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1 हजार साल पुराने भोजशाला का इतिहास,अंग्रेजी अफसर लंदन ले‌ गया मां सरस्वती की मूर्ति

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ब्रिटिश म्यूजियम में कैद मां सरस्वती की इकलौती 1000 साल पुरानी चमत्कारी प्रतिमा

बसंत पंचमी अर्थात मां सरस्वती का पूजन-अर्चन। धरती जब पीले फूलों का श्रृंगार करती है तब वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की अराधना की जाती है। आज  हम आपको बताने जा रहे है सरस्वती मां के एकमात्र मंदिर के बारे में जहां मां सरस्वती साक्षात रुप में विराजित थी और आज ब्रिटिश म्यूजियम में कैद है।

मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत उदाहरण है. यहां की हर इमारत अपने भीतर किसी न किसी युग की कहानी समेटे हुए है. इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों में धार स्थित भोजशाला भी शामिल है जो केवल पत्थरों से बनी एक संरचना नहीं बल्कि भारतीय ज्ञान, शिक्षा और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक मानी जाती है. कभी यह स्थान मां सरस्वती की आराधना और विद्या अध्ययन का विश्वविख्यात केंद्र रहा तो समय के साथ यह आस्था, इतिहास और विवाद का संगम भी बन गया. एक बार फिर भोजशाला चर्चा के केंद्र में है, ऐसे में इसके गौरवशाली अतीत और वर्तमान स्वरूप को जानना बेहद जरूरी हो जाता है.

मालवा ऐतिहासिक धरोहरों से भरा हुआ है. ‌इसी कड़ी में धार में स्थित भोजशाला भी भारतीय संस्कृति का झंडा बुलंद करती है. ‌यह आज‌ केवल एतिहासिक इमारत ही नहीं बल्कि प्राचीन शिक्षा, कला और संस्कृति का प्रतीक है. मां सरस्वती को समर्पित भोजशाला में एक समय में दुनिया भर से आए विद्वान ज्ञान प्राप्ति के लिए आते थे.

भोजशाला का निर्माण परमार वंश के महान राजा राजा भोज ने 1034 ईस्वी के आसपास किया था. वह एक महान योद्धा के साथ ही कला साहित्य और विज्ञान के संरक्षक भी थे. उन्होंने ही यहां वाग्देवी यानी मां सरस्वती की मूर्ति स्थापित की थी. उस समय यह एक शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन चुका था. जहां दुनिया भर से लोग व्याकरण और खगोल विज्ञान पढ़ने आते है. ‌

वाग्देवी की यही प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है. कहा जाता है कि 1875 के आसपास खुदाई के दौरान यहां से सरस्वती माता की एक अत्यंत सुंदर प्रतिमा मिली थी. जिसे एक अंग्रेज अफसर मेजर किनकैड अपने साथ लंदन ले गया. लंबे समय इसे वहां से वापस लाकर भोजशाला में ससम्मान स्थापित करने की मांग की जा रही है. भोजशाला विवाद के दौरान भी यही मूर्ति इसका सबसे बड़ा प्रमाण बनती है.

दरअसल खिलजी के धार पर आक्रमण कर भोजशाला को काफी नुकसान पहुंचाया था. इसके बाद मुस्लिम शासकों ने इसके ढांचे में भी कई बदलाव किए. 15 सी सदी के आसपास मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने यहां कुछ उसको मस्जिद के रूप में भी इस्तेमाल किया था. उसी दौरान यहां कुछ दरगाह और मस्जिद भी बनाई गई. मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला की मस्जिद मानता है. बसंत पंचमी पर यहां भव्य आयोजन होते रहे हैं जबकि कईं बार विवाद की स्थिति भी बन चुकी है.

धार में पहले कई बार धार्मिक तनाव रह चुका है. लेकिन धार्मिक गुरु और प्रशासन की सहमति से अब सब कुछ शांत वातावरण में होता है. भोजशाला में पूजा और नमाज दोनों होते है. मंगलवार को हिंदू पूजा करते है जबकि शुक्रवार को मुस्लिम नमाज पढ़ते है. बाकी दिनों के लिए यह स्थल पर्यटकों के लिए खुला रहता है. यहां बड़ी संख्या में पुरानी मूर्तियां और कलाकृति देखने को मिलती है. ‌

भोजशाला की बनावट देखते ही आपको उस समय की हिंदू संस्कृति और कलाकृति की झलक मिलती है. ‌यहां के खंभों पर संस्कृत में कई शिलालेख खुदे हुए है. जिनमें व्याकरण और काव्य के नियम लिखे गए है. दीवारों पर परमार काली मूर्तियां, श्लोक और संरचनाएं दिख जाती है. भोजशाला काफी बड़े क्षेत्र में फैली हुई है जानकार मानते है कि इसकी संरचना किसी मस्जिद जैसी नहीं बल्कि एक पारंपरिक भारतीय पाठशाला या मंदिर जैसी है.

एक बार फिर वसंत पंचमी से पहले भोजशाला का मुद्दा गरमा गया है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण 2024 में ही यहां वैज्ञानिक सर्वे करने के बाद अपनी रिपोर्ट बनाई है. इस सर्वे का मकसद यह पता लगाना था कि मौजूदा ढांचे के नीचे क्या कोई मंदिर के अवशेष मौजूद है. फिलहाल इस‌ सर्वे की रिपोर्ट आना बाकि है. अगर आप भी भोजशाला जाना चाहते है तो मंगलवार और शुक्रवार छोड़कर कभी भी जाकर इसके इतिहास को और करीब से देख सकते हैं.

जी हां, धार की भोजशाला में राजा भोज ने सरस्वती मां की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा की थी। महाराजा भोज के लिए कहा जाता है कि वे मां सरस्वती के पुत्र थे। धार की भोजशाला उनकी तपोभूमि थी। यहां राजा भोज की तपस्या और साधना से प्रसन्न हो कर मां सरस्वती ने स्वयं प्रकट हो दर्शन दिए थे। मां के दर्शन पाने के बाद राजा भोज ने ( 1010 से 1055) स्वयं अपने हाथों से इस अप्रतिम प्रतिमा को तराशा था।

वहीं कुछ लोगों का मानना था कि प्रसिद्ध मूर्तिकार मंथल ने इस मूर्ति को तराशा। भूरे रंग की स्फटिक से निर्मित यह प्रतिमा अत्यंत ही चमत्कारिक, मनमोहक औऱ शांत मुद्रा वाली है। जिसमें मां का अपूर्व सौंदर्य बेहद चित्ताकर्णक है। माना जाता है कि इस मूर्ति के दर्शन मात्र से ही लोगों के अंदर का अज्ञान दूर होता था। इसलिए महाराजा भोज ने इस जगह को शाला (स्कूल) का रूप दिया औऱ यह भोजशाला कहलाई।

 राजा भोज वास्तुविशेषज्ञ भी थे। उन्होंने ऐसे मंदिर की स्थापना की थी जिसका हर कोण वास्तु के हिसाब से बिलकुल उचित था। यहां स्थापित इस मूर्ति के बारे में कहा जाता था कि यह अज्ञानियों का अज्ञान दूर करती थी। मंदबुद्धि व्यक्ति यहां आकर ठीक हो जाते हैं। यहां बाहर बनी अकलकुई में स्नान करने से मंदबुद्धि औऱ मानसिक रूप से विक्षिप्त लोगों के स्वास्थ्य् में सुधार होता है।

महाराज भोज के जाने के बाद भी अध्यापन का यह कार्य 200 सालों तक निरंतर जारी रहा। मां सरस्वती का यह मंदिर पूर्व कि और मुख किए बहुमंजिला आयताकार भवन है। जो अपने वास्तु शिल्प के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। मां के अवतरण स्थल पर कई सदियों तक यज्ञ-अराधना और साधना चलती रही।
पूरे विश्व में धार की भोजशाला को सिद्ध पीठ माना जाता था। १२६९ इसवी से ही इस्लामी आक्रंताओ ने अलग अलग तरीको से योजना पूर्वक भारत वर्ष के इस अध्यात्मिक और सांस्कृतिक मान बिंदु भोजशाला पर आक्रमण किया जिसे तत्कालीन हिन्दू राजाओं ने विफल कर दिया।

सन 1305 में इस्लामी आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला पर आक्रमण किया। खिलजी ने सरस्वती प्रतिमा को खंडित कर दिया और भोजशाला के कुछ भागों को ध्वस्त कर दिया। 1200 आचार्यों की हत्या उस दौरान हुई। राजा मेदनीराय ने वनवासियों की मदद से भोजशाला की रक्षा की। इसके बाद 1902 में मेजर किनकैड भारत की अन्य अमूल्य ऐतिहासिक वस्तुओं के साथ मां सरस्वती की मूर्ति को भी अपने साथ इंग्लेंड ले गया। यह प्रतिमा आज भी लंदन के संग्रहालय में कैद है। राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा ने भी काफी कोशिशें की लेकिन इस मूर्ति को वापस नहीं लाया जा सका।

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