नेमावर। आज मोक्षमार्ग के कारणों में जो सामग्री है उनका धड़ल्ले से व्यापार हो रहा है, आजकल हर व्यक्ति जिनवाणी पर सर्वाधिकार सुरक्षित की बात करते हैं, व्यवसाय का साधन बना लिया। मुनि महाराज को शास्त्र भेंट कर दो ऐसा कहते हैं, हम भी देखते रहते हैं। भइया! भेंट न करो, शास्त्र दान करो। उसी जिनवाणी में शास्त्रदान की बात कही गई है, भेंट की नहीं। पर यह दान तभी सार्थक है तब छह आवश्यक भी करो। ग्रहस्थ के छह आवश्यकों में देव पूजा, गुरु उपासना स्वाध्याय, संयमादि के साथ दान कहा गया है। आहारदान, औषधदान है नहीं। अभयदान करने नहीं। छह के अभाव में बाकी का औचित्य नहीं। पहले ग्रहस्थ वर्षों तक शास्त्र हाथ से लिखते-लिखवाते थे फिर उन्हें दान देते थे। अब तो एक महिने में हजारों हजार शास्त्र छप जाते हैं फिर भी भेंट कर रहे हैं। जिनवाणी का भी अपना अपना कापी राईट बना लिया है। आचार्य कुन्दकुन्द ने मोक्ष का मार्ग बताया, मोक्षमार्ग की वह सीढ़ी वे अपने साथ फोल्ड करके नहीं ले गये। हम तो कुंदकुंद के चेले हैं, उनके बताये मार्ग पर चल रहे हैं। हमें सोचना है कि इतने उज्ज्वल भाव के साथ भाव बनायें, अपने यहां तो भाव का खेल है। द्रव्य आ जाता है पर आजकल द्रव्य पहले देखते हैं, भाव की बात नहीं करते हैं। दुर्भाव ही आ जते हैं, सद्भाव का जमाना नहीं रहा। प्रशिक्षण से इन भावों को उद्घाटित किया जाता है। मनुष्य भव रूपी चैपाल से ऊपर, नीचे, दायें या बायें जा सकता है। मनुष्य से वह नारकी, तिर्यंच, मनुष्य, देव या महादेव भी हो सकता है। आपको सोचना है कि क्या होना। नरक में नहीं जाना चाहते भले ही नारकीय काम करें। देव भी नहीं बनना चाहते हैं, क्योंकि वहां से भी मोक्ष नहीं। मनुष्य पुनः मनुष्य बनना चाहते हैं तो उपरिम मंजिल को चढ़ना होगा। उपरिम मंजिल तक पहुंचने के लिए आज भी चालू कर सकते हैं, करना भी चाहिए। मान लो 25 सीढ़ी लगी है, फिर भी मंजिल मिलेगी, तो क्या यह सीढ़ी एकसाथ चढ़ जाओगे। नहीं चढ़ सकते, इसलिए चढ़ना नहीं, ऐसा नहीं। एक एक सीढ़ी कदम ऊपर उठाओ। श्वास फूलने लगे तो थोढ़ा रुक जाओ, पर सोना नहीं। आप तो सेचते हो कि इसमें ए.सी लग जाये। सीढ़ी पर किसी ने अपना भवन नहीं बनाया, भवन में सीढ़ी जरूर बनाये हैं। हम सीढ़ियों को पार कर अंतिम सीढ़ी तक पहुंच सकते हैं। अब अंतिम सीढ़ी भी चढ़ गए पर मंजिल नहीं, क्यो? छत आ गई है। यह क्रम है, एकसाथ नहीं चढ़ सकते हैं उस पर। इसी प्रकार द्धसम्यर्गदर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र इन तीनों के साथ ही सीढ़ी चढ़ सकते। चढ़ या चल नहीं सकते पर रुक सकते हैं। अभी हमने आप लोगों के साथ छोटे छोटे बच्चे देखे, जिन्होंने अपनी जीवन यात्रा का प्रारंभ किया है। आपकी किसी की यात्रा अंतिम है, कुछ पीछे हैं, कुछ और पीछे हैं, कुछ बहुत ही पीछे हैं, दो बालक अपने कंधों पर पालकी में अष्ट मंगल द्रव्य प्रमुदित मन से खड़े हो गए तो हमने कहा देव भी आज इन्हें देखकर प्रसन्न हो रहे होंगे, क्योंकि देव कितने भी अघ्र्य चढ़ायें उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होना, पर बालक मनुष्य पर्याय में अघ्र्य लेकर बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है। ये प्रवचन नेमावर में संघ सहित विरामान आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने रविवासरीय विशेष धर्मसभा में दिये। नेमावर सिद्धोदय तीर्थ के कार्यकार अध्यक्ष संजय मैक्स और आलोक जैन ने विद्वत् परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’ को बताया कि आचार्यश्री ने संघ सहित इस तीर्थ क्षेत्र के गतिमान नव निर्माणों का निरीक्षण किया व आवश्यक निर्देश दिये। आचार्यश्री ने कार्य की प्रगति पर संतोष व्यक्त किया तथा कार्यकताओं औ पदाधिकारियों का उत्साहवर्धन किया।
डाॅ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’
शास्त्र भेंट न करें, शास्त्रदान करें : आचार्य विद्यासागर

