एस पी मित्तल,अजमेर
इस ब्लॉग में राजसमंद निवासी उन गोविंद सिंह चौहान के विचारों को बता रहा हूं जो पिछले 30 वर्ष से लेखन का कार्य कर रहे हैं। जबकि उनका 80 प्रतिशत शरीर बेकार है। चौहान को उल्टा होकर लिखना पड़ता है। भोजन कराने का कार्य भी उनकी पत्नी करती है। चौहान के विचारों को ज्यों का त्यों यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। अंत में उनके फोन नंबर भी अंकित हैं।
अरावली पर्वत शृंखलाओं में राजसमन्द जिले का एक छोटा सा गांव भागावड़ पहाडिय़ों के बीच बीस से पच्चीस केलूपोश घरों की आबादी। उबड़ खाबड़ पथरीली पगडंडियों से बचपन की शुरुआत और प्राथमिक शिक्षा का श्रीगणेश। फिर गांव से पाँच किलोमीटर दूर टॉडगढ़ कस्बे में कक्षा छह से ग्यारह तक की शिक्षा पैदल आते जाते पूरी की। ग्यारहवीं उत्तीर्ण कर बीए प्रथम वर्ष जुलाई 1985 में सनातन धर्म राजकीय महाविद्यालय ब्यावर में प्रवेश लेने वाले गांव क्षेत्र के पहले विद्यार्थी बने गोविन्द सिंह चौहान। कविताएं और गीत मन को आकर्षित करते थे और उसी दौरान पहली बार मित्रों को देख लेखन में रुचि जागी। प्रथम प्रयास में मुक्तक और कविताओं से लेखन की शुरुआत की जो स्थानीय अखबारों, महाविद्यालय स्मारिका के साथ साहित्यलोचन मंच ब्यावर के काव्य संग्रह आहिस्ता आहिस्ता में चार रचनाएं छपी। कॉलेज में तथा साहित्यलोचन मंच से कभी कभी कविता पाठ भी करता रहे। यह प्रारम्भिक काल था लेखन का। विद्यार्थी जीवन का सुनहरा समय राजनीति विज्ञान में अधिस्नातक होते ही वर्ष 1989 में समाप्त हो गया। साहित्यिक रुचि के प्रारम्भ में ही प्रारब्धवश जीवन सफर में कठिन परिस्थितियों का आगमन हो गया।
शहर को अलविदा कहकर वर्ष 1990 में पुन: गांव आ गया । गांव से दस किलोमीटर दूर एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापक की नौकरी करने लगे। बीएड प्रवेश परीक्षा की तैयारियां भी साथ चल रही थी। यहीं से एक जैनाचार्य गुणरत्न सूरीश्वर के सम्पर्क में आए जिन्होंने बालदा पिंडवाड़ा सिरोही में एक जैन मंदिर के जीर्णोद्धार कार्य की देखरेख करने की जिम्मेदारी देकर वहाँ भेजा। इस तरह ज़िन्दगी की जद्दोजहद और जीविकोपार्जन के संघर्ष के बीच सिरोही से वापस आते समय 25 जनवरी 1992 की रात सड़क दुर्घटना में गर्दन और रीढ़ की हड्डी में चोट लगने से गर्दन से नीचे शरीर का 80 फीसदी भाग शून्य होकर गतिहीन हो गया। अचानक हुए हादसे ने आर्थिक तथा मानसिक रूप से पूरे परिवार को भी तोड़कर रख दिया। स्वप्निल पलों का छीन जाना और पत्नी के साथ जीवन यापन, एक प्रश्नचिन्ह खड़ा करने लगा। जिन्दा रहूँ या नहीं? परिस्थितियों के अनुसार पत्नी ने हादसे को अपनी नियति मान एकमात्र पुत्र के सहारे मेरे साथ ही रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया और अब तक बखूबी साथ निभा रही है। माता-पिता, छोटे-भाईयों व बहन का बहुत साथ मिला। परिजनों की व विशेष तौर पर धर्मपत्नी की तीमारदारी व कई बड़े अस्पतालों के इलाज के बाद एक हाथ में कुछ जान आई । दुर्घटनाग्रस्त जीवन के 15 वर्ष बाद लेखक की शारीरिक मानसिक आर्थिक यंत्रणाओं के बीच सेवानिवृत्त हिन्दी व्याख्याता, कवि, साहित्यकार सुरेन्द्र अंचल ब्यावर ने लेखन कार्य पुन: प्रारम्भ करने की प्रेरणा दी। अंचल जी के मार्गदर्शन में सामाजिक सरोकारों व जातिगत इतिहास विषय पर दो पुस्तकें प्रकाशित हुई। उल्टा लेट कर कोहनियों के सहारे लिखना बहुत तकलीफ़ भरा था। पराश्रित रहकर पाण्डुलिपियों को सम्भालना, क्रमबद्ध करना, व्यवस्थित रखवाना, प्रतिदिन पुन: लेना भी बहुत तनाव भरा कार्य था। साहित्यानुराग और खुद को साबित करने की लालसा में अंचल का प्रोत्साहन अमूल्य रहा। वर्ष 2016 में रिटायर थानेदार चन्दन सिंह निवासी छापली के सहयोग से युगधारा साहित्यिक सांस्कृतिक एवं वैचारिक मंच उदयपुर व काव्य गोष्ठी मंच राजसमन्द संस्थाओं का प्राथमिक सहभागी बना। साहित्य सेवा के प्रति समर्पण भाव, प्रतिबद्धता, नियमित स्वाध्याय तथा लेखन से साहित्य जगत् में अपना एक मुकाम बनाया। राष्ट्रीय युगधारा संस्था के संस्थापक डॉ. जयप्रकाश पण्ड्या ज्योतिपुंज, अध्यक्ष लालदास पर्जन्य, कवयित्री किरण बाला जीनगर, कवि महेन्द्र साहू, डॉ उपेन्द्र अणु, तरुण कुमार दाधीच, डॉ. वीपी सिंह काछबली चेतन औदिच्य, तरुण दाधीच व सम्पूर्ण युगधारा परिवार का स्नेह व सहयोग मिला तो लेखन अनवरत गतिशील हुआ। राष्ट्रीय युगधारा साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक मंच उदयपुर द्वारा युगधारा सम्मान-2017 एवं चौदहवें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन जयपुर में बहुआयामी सांस्कृतिक संस्था सृजन सम्मान रायपुर (छत्तीसगढ़) द्वारा हिन्दी मित्र सम्मान 2017, देकर मुझे सम्मानित किया गया था। काव्य गोष्ठी मंच कांकरोली एवं युगधारा साहित्यिक मंच उदयपुर से कुछ आर्थिक सहयोग मिला, जिससे प्रथम हिंदी साहित्यिक पुस्तक का प्रकाशन हुआ।
पहले से इतिहास विषय में दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थी। इससे दिव्यांग लेखक की रावत राजपूत समाज में एक पहचान स्थापित हुई। क्षत्रिय रावत राजपूत समाज इक आईना ऐतिहासिक संदर्भ की पुस्तक 2014 अप्रैल, अजमेर मेरवाड़ा क्षत्रिय रावत दर्शन सामाजिक विश्लेषणात्मक पुस्तक मार्च 2016, सामाजिक विषय पर एक शोध पत्र प्रकाशनाधीन है। मैं खुद को ही खुद लिख दंू काव्य संग्रह, बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित जुलाई 2019 अमेजॉन पर उपलब्ध। काव्य संग्रह सबके हिस्से की धूप मेरठ के समदर्शी प्रकाशन से प्रकाशित अगस्त 2021, अमेजॉन पर उपलब्ध। संवेदनाओं के अक्स लघुकथा संग्रह राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर से प्रकाशित फरवरी 2022, अमेजॉन पर शीघ्र उपलब्ध होगा।
विकलांग गोविन्द सिंह चौहान के सामने रचनाओं का संकलन तैयार होने के बाद बड़ी समस्या थी रचनाओं का सम्पादन। इस समस्या का समाधान कवि महेन्द्र साहू ने सुझाया। युगधारा के वरिष्ठ साहित्यकार प्रकाश तातेड़, ज्योतिपुंज उदयपुर का मार्गदर्शक के रूप में स्नेहपूर्ण साहित्यिक योगदान अविस्मरणीय है। रावत राजेश सिंह, अर्जुनपुरा जागीर, पीटीआई गणपत सिंह, हाल एसडीएम कार्यालय ब्यावर, लोको पायलट जसवन्त सिंह मण्डावर द्वारा सोशल मीडिया व प्रिंट मीडिया कवरेज में बहुत सहयोग मिला। इनकी लेखनी से प्रभावित होकर राजस्थान रावत राजपूत महासभा जयपुर ब्यावर, राजस्थान रावत महासभा पुष्कर ने प्रतिभा सम्मान दिया एवं क्षत्रिय रावत परिषद अध्यक्ष आनन्द सिंह सुरडिय़ा, सतवीर सिंह ने लेखन सहायक सामग्री देकर सम्मानित किया। रावत धर्मेन्द्र सिंह लामाना ने प्रकाशन हेतु आर्थिक सहयोग दिया। खेड़ा जोताया नसीराबाद निवासी व्यवसाई रीमकू सिंह ने एक लेपटॉप और प्रिंटर घर आकर भेंट किया।
-लेखक गोविन्द सिंह चौहान गांव भागावड़, पोस्ट भीम डासरियां, जिला राजसमंद (राज)




