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किसान MSP की मांग पर अड़े; ये कैसे कैलकुलेट की जाती है? और किसान क्यों MSP पर कानून चाहते हैं?

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केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनोें को रद्द कर दिया है, लेकिन किसान अभी भी MSP की मांग पर अड़े हुए हैं। किसानों की मांग है कि सरकार MSP का लागू करने का लिखित आश्वासन दे उसके बाद ही किसान आंदोलन खत्म करेंगे। इसके बाद केंद्र सरकार ने MSP पर चर्चा के लिए समिति गठित करने का फैसला लिया है।

समझते हैं, MSP क्या होती है? कौन तय करता है? कैसे कैलकुलेट की जाती है? सरकार अभी किस हिसाब से किसानों को MSP देती है? MSP को लेकर किसानों की क्या मांग है? और क्या दूसरे देशों में भी किसानों को MSP दी जाती है?…

सबसे पहले समझते हैं MSP क्या होती है?

MSP यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस या फिर न्यूनतम समर्थन मूल्य। केंद्र सरकार फसलों की एक न्यूनतम कीमत तय करती है, इसे ही MSP कहा जाता है। अगर बाजार में फसल की कीमत कम भी हो जाती है, तो भी सरकार किसान को MSP के हिसाब से ही फसल का भुगतान करेगी। इससे किसानों को अपनी फसल की तय कीमत के बारे में पता चल जाता है कि उसकी फसल के दाम कितने चल रहे हैं। ये एक तरह फसल की कीमत की गारंटी होती है।

कौन तय करता है MSP?

फसलों की MSP कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस (CACP) तय करता है। आयोग समय के साथ खेती की लागत और बाकी पैमानों के आधार पर फसलों की कम से कम कीमत तय करके अपने सुझाव सरकार के पास भेजता है।

MSP तय कैसे की जाती है?

MSP कैलकुलेट करने के लिए 3 अलग-अलग वेरिएबल का प्रयोग किया जाता है। इसमें A2, A2+FL और C2 शामिल हैं।

किसानों को किन फसलों पर मिलती है MSP?

सरकार अनाज, दलहल, तिलहन और बाकी फसलों पर MSP देती है।

सरकार अभी किस हिसाब से देती है MSP?

सरकार अभी A2+FL फार्मूले के आधार पर ही एमएसपी दे रही है।

MSP पर किसानों की क्या मांग है?

क्या देश में MSP पर कोई कानून है?

क्या सभी किसानों को MSP का फायदा मिलता है?

2012-13 की नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 10% से भी कम किसान अपनी फसल को MSP पर बेचते हैं। ताजा आंकड़े बताते हैं कि MSP पर फसल बेचने वाले किसानों की संख्या कम होकर 6% हो गई है। यानी किसानों का एक बड़ा वर्ग अभी भी MSP पर अपनी फसल नहीं बेचता।

MSP की शुरुआत कैसे हुई?

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान भारत में खाद्य संकट गहराने लगा था। तब ब्रिटिश सरकार ने इससे निपटने के लिए 1 दिसंबर 1942 को फूड डिपार्टमेंट की स्थापना की थी। आजादी के बाद भारत सरकार ने इस डिपार्टमेंट को फूड मिनिस्ट्री यानी खाद्य मंत्रालय में बदल दिया। 1960 में खाद्य मंत्रालय को दो अलग-अलग डिपार्टमेंट में बांट दिया गया – डिपार्टमेंट फॉर फूड और डिपार्टमेंट फॉर एग्रीकल्चर। अभी तक भारत में खाद्य संकट का कोई हल नहीं निकला था और इसी दशक में भारत ने ग्रीन रिवॉल्यूशन पर काम करना शुरू किया। 1965 में एग्रीकल्चर प्राइसेस कमीशन बना जिसका बाद में नाम बदलकर कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट एंड प्राइसेस (CACP) कर दिया गया। इसी कमीशन का काम किसानों से उनकी फसल सही कीमत पर खरीदना था। इस कीमत को ही MSP कहा जाता है। 1966-67 में देश में पहली बार गेंहू को MSP पर खरीदने की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे MSP को बाकी फसलों पर भी लागू किया गया।

दुनियाभर के देश किस तरह अपने किसानों की वित्तीय मदद करते हैं, वो भी जान लीजिए

यूरोपीयन यूनियन

यूरोपीयन यूनियन के सभी सदस्य देशों के लिए एक कॉमन एग्रीकल्चरल पॉलिसी है। इस पॉलिसी के तहत किसानों को सब्सिडी देने की व्यवस्था है। यूरोपीयन यूनियन में किसानों को सब्सिडी देने का मुख्य उद्देश्य छोटे किसानों की आर्थिक मदद करना है। 2019 में यूरोपीयन यूनियन के 103 बिलियन यूरो के कुल बजट में से 57 बिलियन यूरो CAP के लिए आवंटित किया गया था।

अमेरिका

1930 के दशक में आए भयानक ग्रेट डिप्रेशन में किसानों की आर्थिक सहायता के लिए अमेरिका में फार्म बिल्स पेश किए गए थे। इसके तहत किसानों को आर्थिक सहायता के साथ ही फसल का बीमा किया जाने का प्रावधान था। फसल बीमे के कुल खर्च का 70% तक सरकार देती है और बची राशि किसान को देना होती है। 2020 में अमेरिका ने किसानों को 46 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी थी।

चीन

चीन में भी किसानों को वित्तीय मदद देने के लिए अलग-अलग योजनाएं हैं। 2006 में चीन ने कृषि पर लगने वाले लगभग हर तरह के टैक्स को खत्म कर दिया था। साथ ही भारत की ही तरह चीन अपने किसानों को MSP भी देता है।

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