उमेश तिवारी सीधी (म.प्र.)
जिले के जनप्रतिनिधियों की नियति सवालों के कटघरे में है, जिले के जनप्रतिनिधि समय रहते स्वास्थ्य व्यवस्था की चिंता किए नहीं हां ओहदे की ठसक से खुद के ठाठ-बाट को ठट्ठे से चलाने में मस्त रहें तथा ओहदे की धौंस के धमाल से काले और सफेद दोनों तरीके से मालामाल होते रहे। अब जब जिले में कॅरोना कहर बेहद भयावह है, बीभत्स चीख पुकार है, मौत का मातम है कई जाने जा चुकी हैं कितने परिवार प्रभावित होकर तबाह हो गए और हो रहे हैं तब तबाही के तांडव में जिले के जनप्रतिनिधि, सांसद विधायक निधि से वाहवाही लूटने की निर्लज्जता कर रहे हैं। निर्लज्ज जनप्रतिनिधियों को मसीहा मानने वाले भक्त तथा फरिस्ता बताने वाले भांट बेशर्मी से इन्हें भगवान और फरिश्ता बता रहे हैं। जिस सांसद और विधायक निधि को यह जनप्रतिनिधि अपने घर के बेचे हुए गेहूं से प्राप्त राशि मानते हैं वह सांसद और विधायक निधि का पैसा जनता का पैसा है। नियम है कि यह राशि जहां भी खर्च की जाएगी उसमें हर हाल में जनता का भला होना चाहिए। जनता की भलाई में सांसद (लोकसभा तथा राज्यसभा सदस्य) को 5 करोड़ तथा विधायक को दो करोड़ रुपए प्रत्येक साल खर्च करने की व्यवस्था सरकारी खजाने से की गई है। सांसद विधायक इस राशि को स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल, स्वच्छता या अन्य सार्वजनिक हित के जरूरी कामों के लिए कर सकते हैं। प्राकृतिक आपदा जैसे बाढ़, भूकंप या महामारी की घड़ी में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। इसके उलट जिले के जनप्रतिनिधि सांसद और विधायक निधि को “दुधारू गाय के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं”। टैंकर खरीदी, यात्री प्रतिक्षालय निर्माण पर सांसद विधायक निधि की राशि की लूट खसोट जिले वासी भूले नहीं हैं। जनप्रधानियों द्वारा इस राशि को परसेंटेज पर देकर कमाई करने की तथा अपनी डेहरी पर पूंछ हिलाने वाले लग्गू-भग्गुओं को निधि की राशि के तलछट से उपकृत करने की भी जन चर्चा है। पद के प्रभाव से बटोरे गए रुपयों से भरे बोरे का मुंह जनप्रतिनिधि नागरिकों की भलाई में तो खोलेंगे नहीं है हां थोड़ी भी गैरत बाकी है तो अपने भारी भरकम वेतन और बेसुमार भत्ते की राशि बेबस और बिलखते नागरिकों की जान बचाने में खर्च करें। *

