जायका में आज स्वाद की राजधानी इंदौर की प्रसिद्ध बम कचोरी की बात करेंगे। व्यस्तता के कारण इस दुकान मालिक के बड़े बेटे पूरे दिन ग्राहकों से कुछ बोलते नहीं, बस देखकर मुस्कुरा देते हैं। कभी वे आठ पैसे की दूसरों से कचोरी खरीदकर लाते और 10 पैसे में घूम-घूमकर बेचा करते थे। फिर खुद की शॉप खोली।

राजस्थान के पाली जिले के एक गांव के रहने वाले हैं बद्रीलाल सेठ शर्मा। अभी उम्र है करीब 82 साल। बात 60 के दशक की है। उनका रिश्ता इंदौर की भंवरी बाई से हुआ था। भंवरी बाई का परिवार सराफा में सोना-चांदी गलाने का काम करता था। उनकी दुकान भी थी। शादी के बाद शहर से दूर भंवरी बाई जब राजस्थान अपने ससुराल गई तो वहां का रहन-सहन पसंद नहीं आया। यह बात उन्होंने बद्रीलाल के साथ मायके वालों को भी बता दी। इस पर भंवरी बाई के मायके वालों ने दामाद बद्रीलाल से कहा कि आप इंदौर ही आकर बस जाओ, अच्छा शहर है, यही कुछ काम कर लेना।
बद्रीलाल ने सोच विचार के बाद हां कर दी। वे इंदौर आ गए और गोरा कुंड शक्कर बाजार के पास बस गए। ससुराल की पुश्तैनी दुकान में ही काम करने लगे। कई साल काम किया। इसके बाद 1962 के आसपास उन्होंने अपना कुछ करने का मन बनाया। जो कुछ जमा पूंजी थी, उससे नई दुकान खरीद पाना संभव नहीं था।
बद्रीलाल बताते हैं कि सबसे ज्यादा कचोरी सेंट राफेल स्कूल के आसपास बिका करती थी। यहां शहर के बड़े परिवार की लड़कियां मोटर गाड़ी से पढ़ने आया करती थीं। उनको छोड़ने आए उनके घरवाले भी बच्चियों के कहने पर मेरी कचोरी खाने लगे।
बनाने की प्रोसेस के साथ सिगड़ी का कॉम्बिनेशन बनाता है खास
- यह कचोरी आज भी सिगड़ी पर ही बनाई जाती है। इसे धीमी आंच में ही तलना पड़ता है।
- मूंग दाल को उबालने के बाद बेसन, मालवी लाल मिर्च और घर में बने गरम मसाले ही उपयोग करते हैं।
- कचोरी का मसाला भी सिगड़ी पर ही सेंका जाता है।
- मूंगफली के तेल का इस्तेमाल होता है।
- टेस्ट खस्ता की तरह बनाया जाता है।
- इमली की चटनी का खट्टा मीठा स्वाद ग्राहकों को लुभाता है।
शहर के कई बड़े नेता हैं इनकी कचोरी के दीवाने
82 साल के बद्रीलाल बताते हैं कि जब मैंने शुरूआत की और कचोरी की डिमांड बढ़ने लगी तो कई पुराने दिग्गज नेता और अफसर भी लंच के समय मेरी कचोरी मंगवाने लगे। 1966 में वकील से नगर निगम के सदस्य बने विपक्ष के नेता यज्ञदत्त शर्मा मुझे अपने घर कचोरी लेकर बुलवाते थे। अगर एक-दाे दिन में उनके बंगले के सामने से नहीं जाता तो परिवार वाले रास्ता देखते थे। पूर्व विधायक अश्विन जोशी और पंकज संघवी भी शुरू से हमारी दुकान पर आते रहे हैं। आज भी मौका मिलने पर वे बम कचोरी खाए बिना नहीं जाते।
ग्राहकों की राय : स्कूल छूटे 35 साल हुआ पर कचोरी खाना नहीं छोड़ा
- बाल विद्या मंदिर में पढ़ने वाले अतुल भामोरे ने कहा कि मुझे स्कूल छोड़े 35 साल हो गए, बद्री भैया की कचोरी का आज भी वहीं स्वाद है। भैया की आवाज और अंदाज भी उसी तरह से बना हुआ है। अब ऑफिस से लौटते वक्त इनकी कचोरी बच्चों के लिए ले जाता हूं। अगर किसी दिन भूल भी गए तो दोबारा आना पड़ता है।
- शीतला माता बाजार के व्यापारी अभिषेक बताते हैं कि प्रसिद्ध कचोरी खाते हुए हमारा पूरा बचपन गुजरा है। पिताजी चार आने यानी 25 पैसा की कचोरी लाते थे। मुझे 50 पैसे की खरीदने की याद है। आज यह 15 रुपए में मिलती है।
- नमकीन व्यापारी देवीलाल प्रजापति कहते हैं कि मेरी उम्र 50 से 55 वर्ष की हो गई है। जब मालवाड़ी स्कूल में पढ़ता था तब स्कूल नया बना था, तब से बद्रीलाल जी हमारे स्कूल में साइकिल से कचोरी लेकर आया करते थे। ये सन 1975 की बात होगी। शुरू में कितने की मिलती थी ये तो याद नहीं है लेकिन हां एक और दो रुपए में भी खायी है।
- डॉ. ललित सिकरवार ने बताया बाबू जी को मैं बचपन से जनता हूं। 8वीं क्लास में था, तब नौ नम्बर स्कूल में पढ़ता था। अंकल जी इंटरवल में कचोरी लेकर आया करते थे, हमें जैसे ही जोर से “बम” की आवाज सुनाई देती थी। हम समझ जाते थे कि कचोरी आ गई है, मुझे आज 20 से 25 साल खाते हुए हो गए हैं। कोयले की भट्टी में कचोरी बनती है, यही स्वाद का राज है।