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हांफने लगे हैं श्मशान:इसलिए अंतिम संस्कार के लिए एक और विकल्प है विद्युत शवदाह गृह

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भोपाल

विश्रामघाटों में शवों की कतार लगी हुई है। शवदाह के लिए स्टैंड की कमी बनी हुई। ऐसे में श्मशान अब हांफने लगे हैं। परंपरागत तरीके से अंतिम संस्कार में 3 घंटे लग रहे हैं। वहीं, अस्थि संचय के लिए तीन दिन तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में इस पूरी प्रक्रिया के लिए एक और विकल्प है विद्युत शवदाह गृह।

यहां डेढ़ घंटे में ही अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है और परिजनों को ज्यादा इंतजार भी नहीं करना पड़ता है। इस महामारी में जो लोग अपनों को खो चुके हैं, वे आगे आएं। इससे समय की बचत भी होगी और पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होगा। जागरुकता के चलते भदभदा स्थित विद्युत शवदाह गृह में 14 दिनों में 77 लोगोें का अंितम संस्कार हो चुका है। जबकि 9 अप्रैल के पहले यहां एक भी अंतिम संस्कार नहीं हुआ था, जबकि यह 5 महीने से बनकर तैयार है।

14 दिन में 77 शवों का विद्युत शवदाह गृह में अंतिम संस्कार किया

भदभदा विश्रामघाट पर नगर निगम के अधीक्षण यंत्री(विद्युत) इंजीनियर तापस दास गुप्ता का अंतिम संस्कार विद्युत शवदाह गृह में होने के बाद बढ़ी जागरूकता से 14 दिन में अब तक 77 शव का यह अंतिम संस्कार हो चुका है। परंपरागत रूप से होने वाले दाह संस्कार में लगभग 3 क्विंटल लकड़ी का उपयोग होता है। 77 दाह संस्कार में कम से कम 231 क्विंटल लकड़ी की बचत हुई है। मोटे तौर पर तीन क्विंटल लकड़ी के लिए एक हरा-भरा पेड़ काटना पड़ता है, यानी 77 पेड़ों को बचा लिया गया। एक पेड़ को पूरा बड़ा होने में कम से कम 20 साल लगते हैं।

छोला में भी तैयार है विद्युत शवदाह गृह

छोला विश्रामघाट पर भी 5 महीनों से विद्युत शवदाह गृह तैयार है। यहां एक बार 20 अप्रैल को पद्मनाभ नगर निवासी श्रीपाल दिवाकर का उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। छोला विश्रामघाट ट्रस्ट के पदाधिकारी प्रमोद चुघ ने बताया कि एनजीटी में उनकी याचिका पर सभी बड़े शहरों में विद्युत शवदाह गृह स्थापित करने के निर्देश नगरीय प्रशासन विभाग को दिए गए थे।

3 क्विंंटल लकड़ी बचेगी

सामान्य संस्कार में लगने वाली लगभग 3 क्विंटल लकड़ी का मूल्य करीब 3000 रुपए होता है। विद्युत शवदाह गृह में केवल 1700 रु. लगते हैं।

यह ज्यादा सुरक्षित भी

विद्युत शवदाह गृह को सामान्य रूप से एक इंसीनरेटर माना जा सकता है। श्मशान घाटों पर स्थान कम पड़ रहे हैं उसे देखते हुए इनका उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए। – बृजेश शर्मा, रीजनल ऑफिसर, मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल, भोपाल

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