एस पी मित्तल,अजमेर
यूं तो कांग्रेस सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी है, लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस को मात्र 12 वर्ष पुरानी अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी से राजनीति सीखने की जरूरत है। भाजपा के गठबंधन वाली नरेंद्र मोदी की सरकार ने आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर हर घर तिरंगा लगाने का आव्हान किया है। इस अभियान को लेकर देशभर में उत्साह है और देशवासी बड़े उत्साह के साथ अपने घर तिरंगा लगा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी केंद्र सरकार के इस अभियान को राजनीति से प्रेरित बताकर विरोध कर रही है। 52 वर्षों तक तिरंगा नहीं फहराने जैसी बेवजह के ट्वीट कांग्रेस के अध्यक्ष रहे राहुल गांधी की ओर से किए जा रहे हैं। यह माना कि राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी से व्यक्तिगत नाराजगी है, लेकिन मोदी का विरोध करते करते राहुल गांधी और कांग्रेस देश की आजादी से जुड़े अभियानों का भी विरोध करने लगते हैं। इससे आम जनता में कांग्रेस की छवि और खराब होती है। लेकिन ऐसी नासमझी भरी राजनीति से अलग अरविंद केजरीवाल हर घर तिरंगा अभियान का समर्थन कर रहे हैं, इसलिए केजरीवाल की दिल्ली सरकार 25 लाख तिरंगे खरीद कर लोगों को नि:शुल्क बांटेगी। असल में केजरीवाल यह अच्छी तरह समझते हैं कि तिरंगा अभियान का विरोध करने का मतलब देश का विरोध करना है। 12 वर्ष पुरानी पार्टी को ऐसी समझ हैं, लेकिन सवा सौ वर्ष पुरानी पार्टी को नहीं। केजरीवाल ने हर घर तिरंगा अभियान का तब समर्थन किया है, जब केंद्र सरकार के अधीन एजेंसियों ने दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को जेल में डाल रखा है और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के जेल जाने की तैयारी है। जबकि गांधी परिवार के सदस्यों से तो सिर्फ पूछताछ ही की जा रही है। गांधी परिवार के सबसे बड़े सलाहकार माने जाने वाले राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की समझ का तो भगवान ही मालिक है, लेकिन मोदी सरकार के राजनीतिक जाल में कांग्रेस और गांधी परिवार आसानी से फंस जाता है। कांग्रेस की नासमझी के कारण ही राजनीति में केजरीवाल की पार्टी का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। दिल्ली में केजरीवाल ने ही कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर रखा है तथा पंजाब कांग्रेस से ही सत्ता छीनी है, जानकारों की माने तो इसी वर्ष गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी कांग्रेस से आगे निकल जाएगी।
कांग्रेस को झटका:
6 अगस्त को हुए उप राष्ट्रपति चुनाव में भी कांग्रेस को ही सबसे ज्यादा झटका लगा है, क्योंकि पराजित मार्गेट अल्वा कांग्रेस की ही उम्मीदवार थीं। गांधी परिवार ने अल्वा को उम्मीदवार तो बना दिया, लेकिन विपक्षी दलों को एकजुट करने का कोई प्रयास नहीं किया। उपराष्ट्रपति चुनाव में जब विपक्षी दलों के सांसदों से संवाद करने का समय था, तब कांग्रेस की ओर से परिवार बचाने के लिए प्रदर्शन किया जा रहा था। यही वजह रही कि विपक्ष के 80 सांसदों ने भाजपा के गठबंधन वाले उम्मीदवार जगदीप धनखड़ को वोट दिया। 725 सांसदों के वोट में धनखड़ को 528 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की अल्वा को मात्र 182 वोट मिले। भाजपा गठबंधन के पास अधिकतम 450 वोट थे, लेकिन धनखड़ को 528 वोट मिले। इससे विपक्ष तो पस्त हुआ ही, लेकिन कांग्रेस की भी पोल खुल गई। गांधी परिवार विपक्ष का नेतृत्व तो करना चाहता है, लेकिन विपक्ष को एकजुट करने की स्थिति में नहीं है। विपक्ष में भी क्षेत्रीय दल अपने अपने राज्यों के क्षत्रप बने हुए हैं। कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को भी अपने झंडे के नीचे लाने में विफल है।

