दुनिया के आम जन एक हैं। साम्राज्यवादी जंग से उनका शोषण और दमन बढ़ता है। जंग को ‘ना’ कहें।
विपिन कुमार त्रिपाठी
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर, बिना किसी उकसावे के, खतरनाक युद्ध थोप दिया है। पहले ही दिन, ईरान के सुप्रीम लीडर और आध्यात्मिक गुरु आयतुल्ला अली खामेनेई, कई मंत्री, अफसर, सेना प्रमुख और स्कूली लड़कियों समेत तमाम नागरिक मारे गए हैं। यह “ताकत ही हक है” के जंगली कानून का प्रदर्शन है, राष्ट्रीय संप्रभुता और आजादी पर क्रूर हमला।
इससे क्या साबित होता है? यही कि हवाई बम और खुफिया निहत्थे या मामूली हथियार वाले लोगों को मार सकते हैं। भारी बाहुबल वाले देश कमज़ोर देश को निचोड़ सकते हैं, इराक, सीरिया, गाजा, वेनेजुएला की तरह। संसाधनों के लोभ और आधिपत्य की भूख की कोई सीमा नहीं है। मूर्ख भी यह जानता है। इसे साबित करने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति, इज़राइल के प्रधानमंत्री या उनकी सरकारों की अक्ल की ज़रूरत नहीं है।
वे अमेरिका और इज़राइल की आने वाली पीढ़ियों को मनगढ़ंत खतरों से बचाने का वादा कर रहे हैं। लेकिन उन्होंने उनकी संवेदना का दम घोंटकर उन्हें पहले ही मुर्दा बना दिया है। संवेदना के बिना कोई जीवन नहीं है। और न्यूनतम संवेदना यह हैः सभी इंसानी ज़िंदगी एक है। अमेरिकी या ईरानी, फ़िलिस्तीनी या यहूदी, हिंदू या मुसलमान में कोई फर्क नहीं है।
एक बात तय है। बेलगाम अथारिटी (अधिनायकशाही) विनाशकारी होती है। और यह आती है संगठित नफ़रत (उग्र राष्ट्रवाद / नस्ली जुनून) और आर्थिक शोषण से। 1960 के दशक में अमेरिकी लोगों ने अहिंसा की ताकत दिखाई और सरकार को नागरिक अधिकारों के लिए मजबूर किया। वे वियतनाम पर युद्ध के ख़िलाफ़ उठे, हालांकि देर से। उन्हें अपनी संवेदना फिर से जगानी है और सरकार को कत्लेआम से रोकना है। साथ ही अधिनायकशाही को रोकने का ढाँचा भी बनाना है।
हम, भारत के अमन चाहने वाले लोग, क्या कर सकते हैं?
जुल्म का निशाना बनाए गए देश और लोगों का दर्द महसूस करें। हमलावर मुल्कों को ‘ना’ कहें और जंग के षडयंत्र के बारे में आवाम को जागृत करें, खास कर युवाओं को। हम अपनी सरकार को कहें कि हमारी ‘ना’ को अमेरिका और इज़राइल की सरकारों तक पहुंचाएं। अहिंसक प्रतिरोध भी कर सकते हैं (कई प्रदर्शन हो भी रहे हैं)। प्रधानमंत्री, सांसद और विधायक को खत लिख सकते हैं।
यह युद्ध 1953 की खौफनाक वापसी है, जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने ईरान में तख्तापलट किया, प्रधानमंत्री मोसद्दग की चुनी हुई सरकार को उखाड़ कर, कठपुतली मोहम्मद रजा पहलवी को ईरान का शाह बनाया और तेल पर कब्जा कर लिया। इसी के साथ शुरू हुआ विकासशील देशों पर नव-साम्राज्यवादी तबाही (तख्ता पलट और भीषण युद्ध) का दौर, ग्वाटेमाला, कांगो, ब्राज़ील, चिली, इंडोनेशिया से वियतनाम और कंबोडिया तक। भारत बच गया, हालांकि अमेरिका ने 1971 में अपना सातवां जहाजी बेड़ा भेजा था। लेकिन भारत ने 190 साल विनाशकारी साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासन झेला जिसमें भीषण शोषण के कारण अकालों में 3 करोड़ लोग मारे गए।
अमेरिका की मौजूदा कार्रवाइया (वेनेजुएला में वहां के राष्ट्रपति का अपहरण और सत्ता व तेल पर कब्ज़ा तथा ईरान पर जंग), विकासशील देशों की संप्रभुता और आज़ादी के लिए गंभीर खतरा हैं। तेल वाले देश पहले ही गिरफ्त में हैं। उनका और दम घोंटा जाएगा। भारत समेत हर देश पर हमले का खतरा है, जब भी उसकी सरकार साम्राज्यवादी हुक्म मानने से मना करेगी। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और संस्थाएं टूट रही हैं।
सत्य और अहिंसा की ताकत अलबत्ता किसी भी दमनकारी शक्ति से ज़्यादा ताकतवर है। हम जंग का महिमा मंडन बंद करें, जंगखोर बेअसर हो जाएंगे। युद्ध और कब्ज़े का बड़े पैमाने पर विरोध और असहयोग हो।
बेहतर है, वैज्ञानिक, प्रोफेसर, इंजीनियर जिन्होंने बड़ी ताकतों की इंडस्ट्रियल और मिलिट्री ताकत बढ़ाने में मदद की है, वे आवाज़ उठाएँ और इंसानियत के बुनियादी उसूल को ज़िदा करें: अगर आपके काम, या आपके द्वारा बनाए गए हथियार और मशीनें, दूसरों को बर्बाद करते हैं, तो ऐसे कामों को तौबा करें, उनसे बचें, उनके गलत इस्तेमाल को ‘ना’ कहें।
अवाम
मेरी आँखों में अंजन अंजवा दो, मेरे आगे से परदे हटवा दो मुझे अपनों से मिलने जाना है, मेरे पैरों से बंधन खुलवा दो।
मगर वो जुल्मतों का दौर फिर से आया है, सितमगरों ने नए ढंग से सितम ढाया है तेलवालों से ये कहते हैं आज़ादी लेलो, अपने घर लूट लो ये हमसे नसीहत लेलो फिर तो ये रौंदते हैं हर चराग रोशन को, ज़रें-ज़रें को, हुकूमत को, बाग रोशन को तेल के साथ ये सत्ता भी हड़प लेते हैं, खेत खलिहान औ बाज़ार हड़प लेते हैं हौसला करके ये हालात बदलना होगा, सच पे टिकना व असहयोग भी करना होगा फिर से आज़ादी का पैगाम फूकना होगा, गरीब देशों को मिल जुल के जूझना होगा ये वक़्त सभी पर भारी है, वो सारे तफ़रके मिटवा दो। मेरी आँखों में…
विपिन कुमार त्रिपाठी
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