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पूर्व मंत्री मानस भुइयां ने छोड़ी तृणमूल कांग्रेस

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है। वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मानस भुइयां  ममता बनर्जी  ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपना इस्तीफा सीधे  को भेजा और पार्टी छोड़ने के पीछे वैचारिक कारणों का हवाला दिया।

सिद्धांतों से भटकने का लगाया आरोप

अपने इस्तीफे में मानस भुइयां ने कहा कि जिन राजनीतिक मूल्यों और सिद्धांतों को ध्यान में रखकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था, पार्टी अब उनसे दूर होती दिखाई दे रही है। इसी वजह से उन्होंने संगठन से अलग होने का फैसला लिया है।

हालांकि, उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सीधे तौर पर कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाया। न तो ममता बनर्जी और न ही (Abhishek Banerjee) के खिलाफ उन्होंने कोई टिप्पणी की।

राजनीति से संन्यास नहीं

मीडिया से बातचीत में भुइयां ने स्पष्ट किया कि उनका इस्तीफा राजनीति से दूरी बनाने का संकेत नहीं है। उन्होंने कहा कि वे सक्रिय राजनीति में बने रहेंगे। हालांकि, उन्होंने अपने अगले राजनीतिक कदम का खुलासा नहीं किया, जिससे उनके भविष्य को लेकर अटकलों का दौर शुरू हो गया है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वे अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं या किसी नए राजनीतिक विकल्प के साथ आगे बढ़ सकते हैं।

बंगाल की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं भुइयां

मानस भुइयां पश्चिम बंगाल के अविभाजित मिदनापुर क्षेत्र के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। उन्होंने लंबे समय तक सबांग विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस में रहते हुए वे प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं।

वर्ष 2016 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा था। उनके पार्टी में आने के बाद सबांग और आसपास के क्षेत्रों में टीएमसी की संगठनात्मक स्थिति मजबूत हुई थी। बाद में उन्हें राज्य मंत्रिमंडल में भी जगह मिली।

चुनावी हार के बाद बढ़ा दबाव

मानस भुइयां का इस्तीफा ऐसे समय में सामने आया है जब चुनावी झटकों के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की चर्चाएं तेज हैं। पार्टी के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भुइयां जैसे अनुभवी नेता का पार्टी छोड़ना केवल एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि बंगाल की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों का संकेत भी माना जा सकता है।

अब नजर इस बात पर रहेगी कि मानस भुइयां आगे किस राजनीतिक रास्ते का चुनाव करते हैं और उनके इस कदम का तृणमूल कांग्रेस की भविष्य की रणनीति पर क्या असर पड़ता है।

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