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हार्ट ट्रांसप्लांट के 20 साल पूरे हो गए और अपनी नॉर्मल जिंदगी जी रही हैं प्रीति … कामयाबी की कहानी बन गईं हैं प्रीति

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नई दिल्ली
प्रीति के हार्ट ट्रांसप्लांट के 20 साल पूरे हो गए और वह अपनी नॉर्मल जिंदगी जी पा रही हैं। प्रीति देश की सबसे ज्यादा समय की हार्ट ट्रांसप्लांट सर्वाइवर हैं। उनके हार्ट ट्रांसप्लांट की सफलता एक ऐसा मेडिकल सबूत है, जो दिल की बीमारी से जूझ रहे मरीज को समय पर ट्रांसप्लांट के लिए प्रेरित करता है। खुद प्रीति समय-समय पर ऐसे मरीजों से मिलकर उनकी परेशानी दूर करने में मदद करती हैं। प्रीति का ट्रांसप्लांट करने वाले कार्डिएक सर्जन डॉक्टर बलराम एरेन कहते हैं कि प्रीति खुद अपनी बीमारी को लेकर अलर्ट रहती हैं, हर छोटी-छोटी परेशानी पर सलाह लेती हैं, जिससे वह सामान्य जिंदगी जी पा रही हैं। इसका श्रेय उन्हें भी जाता है।

सांस उखड़ने लगती थी, एक शब्द बोल नहीं पाती थीं
मूल रूप से मध्य प्रदेश निवासी प्रीति ने बताया कि उन्हें डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी की शिकायत थी। उन्होंने कहा, 20 साल पहले नवंबर-2000 में मैं व्हीलचेयर पर एम्स आई थी। मैं चल नहीं पाती थी। एक शब्द बोल नहीं पाती थी। मेरी सांस उखड़ने लगती थी। हार्ट फंक्शन काफी कमजोर था। एम्स में दिखाया तो डॉक्टर ने कहा कि हार्ट ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपाय है। उसी समय मुझे एडमिट कर लिया गया। मुझे स्टेबल करने में डॉक्टरों को काफी समय लगा। 3 जनवरी 2001 को मेरा हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ और आज मैं अपना पूरा जीवन अपने तरीके से जी पा रही हूं। मैं बहुत खुश हूं।

यह अब तक की सबसे सफल सर्जरी रही
एम्स के हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जन रहे डॉ. बलराम एरेन ने बताया कि प्रीति हमारे यहां एडमिट थीं। एक रात अपोलो से कॉल आई कि 14 साल का लड़का ब्रेन डेड कर गया है। सड़क हादसे में उसे हेड इंजरी हुई थी। हमने तुरंत प्रीति की फैमिली को इस बारे में बताया, तो वे लोग ट्रांसप्लांट के लिए तैयार हो गए। एक टीम अपोलो गई जबकि दूसरी टीम प्रीति की सर्जरी की तैयारी में जुट गए और उसी रात ट्रांसप्लांट कर दिया गया। यह सर्जरी अब तक की सबसे सफल सर्जरी रही, जिसमें मरीज को दोबारा सर्जरी की नौबत नहीं आई। रिकॉर्ड के मुताबिक प्रीति देश की लॉन्गेस्ट हार्ट ट्रांसप्लांट सर्वाइवर हैं।

कई बार हुई रिजेक्शन की दिक्कत
प्रीति ने बताया कि ट्रांसप्लांट के बाद कई बार रिजेक्शन हुआ है, दिक्कत हुई है। लेकिन, हर बार सब ठीक हो गया। डॉ. बलराम ने भी कहा कि जब किसी दूसरे मरीज का कोई अंग लगाया जाता है तो रिजेक्शन का खतरा रहता है। इसके लिए इम्यूनोस्प्रेशन की दवा दी जाती है। लेकिन, ज्यादा दवा देने में संक्रमण का खतरा रहता है। कई बार रिजेक्शन के एपिसोड आए, लेकिन दवा से उसका इलाज करने में हम सफल रहे और अब भी वह एम्स में डॉ. शिव चौधरी, डॉ. संदीप सेठ और डॉ. मिलिंद होते के संपर्क में रहती हैं।

उस समय इतना सपोर्टिव सिस्टम नहीं था
डॉ. बलराम ने कहा कि अब मैं रिटायर हो चुका हूं, लेकिन प्रीति अब भी मेरे संपर्क में रहती हैं। उन्होंने कहा कि जब प्रीति का ट्रांसप्लांट हुआ तो पूरे देश में गिनती के ही ट्रांसप्लांट हुए थे। साल-1994 में इसकी शुरुआत हुई थी। उस समय इतना सपोर्टिव सिस्टम नहीं था, आज की तरह इम्यूनोस्प्रेशन की दवा नहीं थी, टेक्नोलॉजी नहीं थी। चुनौती थी, लेकिन एम्स की टीम हमेशा ऐसी चुनौतियों के लिए तैयार रहती है। आज भी किसी भी सरकारी अस्पताल में से सबसे ज्यादा हार्ट ट्रांसप्लांट एम्स में ही हुए हैं।

दूसरे मरीजों को भी समझाती हैं अब
प्रीति ने बताया कि ट्रांसप्लांट के बाद मेरे पति दिल्ली शिफ्ट हो गए, जिससे मुझे फॉलोअप करना आसान हो गया। बाद में मैं एम्स के आर्बो में काम करने लगी। कई बार हार्ट मरीज ट्रांसप्लांट के लिए तैयार नहीं होते। जब हार्ट के मसल्स बहुत खराब हो जाते हैं, तब वे तैयार भी होते हैं तो उतना फायदा नहीं होता। इसलिए कई बार मैं खुद मरीज के पास जाती हूं, बताती हूं। मैं अपने मन की भावना से उनका दर्द समझती हूं, उन्हें इसका फायदा बताती हूं तो लोग मान लेते हैं। पति के साथ-साथ मेरे पूरे परिवार का सहयोग है। मेरे घर के एक-एक व्यक्ति ने अंगदान की शपथ ली है। मुझे जिसकी वजह से यह नया जीवन मिला है, उसका मैं धन्यवाद करती हूं।

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