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*जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका को विफल किया है-वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे*

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बीसीआई अध्यक्ष ने खारिज किया वरिष्ठ वकील का दावा

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने समझौता नहीं किया है। वह आज भी स्वतंत्र है और संविधान व कानून की रक्षा में मजबूती से खड़ी है। मिश्रा का यह बयान तब आया है, जब वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने आरोप लगाया है कि जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से पदभार ग्रहण करने वाले प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश ने न्यायपालिका को विफल किया है। 

मनन मिश्रा ने दवे के इस बयान को गलत बताया। उन्होंने कहा कि मई 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद भारत के विभिन्न मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, जो लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करते हैं। उन्होंने कहा, ‘हम रिकॉर्ड की जांच करें, तथ्य दर तथ्य, मुख्य न्यायाधीश दर मुख्य न्यायाधीश, और फैसले दर फैसले। हम मई 2014 से लेकर अब तक नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सेवा देने वाले भारत के प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश का मूल्यांकन करें और देखें कि क्या उनका न्यायिक नेतृत्व समझौता या साहस, पूर्वाग्रह या सांविधानिक निष्ठा दर्शाता है।’

बयानबाजी या धारणा पर आधारित नहीं हो सकती आरोपों की विश्वसनीयता 
मिश्रा ने कहा कि इस तरह के व्यापक आरोपों की विश्वसनीयता केवल बयानबाजी या धारणा पर आधारित नहीं हो सकती, बल्कि इसे सांविधानिक जांच का सामना करना होगा और न्यायपालिका के वस्तुनिष्ठ आचरण के आधार पर परखा जाना होगा। मिश्रा ने कहा, ‘गहन रूप से देखने पर पता चलता है कि संविधान को विफल करने के बजाय, मई 2014 से प्रत्येक मुख्य न्यायाधीश के अधीन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे निर्णय दिए हैं, जिन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों की पुष्टि और उन्नति की है, नागरिक स्वतंत्रता का विस्तार किया है, संस्थागत स्वतंत्रता को बरकरार रखा है और हमारे गणतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों को संरक्षित किया है।’

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कार्यपालिका के खिलाफ फैसले दिए
मिश्रा ने कहा कि अगर न्यायपालिका ने वास्तव में समझौता किया होता, तो बार-बार ऐसा पैटर्न दिखता कि उसने कार्यपालिका के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। लेकिन असल में ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कार्यपालिका के खिलाफ फैसले दिए हैं, और यह दिखाता है कि अदालतें आज भी स्वतंत्र और संविधान के प्रति वफादार हैं। 

मिश्रा ने दवे के आरोपों और मंशा पर उठाया सवाल
मिश्रा ने दवे के आरोपों के समय और मंशा पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दवे ने अपने 48 साल के वकालत जीवन में कभी इतने बड़े आरोप नहीं लगाए थे। अब जब उन्होंने सेवानिवृत्ति की घोषणा की है, तभी ये बातें कर रहे हैं। मिश्रा ने तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामले में 8 अप्रैल को पारित ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें न्यायमूर्ति पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य के विधेयकों पर सहमति न देने के तमिलनाडु के राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण पर जोर दिया था।

अन्य न्यायाधीशों ने भी संविधान की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
मिश्रा ने कहा कि यह फैसला संघवाद, प्रतिनिधि लोकतंत्र और विधायिका की स्वतंत्रता के प्रति न्यायालय की प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा कि यह फैसला यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका राज्य-केंद्र से संबंधित संवेदनशील मामलों में भी अपने सांविधानिक अधिकार का प्रयोग जारी रखती है। मिश्रा ने यह भी कहा कि सिर्फ मुख्य न्यायाधीश ही नहीं, बल्कि मोदी काल में नियुक्त अन्य न्यायाधीशों ने भी संविधान की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

सभी मुख्य न्यायाधीशों पर एक साथ सवाल उठाना गलत
मिश्रा ने अंत में कहा कि लोकतंत्र में फैसलों की आलोचना जरूरी है, लेकिन बिना सबूत के सभी मुख्य न्यायाधीशों पर एक साथ सवाल उठाना गलत है। इससे लोगों का न्यायपालिका पर भरोसा कमजोर होता है और उन जजों का मनोबल गिरता है जो कठिन परिस्थितियों में भी निष्पक्ष फैसले लेते हैं।

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