बुधवार को गुजरात में 2002 में दंगों के दौरान नरोदा गाम के दंगों के मामले में विशेष कोर्ट ने 67 आरोपियों को बरी कर दिया।जज ने अपने फैसले में कहा कि आरोपियों को दोषी करार देने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं। फैसले पर देशभर में बहस जरूर चल रही है, लेकिन सांप्रदायिक दंगों में आरोपियों का बरी हो जाना देश में कोई नई बात नहीं है।
2017 से 2021 के NCRB के आंकड़े बताते हैं कि सांप्रदायिक दंगों में गिरफ्तार लोगों में से सिर्फ 6% ही दोषी पाए गए। 2021 में तो ये कनविक्शन रेट सिर्फ 3% था।
इन दंगों को भड़काने यानी उकसाने वाले बयान देने वालों का कनविक्शन रेट तो और भी कम है। 5 साल में दंगे भड़काने के मामले में गिरफ्तार हुए लोगों में से सिर्फ 3% ही दोषी पाए गए।
2002 का गुजरात दंगा 21 साल बाद भी लोगों की चर्चाओं में ताजा है। जबकि सच्चाई ये है कि 2017 से 2021 के बीच एक भी साल ऐसा नहीं था जब सांप्रदायिक दंगों के 300 से कम केस दर्ज हुए हों, या 1600 से कम लोग गिरफ्तार हुए हों।
2021 में देश की अलग-अलग अदालतों में सांप्रदायिक दंगों के 5628 मामले पेंडिंग थे। ज्यादातर मामलों में दोषी इसीलिए छूट जाते हैं कि कोर्ट के सामने पर्याप्त सबूत ही नहीं पेश हो पाते।
जानिए, क्या कहते हैं देश में सांप्रदायिक दंगों के आंकड़े, क्यों गिरफ्तार किए जाने के बावजूद आरोपियों का दोष सिद्ध नहीं हो पाता…
हर साल कम से कम 300 सांप्रदायिक दंगों के केस दर्ज होते हैं…2020 में दिल्ली दंगों में ही दर्ज हुए 520 केस
आम धारणा ये है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद देश में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए हैं लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं।
2021 में ही देश में सांप्रदायिक दंगों के 378 केस दर्ज हुए थे। जबकि 2020 में तो ये केस 857 थे। इनमें दिल्ली में हुए दंगों के 520 केस शामिल हैं।
ये केस सांप्रदायिक दंगों के हैं। इसके अलावा राजनीतिक प्रदर्शनों में हुई हिंसा, किसान आंदोलन या छात्रों के उपद्रव को मिला दें तो सिर्फ 2021 में दंगों के 41954 केस दर्ज किे गए थे। इनमें करीब 1.50 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
5 साल में सबसे ज्यादा दंगे बिहार में, दिल्ली दूसरे नंबर पर…गुजरात में भी 134 दंगों के केस
2017 से 2021 के बीच सबसे ज्यादा 633 सांप्रदायिक दंगों के केस बिहार में दर्ज हुए हैं। 2021 और 2020 को छोड़ दें तो हर साल बिहार में ही सबसे ज्यादा सांप्रदायिक दंगे होते हैं।
2021 में झारखंड में सबसे ज्यादा 100 सांप्रदायिक दंगों के केस दर्ज हुए थे। जबकि 2020 में दिल्ली दंगों में सबसे ज्यादा 520 केस दर्ज हुए थे। 2020 के दंगों को छोड़ दें तो दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा के मामले कम होते हैं।
गुजरात सरकार का दावा रहा है कि 2002 के बाद से राज्य में कभी भी सांप्रदायिक हिंसा नहीं भड़की है। जबकि सच्चाई ये है कि 2017 से 2021 के बीच गुजरात में भी सांप्रदायिक हिंसा के 134 केस दर्ज हुए हैं। 2021 में भी राज्य में सांप्रदायिक दंगों के 3 केस दर्ज हुए हैं।
दंगों में गिरफ्तारियां होती हैं, मगर दोषी करार दिया जाना ही दुर्लभ
सांप्रदायिक दंगों के मामलों में हर साल पुलिस हजारों लोगों को गिरफ्तार करती है। मगर इन सभी को सजा नहीं मिलती।
2021 में ही पुलिस ने सांप्रदायिक दंगों में 1697 लोगों को गिरफ्तार किया था। इनमें से सिर्फ 54 यानी 3% को ही दोषी पाया गया। 213 तो बरी कर दिए गए। जबकि बाकी केस अदालतों या जांच में पेंडिंग हैं।
सांप्रदायिक दंगों के केस में सबसे बेहतर कनविक्शन रेट 2019 का रहा है। इस साल पुलिस ने 2331 लोगों को गिरफ्तार किया था। 2182 लोगों के खिलाफ चार्जशीट पेश की गई और 332 को दोषी पाया गया। हालांकि 1105 यानी करीब आधे आरोपी बरी भी कर दिए गए।
दंगे भड़काने वालों का छूटना तो और भी आसान…औसतन 3% को ही मिलती है सजा
2017 से 2021 के 5 साल के आंकड़े बताते हैं कि दंगों में शामिल लोगों से भी कम कनविक्शन रेट उनका होता है जो दंगे भड़काने के आरोपी होते हैं।
पुलिस ये केस दो गुटों के बीच द्वेष फैलाने के तहत दर्ज करती है। 2021 में ही ऐसे केसों में 1695 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, मगर सिर्फ 67 को ही दोषी पाया गया। 133 कोर्ट से बरी हो गए।
2017 में तो दंगे भड़काने के मामले में 1826 लोगों को गिरफ्तार किया गया, मगर सिर्फ 20 को ही दोषी पाया गया। यानी महज 1% का कनविक्शन रेट था।
अदालतों में हर साल सांप्रदायिक दंगों के 5 हजार से ज्यादा केसों की सुनवाई होती है…हर साल की पेंडेंसी भी इतनी ही
2017 में देश की अलग-अलग अदालतों में 4939 सांप्रदायिक दंगों के मामलों की सुनवाई हुई थी। इनमें से 4299 केस वो थे जो पिछले साल के पेंडिंग थे। सिर्फ 65 लोगों को दोषी पाया गया। साल खत्म होने पर पेंडिंग केसों की संख्या 4675 थी।
यानी पूरे साल में सिर्फ 264 केसों में ही अदालत ने फैसला सुनाया।
2021 में 5681 सांप्रदायिक दंगों के केस अदालतों में पहुंचे। इनमें से 5336 पिछले साल के पेंडिंग केस थे। साल खत्म होने के बाद 5628 केस पेंडिंग रह गए।
यानी पूरे साल में सिर्फ 53 केसों में अदालत ने फैसला सुनाया। इनमें भी सिर्फ 19 केसों में ही आरोपियों को दोषी पाया गया।
दंगे भड़काने के केसों का हाल तो और भी बुरा…2021 में सिर्फ 130 केसों में फैसला
दंगों भड़काने के केसों की सुनवाई का हाल भी अदालतों में बुरा है। 2021 में कुल 3588 ऐसे केसों की सुनवाई हुई। इनमें से 2877 पिछले साल के पेंडिंग केस थे।
साल खत्म होने पर कुल पेंडिंग केस 3458 रह गए। यानी पूरे साल में सिर्फ 130 मामलों में अदालत ने फैसला सुनाया। इनमें से 47 केसों में आरोपियों को दोषी पाया गया।
2017 के अंत में पेंडिंग केसों की संख्या 1435 थी, 2021 के अंत में ये पेंडेंसी बढ़कर दोगुनी से भी ज्यादा 3458 हो गई।

