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*इतिहास की सबसे ज्यादा राजनीतिक जनगणना, परिसीमन पर भी चर्चा तेज*

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भारत में जनगणना को लेकर देरी हो रही है। इस कारण यह जनगणना देश के इतिहास में सबसे ज्यादा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गई है। GOI ने 4 जून को जनगणना की घोषणा की। इसके अनुसार, मकानों की लिस्टिंग का काम अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच होगा। लोगों की गिनती फरवरी 2027 में की जाएगी। जनगणना के लिए 1 मार्च, 2027 की तारीख तय की गई है। भविष्य में, लोकसभा क्षेत्रों का सीमांकन इसी जनगणना के आधार पर होगा। 84वें संशोधन में राज्यों के लिए लोकसभा सीटों की संख्या 1971 की जनसंख्या के आधार पर तय की गई थी। इसमें कहा गया था कि परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के नतीजों के आधार पर होगा।

जनगणना की इतनी चर्चा क्यों

कुछ लोगों का मानना है कि जनगणना में देरी का कारण कोविड नहीं है। यह सब राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है। बीजेपी को लगता है कि जनगणना से जनसंख्या में बदलाव का पता चलेगा। इससे हिंदी भाषी राज्यों को लोकसभा में ज्यादा सीटें मिलेंगी और दक्षिण के राज्यों को कम। जनगणना का राजनीतिक महत्व सिर्फ लोकसभा क्षेत्रों के सीमांकन से ही नहीं जुड़ा है। महिलाओं के लिए आरक्षण का बिल भी मोदी सरकार ने पास किया था। यह बिल भी सीमांकन के बाद ही लागू होगा। इसके अलावा, इस जनगणना में जाति की गिनती भी की जाएगी।

जनगणना के बाद नतीजों में लगेगा समय?

सवाल यह है कि क्या जनगणना फरवरी 2027 में पूरी होने के बाद और नतीजों के जारी होने के बीच का समय काफी होगा? क्या 2029 के आम चुनावों से पहले जरूरी बदलाव किए जा सकेंगे? अगर मान भी लें कि नतीजे 2027 के अंत तक आ जाते हैं, तो क्या परिसीमन का काम एक साल में पूरा हो पाएगा? इस बीच, जनगणना की शुरुआती जानकारी मीडिया में लीक होने लगेगी। जिन राज्यों को लोकसभा में कम सीटें मिलेंगी, वे राजनीतिक विरोध करेंगे। सरकार के लिए इसे अनदेखा करना मुश्किल होगा।

ऐसे में तीन बड़े मुद्दे सामने हैं। क्या इतनी जल्दी राजनीतिक सहमति बन पाएगी? ऐसा लगता है कि जनगणना के बाद होने वाला चुनावी बदलाव 2029 के आम चुनावों से पहले लागू नहीं हो पाएगा। मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं है। दक्षिण के कई सहयोगी दल – TDP, JDS और ADMK इसके लिए शायद शुरुआत में सहमत न हों। शुरुआती अनुमानों के बावजूद, नतीजे अनिश्चित या अप्रत्याशित हो सकते हैं। यह मानना कि बीजेपी को परिसीमन से ज्यादा फायदा होगा, ये पूरी तरह से सही नहीं है।

जनगणना के साथ परिसीमन पर भी चर्चा तेज

इन सभी तनाव और अनुमानों से पता चलता है कि सहमति बनाने के लिए बातचीत लंबी और मुश्किल होगी। मोदी सरकार के लिए 2029 के चुनावों से पहले इन बदलावों को जल्दबाजी में लागू करना आसान नहीं होगा। उन्हें न सिर्फ विपक्षी दलों से बात करनी होगी, बल्कि अपने सहयोगी दलों को भी मनाना होगा। क्षेत्रीय पार्टियां अपनी शर्तों पर जोर देंगी। बीजेपी भी अपनी कुछ मांगों को मनवाने की कोशिश करेगी। इसमें ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का समर्थन भी शामिल हो सकता है। यह सीमांकन में देरी की कीमत हो सकती है।

क्या परिसीमन के खिलाफ बुलंद होगी आवाज

इतनी ज्यादा राजनीतिक माथापच्ची के साथ, यह मानना होगा कि जनगणना के अंतिम आंकड़े 2029 के चुनावों में मुद्दा बनेंगे। लेकिन उन्हें वास्तविक बदलाव में बदलने में कुछ समय लग सकता है। जब तक कि जनगणना से जुड़ी हर चीज तेजी से आगे न बढ़े, क्योंकि पिछले कुछ सालों में यह बहुत धीमी रही है।

जनगणना में देरी से कई तरह की आशंकाएं पैदा हो रही हैं। राजनीतिक दल अपने-अपने फायदे के लिए इसका इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार सभी दलों को साथ लेकर आम सहमति बनाने में सफल होती है या नहीं। 2029 के चुनाव में जनगणना एक बड़ा मुद्दा बनने की संभावना है।

जनगणना के नतीजों पर सभी की नजर

यह जनगणना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे महिलाओं के आरक्षण और जाति आधारित आरक्षण जैसे मुद्दों पर भी असर पड़ेगा। महिलाओं के लिए आरक्षण को लागू करने के लिए लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ानी पड़ सकती है। वहीं, जाति की गिनती से आरक्षण की सीमा को बढ़ाने की मांग उठ सकती है। इन सभी मुद्दों पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाना आसान नहीं होगा। सरकार को सभी दलों के साथ बातचीत करके एक ऐसा रास्ता निकालना होगा जो सभी के लिए स्वीकार्य हो।

राजनीति और समाज पर क्या होगा सेंसस का असर

जनगणना के नतीजों का असर देश की राजनीति और समाज पर लंबे समय तक रहेगा। इसलिए, यह जरूरी है कि जनगणना का काम सही तरीके से हो और इसके नतीजों को सभी राजनीतिक दल स्वीकार करें। यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि जनगणना सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है। यह देश के विकास के लिए भी जरूरी है। जनगणना से सरकार को देश की जनसंख्या, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिलती है। इस जानकारी का इस्तेमाल सरकार देश के विकास के लिए योजनाएं बनाने में करती है। इसलिए, यह जरूरी है कि जनगणना का काम बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप के हो।

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