इंदौर। जिले में मरीजों की जांच के नाम पर लूट मची हुई है। शहर से गांव तक बिना पैथोलाजिस्ट और रजिस्ट्रेशन के चल रहे अवैध पैथोलॉजी को सीएमओ ने पूरी छूट दे रखी है। तभी तो आज तक न एक भी पैथोलॉजी के खिलाफ न जांच हुई न कार्रवाई। डॉक्टरों से सेटिंग कर मरीजों को अपने पास बुलाते हैं।पैथोलॉजी हो या प्राइवेट अस्पताल हर जगह इलाज के नाम पर मरीजों के साथ लूट का खेल चल रहा है. खासकर पैथोलॉजी में जांच के नाम पर जमकर लूट मची है.ज्यादातर पैथोलॉजी झोलाछाप डॉक्टर चला रहे हैं. लेकिन स्वास्थ्य महकमे की आंखे बंद हैं. कभी- कभी दिखावे के लिए छापेमारी जरूर होती है, लेकिन जो खानापूर्ति में ही निपट जाती है.स्वास्थ्य विभाग के अफसरों ने अपनी आंखें बंद कर रखी हैं।पैथोलॉजी संचालकों ने डॉक्टरों से कमीशन सेट कर रखा है। ज्यादातर पैथोलॉजी झोलाछाप डॉक्टर चला रहे हैं. लेकिन स्वास्थ्य महकमे की आंखे बंद हैं. कभी- कभी दिखावे के लिए छापेमारी जरूर होती है, लेकिन जो खानापूर्ति में ही निपट जाती है.
पैथलॉजी में ब्लड टेस्ट कराने पहुंची गजुवाटांड की रजिया परवीन को टेस्ट रिपोर्ट में कैंसर पीड़ित होने की बात बताई गई.जबकि एक दूसरे लैब में जांच कराने पर उसी जांच की रिपोर्ट सामान्य आयी. एक ही टेस्ट के दो तरह के रिजल्ट से रजिया और उसके परिवार वाले असमंजस की स्थिति में है. हालांकि, डॉक्टर ने सिन्हा पैथोलॉजी की रिपोर्ट को गलत बताया है.इधर बीमार रजिया अलग-अलग रिपोर्ट आने से मानसिक तौर पूरी तरह चिंतित नजर आ रही है. उसने खाना-पीना छोड़ दिया है. उसकी इस हालत के लिए परिजनों ने सिन्हा पैथोलॉजी को दोषी ठहराते हुए जांच घर को लीगल नोटिस थमा दिया है.
अल्ट्रासाउंड करते हैं पैथालॉजिस्ट,
खून की जांच करता है अनपढ़
शहर में स्थित कुछ पैथालॉजी केंद्रों पर पैथालाजिस्ट अल्टासाउंड करने में लगे रहते हैं, जबकि खून-पेशाब की जांच के लिए उन्होंने दो कर्मचारियों को रखा है। वह अपने तरीके से जांच कर रिपोर्ट मरीजों को दे देते हैं। इस मामले में सीएमओ का कहना है कि, जिले में अवैध रूप से चलने वाले पैथालॉजी के बारे में जानकारी नहीं है। पंजीकृत पैथालॉजी के बारे में रिकार्ड देखकर ही बताया जा सकता है।
डॉक्टरों की काबिलियत अब मशीनों पर निर्भर होकर रह गई है, जिस कारण दर्द से कराह रहे मरीजों को डॉक्टरों की फीस के साथ पैथोलॉजिकल जांच का भारी-भरकम खर्च उठाना पड़ रहा है। नब्ज पकड़कर मर्ज को ताडऩे वाले डॉक्टर अब कम ही नजर आते हैं। हालात यह हैं कि डॉक्टर फस्र्ट विजिट में ही मरीज को दवाइयां व जांच के लिए नाम व पते बता देते हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि डॉक्टरों की सलाह पर आप जो पैथोलॉजिकल जांच शहर में करवाते हैं, उनकी जांच रिपोर्ट तैयार करने के लिए निजी पैथोलॉजी संचालक वास्तविक खर्च से 200 गुना तक अधिक रुपए मरीजों से वसूल रहे हैं। पहले यह होता थानब्ज पकड़ते ही बीमारियों के लक्षण पता चल जाते थे।बहुत अधिक आवश्यकता होने पर एक्सरे करवा लिया जाता था।डॉक्टर जांच रिपोर्ट देखे बिना पहले अपनी राय के अनुसार डायग्नोसिस करते थे।बाद में जांच रिपोर्ट से उसे क्रास चेक करते थे।
अब क्या होता है
मरीज की तकलीफ सुनने के बाद पहले जांच करवाई जाती है।जाच रिपोर्ट पैथोलॉजिस्ट-रेडियोलॉजिस्ट तैयार करते हैं।रिपोर्ट के आधार पर कंसल्टेंट मरीज का इलाज करते हैं।
ऐसे समझें
मलेरिया जांच का खर्च : 4-5 रुपएलेकिन लैब संचालक की जांच फीस है 50 से 150 रुपए तकसोनोग्राफी जांच का खर्च : 8-10 रुपएलेकिन लैब संचालक की जांच फीस है 600 रुपए तक
चिकित्सक, फार्मा कंपनी और पैथलॉजी की मिलीभगत से मरीजों को न सिर्फ लूटा जा रहा है। बल्कि उनकी जान से भी खिलवाड़ हो रहा है।’यही जांच के लिए गए कई सैंपलों को पैथोलॉजी में सीधे सिंक में फेंक दिया जाता है। मेडिकल क्षेत्र में चल रही धांधली का खुलासा एक चिकित्सक ने अपनी किताब में किया है। डॉ. अरुण गदरे और अभय शुक्ला की आंखें खोल देने वाली पुस्तक ‘डिसेन्टिंग डायगनोसिस’ में कहा गया है कि बहुविशेषज्ञता वाले कारपोरेट अस्पतालों द्वारा ‘पैकेजों’ का प्रस्ताव दिया जाता है। इस पुस्तक में एक पैथोलाजिस्ट ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि मरीजों से नमूने लेकर उन्हें बिना परीक्षण के वॉश बेसिन में फेंक दिया जाता है जिसे ‘सिंक टेस्ट’ कहते हैं।में यह भी बताया गया है कि किस तरह से कारपोरेट अस्पताल उद्योगों की तरह काम करते हैं, जिनका एकमात्र इरादा ‘ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाना है।’
क्या कहता है नियम
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जिले में रजिस्टर्ड पैथोलॉजी सेंटर है. जहां अल्ट्रासाउंड, खून और दूसरे जांच होते हैं. मानक के मुताबिक, हर पैथोलॉजी में एक पैथोलॉजिस्ट जरूर होना चाहिए.इसके अलावा जरूरत के मुताबिक, प्रशिक्षित लोगों से काम करवाना चाहिए. मेडिकल कचरे का सही तरीके से डिस्पोजल हो. मरीजों से लूट पर लगाम लगाने के लिए हर जांच के रेट एक बोर्ड पर दर्ज होने चाहिए, लेकिन जिले के ज्यादातर पैथोलॉजी सेंटर कुछ मानकों पर ही अमल कर रहे है.न इन सेंटर पर हर वक्त पैथॉलोजिस्ट मौजूद रहते हैं. न यह मेडिकल कचरे का सही तरीके से निस्तारण करते हैं. अधिकांश पैथोलॉजी में संबंधित जांच का कोई रेट लिस्ट भी नहीं लगा है.

