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कार्पोरेट लूट और भूमि कब्ज़ा के खिलाफ देशभर के किसान  संगठनों ने राष्ट्रपति को भेजा पत्र

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भूमि अधिकार आंदोलन के आह्वान पर देशभर के किसान संगठनों, जन आंदोलनों और मानवाधिकार समूहों ने आज राष्ट्रपति को पत्र भेजकर प्राकृतिक संसाधनों की कॉरपोरेट लूट पर रोक लगाने की मांग की। यह कदम 29-30 जुलाई को हुई राष्ट्रीय बैठक में लिए गए उस निर्णय के तहत उठाया गया, जिसमें 13 अगस्त को भूमि कब्ज़ा और कॉरपोरेट लूट के खिलाफ राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का आह्वान किया गया था।

पत्र में कहा गया है कि यह सिर्फ ज़मीन की लड़ाई नहीं, बल्कि रोज़गार, लोकतंत्र और गरिमा की रक्षा का संघर्ष है। पिछले एक दशक में विकास के नाम पर चलाई गई नीतियों और परियोजनाओं ने किसानों, आदिवासियों, दलितों, पशुपालकों, मछुआरों और अन्य मेहनतकश तबकों को उनकी भूमि, जंगल और जल स्रोतों से बेदखल किया है।

किसानों ने राष्ट्रपति से मांग की कि पानी, जंगल, ज़मीन और खनिज जैसे प्राकृतिक संसाधनों को निजी कंपनियों को सौंपना तुरंत रोका जाए। पिछले 11 वर्षों में कॉरपोरेट कंपनियों और स्वार्थी व्यक्तियों को दी गई भूमि और जंगल की गहन जांच की जाए तथा उसके पर्यावरणीय और सामाजिक असर की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

पत्र में आरोप है कि इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, माइनिंग ज़ोन, भारतमाला, सागरमाला, स्मार्ट सिटी, एसईजेड और बिज़नेस कॉरिडोर जैसी परियोजनाओं के नाम पर ज़मीन का अधिग्रहण 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून का उल्लंघन है। किसानों ने स्पष्ट किया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार कानून 2013, वन अधिकार कानून 2006 और पेसा कानून 1996 को कमजोर करने की कोशिशें बंद होनी चाहिए।

संगठनों ने कॉरपोरेट लैंड बैंक और लैंड पूलिंग को “ज़मीन हथियाने के छिपे हुए तरीके” बताते हुए इन्हें रद्द करने की मांग की। उन्होंने कहा कि उपजाऊ कृषि भूमि को मॉल, एसईजेड और रियल एस्टेट जैसी गैर-कृषि गतिविधियों में बदलना खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आजीविका के लिए खतरा है।

किसानों ने भूमि सुधार कानूनों का पूर्ण कार्यान्वयन एवं आजीविका अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होने, सीलिंग सरप्लस, चारागाह भूमि, बेनामी भूमि, भूदान भूमि और बटाईदारी कानून सहित सभी भूमि सुधार प्रावधानों को लागू करने और भूमि को भूमिहीनों में पुनर्वितरित करने की मांग की है। साथ ही राज्य-समर्थित सहकारी एवं सामूहिक खेती मॉडल को बढ़ावा दें ताकि लोकतांत्रिक व सतत तरीक़े से कृषि का आधुनिकीकरण हो सके और कॉर्पोरेट कब्ज़ा रोका जा सके। इसके अलावा अमीरतम 1% पर 2% वार्षिक संपत्ति कर और 33% उत्तराधिकार कर लगाने की मांग रखी, ताकि भोजन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पेंशन जैसे सार्वभौमिक अधिकारों के लिए धन उपलब्ध हो सके।

पत्र में कहा गया कि पिछले 11 वर्षों से किसानों को लागत और 50 प्रतिशत पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और कर्ज़माफी से वंचित रखा गया है। किसानों की आय दोगुनी करने के बजाय लागत और संकट दोगुना हो गया है। सरकारी आंकड़े दर्शाते हैं कि कृषि पर निर्भर 48% कार्यबल और ग्रामीण भारत के 60% परिवारों की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ी है। ग्रामीण भारत में 2200 कैलोरी प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की खपत को गरीबी की पहचान मानते हुए, 1993-94 में 58% लोग इस स्तर से नीचे था। यह वह समय था जब 1991 में नवउदारवाद की शुरुआत हुई थी। 2011-12 में यह आंकड़ा बढ़कर 68% हो गया। 2017-18 तक हालत इतनी खराब हो गई कि सरकार ने उस वर्ष का उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण सार्वजनिक करने से ही मना कर दिया और आंकड़ों को बदल डाला। फिर भी जो थोड़ी जानकारी सामने आई, उससे यह स्पष्ट हुआ कि 80.5% ग्रामीण लोग इस न्यूनतम कैलोरी स्तर से नीचे थे।

किसान संगठनों ने मौजूदा निर्यात-आधारित विकास मॉडल की जगह कृषि-आधारित विकास की दिशा अपनाने, किसानों को लाभकारी मूल्य और मजदूरों को न्यूनतम जीवन निर्वाह मजदूरी देकर 140 करोड़ भारतीयों की क्रय शक्ति बढ़ाने की वकालत की।

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