इंदौर. कांग्रेस प्रत्याशियों को संगठन का साथ नहीं मिला। वे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जरूर लड़ रहे थे, लेकिन सारी कवायद उन्हें अपने स्तर पर करनी पड़ी।
ये हैं हार के कारण कारण
कमजोर संगठन: महापौर प्रत्याशी अकेले चुनाव लड़ते रहे। संगठन उनके साथ नहीं दिखा। हालत ये थी कि कांग्रेस संगठन ने टिकट की दावेदारी करने वाले कई दावेदारों को चुनावों के पहले नगरीय निकाय की मतदाता सूची की जगह विधानसभा की मतदाता सूची सौंप दी थी। 2 साल से कांग्रेस की शहर कार्यकारिणी भंग है। उसका गठन नहीं होने से वार्डों में भी जिम्मेदारी नहीं बांटी गई। पार्षद के टिकट वितरण में भी लेटलतीफी की।
बड़े नेताओं का हठ और बेरूखी: टिकट वितरण के समय बड़े नेताओं का हठ और प्रत्याशी घोषित होने के बाद चुनावों से बेरूखी रही। शहर अध्यक्ष विनय बाकलीवाल, राष्ट्रीय सचिव सत्यनारायण पटेल, सज्जनसिंह वर्मा, जीतू पटवारी, अश्विन जोशी, सुरजीतसिंह चड्ढा, पंकज संघवी जैसे नेताओं ने समर्थकों को टिकट दिलाने के बाद उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। रणनीति बनाने में भी इन नेताओं ने मदद नहीं की। कई वार्डों में तो कांग्रेस प्रत्याशियों को हरवाने में भी कांग्रेस नेता दूसरे प्रत्याशियों की मदद करते रहे।
अति आत्मविश्वास: संजय शुक्ला सहित कांग्रेस के कई पार्षद प्रत्याशी अति आत्मविश्वास में थे। वोटिंग के पहले ही शुक्ला सहित कांग्रेस के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता चुनाव मैदान से दूर हो गए। कई नेताओं ने तो जीत तय मान ली थी। शुक्ला अपनी विधानसभा से 30 हजार की लीड को जीत मानकर रणनीति बना रहे थे और जमीनी हकीकत पर ध्यान नहीं दिया।
समर्थकों के साथ प्रवेश से रोकने पर धरने पर बैठे शुक्ला
कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी संजय शुक्ला सुबह करीब 8 बजे मतगणना स्थल नेहरू स्टेडियम पर पहुंचे। यहां काफी देर तक बाहर ही समर्थकों के साथ खड़े रहे। जब सूचना मिली कि कुछ ही देर में स्ट्रांग रूम खोला जाएगा तो वह समर्थकों के साथ प्रवेश करने पहुंचे। यहां पर सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक दिया। इस पर नाराज होकर शुक्ला वहीं पर धरने पर बैठ गए। उनका कहना था कि वह अपने समर्थकों के साथ ही प्रवेश करेंगे। काफी देर तक अफसर उन्हें समझाने की कोशिश करते रहे। करीब 10 मिनट चली गहमागहमी के बाद वह अपने उन्हीं समर्थकों के साथ अंदर पहुंचे जिनके पास अधिकृत प्रवेश पत्र थे।

