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गुना में पहली बार मुनि दीक्षा:पहले दूल्हे की तरह सजकर सांसारिक सुख का अनुभव फिर केश लोचन से दी संयम की परीक्षा

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गुना

मुनि दीक्षा ले रहे तीन साधक गुरुवार को एक ही दिन में दो बिल्कुल विपरीत अनुभवों से गुजरे। दिन में जहां दूल्हे की तरह सजाकर उनकी शोभायात्रा (बिनौली या बारात) निकाली गई। करीब 3 घंटे तक चली बिनाैली में सैकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया। जगह-जगह उनकी गोदभराई की गई।

सांसारिक चमक-दमक के चरम तक पहुंचने के बाद शाम को केश लोचन जैसी रस्म से गुजरना पड़ा, जिसमें उनके सिर व चेहरे के बाल हाथ से खींचकर निकाले गए। यह एक ऐसी रस्म होती है जिसमें संयम और सहनशक्ति की चरम परीक्षा होती है।

शुक्रवार यानि 12 फरवरी को नसियाजी में सुबह 6 बजे से दीक्षा का मुख्य समारोह शुरू होगा। इसमें सबसे पहले सभी साधकों को हल्दी लगाकर स्नान कराया जाएगा। इसके बाद 7 बजे से लगातार दोपहर 12 बजे तक दीक्षा का मुख्य आयोजन होगा। इसी दौरान संसार के साथ जोड़ने वाली अंतिम कड़ी यानि उनके वस्त्रों का भी त्याग करा दिया जाएगा। यानि वे पूरी तरह दिगंबर मुनि बन जाएंगे।

चौथे दीक्षार्थी पहले ही दे चुके हैं यह परीक्षाएं
मुनि दीक्षा लेने वाले चौथे दीक्षार्थी ऐलख नेमीसागरजी महाराज न बिनौली में शामिल हुए न ही उनके केश लोचन किए गए। कारण यह है कि वे पहले ही इन प्रक्रिया से गुजर चुके हैं। एलक के रूप में मुनिदीक्षा की 80 फीसदी रस्मों को वह पहले ही निभा चुके हैं। पूर्ण दिगंबर मुनि बनने के आखिरी चरण में उन्हें शुक्रवार के कार्यक्रम में ही शामिल होना है।

दीक्षा की प्रक्रिया : दो दिन संसार के सुखों से साक्षात्कार ताकि इच्छा बाकी न रहे
मुनिदीक्षा से पहले दीक्षार्थियों को सांसारिक जीवन के हर सुख का अनुभव कराया जाता है। तीन दिन की इस प्रक्रिया में दो दिन इसी को समर्पित रहते हैं। मसलन बुधवार को उनकी गोद भराई और मेहंदी लगाने की रस्में हुईं। यह सारी प्रक्रिया विवाह के दौरान की जाने वाली रस्मों जैसी होती हैं। गुरुवार को उनकी बारात निकाली गई। तीनों दीक्षार्थियों को सजी हुई बग्घी में बिठाया गया। उन्हें कीमती कपड़े पहनाए। रास्ते में उनकी गोद में फल, अनाज से लेकर रुपए-पैसे सब डाले गए। यह सब इसलिए कि मुनि जीवन को जीने से पहले उनके मन में कोई इच्छा बाकी न रह जाए।

संन्यास की ओर… सबसे मुश्किल जीवन की तैयारी आज से होगी शुरू
गुरुवार शाम को 6 बजे बारात खत्म हुई। तीनों दीक्षार्थियों ने जैसे ही बग्घी के नीचे अपने पैर रखे तो हमेशा के लिए हर तरह के वाहन का त्याग कर दिया। इसके बाद जीवनभर वे सिर्फ पैदल चलेंगे। आवागमन का हर साधन अब उनके लिए वर्जित हो गया। देर शाम को मंदिर में उनके कैश लोचन किए गए। आम आदमी के लिए यह बहुत दर्दनाक प्रक्रिया हो सकती है। उनके बाल हाथों से उखाड़े जाते हैं। यह रस्म भी आगे के पूरे संन्यासी जीवन के लिए साथ रहेगी।

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