NAPM सभी लोकतांत्रिक और नागरिक समाज संगठनों व नागरिकों से आह्वान करता है कि दिल्ली में ऐतिहासिक किसान आंदोलन के एक महीना पूरा होने के उपलक्ष्य में सार्वजनिक एकजुटता कार्यवाहियों में भाग लें और देशभर का समर्थन किसानों तक पहुंचाएँ
तीन कृषि-कानूनों और बिजली विधेयक, 2020 के विरूद्ध ऐतिहासिक आंदोलन को एक महीना हो चुका है। जहाँ पंजाब और हरयाणा के किसानों ने बड़ी संख्या में पहुँच कर दिल्ली का घेराव कर रखा है, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य-प्रदेश, महाराष्ट्र आदि के किसान लगातार दिल्ली पहुँच कर आंदोलन से जुड़ रहे हैं। साथ ही देशभर के किसान तमाम जगहों पर विकेन्द्रीकृत, दैनिक और अनिश्चितकालीन प्रदर्शन कर अपना विरोध दर्ज कर रहे हैं।
सरकार और किसानों के बीच पांच दौर की बातचीत ने सरकार की मंशाओं की तरफ लोगों के संशयों को धार ही प्रदान की है। इस बीच 30 किसानों की जानें जा चुकी हैं, जिसके लिए इस मुद्दे पर सरकार का रवैया पूरी तरह से ज़िम्मेदार है। किसान-संगठनों को बदनाम करने के भरसक प्रयास सरकार कर रही है- इस हद तक कि किसानों के बीच घुसपैठ कर उन्हें खालिस्तानी पर्चे बांटना। यह देश मगर सच्चाई से भली-भांति वाक़िफ़ है।
सरकार ने भले ही किसानों को ‘विपक्ष द्वारा गुमराह किये जाने’ की कहानी गढ़ उन्हें दरकिनार करने की कोशिश की हो, मगर भारत के लोग पिछले एक महीने से किसानों की बात सुन रहे हैं। इस बात को लेकर आम-समझ बढ़ रही है कि इन क़ानूनों के लागू होने से भारत का पीडीएस सिस्टम पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 107 देशों में 94वें पायदान पर स्थित भारत में ऐसा होना आम-उपभोक्ताओं और करदाताओं के लिए भी चिंता का विषय है। हम तीनों कृषि क़ानूनों को निरस्त किये जाने की स्पष्ट मांग के साथ खड़े हैं और समझते हैं कि ये क़ानून भारत के पिछड़े वर्गों- महिलाओं, छोटे-मंझोले किसानों, भूमि-हीन किसानों, मजदूरों आदि की कीमत पर पूंजीपतियों को फायदा पहुँचाने का काम करेंगे।
सरकार द्वारा किये गए वादों पर अविश्वास और क़ानूनों में कुछ संशोधनों के प्रस्ताव को ठुकराना पिछले वर्षों में सरकार की नीतियों-प्राथमिकताओं को देखने का नतीजा है। अपनी नीतियों द्वारा सरकार ‘विकास’ का ऐसा मॉडल अपनाती रही है जो गरीब, शोषित वर्गों की कीमत पर खड़ा है, जिसके तहत बड़े उद्योगों के लिए बिना किसी परामर्श, या पर्यावरण की परवाह किये, रास्ते खोले गए हैं। इस कड़ाके की सर्दी में सड़कों पर लोगों के आंदोलन-रत होने के बावजूद एक महीने से ईमानदार बातचीत का कोई भी प्रयास न करने में भी सरकार की यही बेपरवाही दिखाई देती है।
इस सब के बीच, किसानों ने एकजुटता और सहानुभूति का अभूतपूर्व परिचय दिया है- साझा भोजन से लेकर प्रदर्शन स्थलों पर पढ़ने-लिखने-समझने की सुविधाओं में यही भावना निहित है। देश के सभी कोनों से और अंतर्राष्ट्रीय समुदायों से भी सरकार की नीतियों और रवैये पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
किसानों ने अब 29 दिसंबर को 4 -पॉइंट एजेंडा के साथ बातचीत का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत कृषि-क़ानूनों को वापस लेने की रणनीति, MSP की लीगल गारंटी, NCR और निकटवर्ती क्षेत्रों में ‘एयर क्वालिटी मैनेजमेंट’ के लिए बने कमीशन द्वारा लगाए गए जुर्मानों से किसानों को मुक्त करना, और बिजली विधेयक, 2020 में आवश्यक बदलावों को लेकर चर्चा की जाएगी।
विशाल किसान-आंदोलन के एक महीना होने के उपलक्ष्य में ‘संयुक्त किसान मोर्चा’ से जुड़े किसान-नेताओं और AIKSCC ने सभी किसानों और नागरिकों से 26 -27 दिसंबर को ‘धिक्कार दिवस’ के रूप में मनाने का और अंबानी-अडानी के उत्पादों का बहिष्कार कर कॉर्पोरेट का विरोध करने का आह्वान किया है। तीन कृषि-क़ानूनों के विरोध के रूप में ‘मन की बात’ के दौरान नागरिकों से ‘थाली पीटो’ का अनुरोध भी किया गया है। NAPM इन सभी आह्वानों के साथ खड़ा है। हम जगह-जगह इन गतिविधियों में हिस्सा लेंगे और सभी से इसमें जुड़ने का अनुरोध करते हैं।
