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सरकार के किसी भी फैसले की आलोचना नागरिक का अधिकार

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सुप्रीम कोर्ट ने असहमति के अधिकार को बरकरार रख ने के मुद्दे पर बहुजन संवाद पर हुई चर्चा 

सुप्रीम कोर्ट ने असहमति के अधिकार को बरकरार रखते हुए कहा कि हर आलोचना अपराध नहीं है और अगर ऐसा सोचा गया तो लोकतंत्र बच नहीं पाएगा। अदालत ने कहा कि पुलिस को भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में संवेदनशील होना चाहिए। प्रोफेसर जावेद अहमद हजाम पर महाराष्ट्र पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए के तहत मामला दर्ज किया था।
उन्होंने एक व्हाट्सएप स्टेटस साझा किया था, जिसमें अनुच्छेद 370 निरस्त करने की आलोचना करते हुए इसे जम्मू-कश्मीर के लिए ‘काला दिन’ बताया था।


न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा। “भारत के प्रत्येक नागरिक को अनुच्छेद 370 को निरस्त करने और जम्मू-कश्मीर की स्थिति में बदलाव की कार्रवाई की आलोचना करने का अधिकार है। जिस दिन निरस्तीकरण हुआ उस दिन को ‘काला दिवस’ के रूप में वर्णित करना विरोध और पीड़ा की अभिव्यक्ति है,”। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि अगर सरकार के खिलाफ हर आलोचना या विरोध को धारा 153-ए के तहत अपराध माना जाएगा तो लोकतंत्र नहीं बचेगा।
बहुजन संवाद यूट्यूब चैनल एवं फेसबुक पेज पर 9 मार्च को इसी मुद्दे पर हुई चर्चा । चर्चा में शामिल रहें-
प्रो राम पुनियानी, सुप्रसिद्ध लेखक
◆ आई डी खजुरिया, अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक मंच
◆ एड अरविन्द श्रीवास्तव, वरिष्ठ अधिवक्ता -हाईकोर्ट, जबलपुर
◆ बसीर आरिफ़, वरिष्ठ पत्रकार, जम्मू-कश्मीर
◆ डॉ. लेनिन रघुवंशी, दलित मानवाधिकार कार्यकर्ता
🎤 संचालन – डॉ सुनीलम एवं डॉ आनन्द प्रकाश तिवारी

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