“पैदाइशी जाति भी नहीं होती। नवजात शिशु को ‘जाति’ उसकी पैदाइश के बाद समाज प्रदान करता है। जाति का टैग वह चुनता नहीं है, उस पर लाद जाता है, चिपका दिया जाता है। जब आपको आपकी सोच, आपके सारे शिक्षा-संस्कार सहित, आपकी समूची अनुभव-संपदा के साथ, आपकी जाति-पहचान में घटाया जाता है, तो मामला एक साथ पेचीदा और कारुणिक बना दिया जाता है।
“कारुणिक इसलिए कि आपका समग्र व्यक्तित्व, आपकी सारी निजी खासियतों और खूबसूरती को उससे खत्म कर देते हैं। जबकि हमारे समाज में एक-एक शख्स के पास अपनी-अपनी निजी खासियतों और खूबसूरती की एक बहार हो।”
तो, फिर क्या करें?
तो, संक्षेप में, आदमी अच्छा लगे तो आगे बढ़कर हाथ मिलाइए। उसकी जाति मत पूछिए। खामखाह, और बिना प्रसंग, अपनी जाति बताते रहना भी आपके लिए कतई जरूरी नहीं… आप घर से बाहर आए हों और बस एक इंसान और अपनी सजी-धजी इंसानियत के साथ खुद को पेश कर रहे हों, तब दूसरे आपकी जाति नहीं, आपके गुणों-खासियतों, आपकी क्षमता-कौशल और काबिलियत, आपकी शख्सियत पर ज्यादा आएँगे… बशर्ते वे इंसानियत को तवज्जो देते हों।
(मदन कोथुनियां स्वतंत्र पत्रकार हैं)

