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*मध्यप्रदेश में शराब तस्करी का हैरान करने वाला मामला, हाई कोर्ट ने उठाए गंभीर सवाल*

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भोपाल: मध्य प्रदेश में शराब तस्करी का एक अजीब मामला सामने आया है। हाई कोर्ट भी इस मामले को देखकर हैरान है। एक ही दिन, एक ही पुलिस स्टेशन में, लगभग एक ही समय पर दो अलग-अलग गाड़ियों से 14760 लीटर अवैध शराब पकड़ी गई। आबकारी विभाग ने कहा कि एक गाड़ी खराब हो गई थी, इसलिए शराब को दूसरी गाड़ी में डाला गया।

इसलिए पकड़ी गई शराब और गाड़ी को छोड़ दिया गया। दोनों मामले हाई कोर्ट पहुंचे। हाई कोर्ट को इस बात पर हैरानी हुई कि डेढ़ घंटे में ट्रक कैसे खराब हुआ, अफसरों को कैसे खबर मिली, परमिट कैसे बना, दूसरा ट्रक कैसे आया और शराब कैसे लोड हो गई। कोर्ट को मामला संदिग्ध लगा, इसलिए दोनों ड्राइवरों की जमानत याचिका खारिज कर दी।

आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल

यही नहीं कोर्ट ने आबकारी विभाग के कामकाज और तस्करों से मिलीभगत पर सवाल उठाते हुए डीजीपी को एसआईटी जांच के आदेश दिए। कोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ जमानत का मामला नहीं है, बल्कि सिस्टम की साख का मामला है। डीजीपी ऑफिस के एआईजी सीआईडी विक्रांत मुराब ने बताया कि उन्हें अभी तक आदेश की कॉपी नहीं मिली है। आदेश मिलते ही कार्रवाई की जाएगी।

दो गाड़ियों से अवैध शराब की तस्करी

स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के हिसाब से यह मामला आलीराजपुर जिले के जोबट थाना क्षेत्र का है। 24 अक्टूबर 2024 को पुलिस को खबर मिली कि दो गाड़ियों से अवैध शराब की तस्करी हो रही है। पुलिस ने दोनों गाड़ियों को पकड़ा। एक कंटेनर (एमपी-09 जीएच 7550) था और दूसरा ट्रक (एमपी-15 एचए 3365) था। दोनों गाड़ियों से 14760 लीटर अंग्रेजी शराब जब्त की गई। शराब अलग-अलग बैच नंबर और तारीख की थी। कंटेनर के ड्राइवर शांतिलाल उर्फ सुनील और ट्रक ड्राइवर गजेंद्र को गिरफ्तार किया गया। दोनों के पास शराब ले जाने का कोई परमिट नहीं था। पुलिस ने कंटेनर मामले में अपराध क्रमांक 470/2024 और ट्रक मामले में 469/2024 दर्ज किया।

इस तरह से पकड़ में आई बात

4 फरवरी 2025 को इंदौर बेंच में जस्टिस संजीव एस। कलगांवकर की कोर्ट में दोनों ड्राइवरों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हुई। पता चला कि दोनों मामलों में अस्थायी परमिट घटना के दो महीने बाद 21 फरवरी 2025 को जारी किए गए थे। परमिट देने वाली एजेंसी का नाम खालसा एंड कंपनी था। एजेंसी के प्रतिनिधि पीयूष सिंह ने कहा कि एक गाड़ी खराब हो गई थी, इसलिए शराब दूसरे वाहन में ट्रांसफर की गई। कोर्ट को यह बात अजीब लगी कि डेढ़ घंटे में अफसरों को गाड़ी खराब होने की खबर दी गई, परमिट बना और दूसरी गाड़ी का इंतजाम करके शराब भी ट्रांसफर कर दी गई।

दोनों मामलों की एक जैसी कहानी

धार जिले के गंधवानी के आबकारी उपनिरीक्षक राजेंद्र सिंह चौहान कोर्ट में आए। उन्होंने माना कि उन्हें रात 8:30 बजे गाड़ी खराब होने की खबर मिली थी और 10:10 बजे शराब दूसरी गाड़ी से रवाना कर दी गई। कोर्ट ने पूछा कि क्या डेढ़ घंटे में यह सब काम हो सकता है? चौहान इसका जवाब नहीं दे पाए। कोर्ट ने यह भी देखा कि दोनों मामलों में एक जैसी कहानी बनाई गई। पहले गाड़ी खराब हुई, फिर दूसरी आई और शराब ट्रांसफर कर दी गई। दो महीने बाद अस्थायी परमिट दिखाया गया। इससे शक हुआ कि अफसर तस्करों से मिले हुए हैं।

जमानत याचिका पर सुनवाई

21 अप्रैल 2025 को ट्रक ड्राइवर गजेंद्र की दूसरी जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। हाई कोर्ट को बताया गया कि आलीराजपुर के एडीएम ने 29 जनवरी 2025 को आदेश दिया था कि अस्थायी परमिट मिल चुका है, इसलिए पकड़ी गई शराब और गाड़ी को छोड़ा जा सकता है। हाई कोर्ट ने कहा कि जिला कोर्ट से यह बात छुपाई गई कि अस्थायी परमिट दो महीने बाद जारी किए गए। परमिट में दर्ज बैच नंबर और बरामद शराब का बैच नंबर अलग-अलग है।

कोर्ट ने दिए जांच के आदेश

कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। कोर्ट को लगता है कि आबकारी विभाग के अफसर तस्करों के साथ मिले हुए हैं। इसलिए कोर्ट ने डीजीपी को एसआईटी जांच के आदेश दिए हैं। एसआईटी जांच से पता चलेगा कि इस मामले में कौन-कौन शामिल है।

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