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संकट में गांधी सागर:स्पिलवे के नीचे गहरे गड्‌ढो से कमजोर हुआ बांध, 30 लाख की आबादी को खतरा

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भोपाल

मंदसौर जिले में चंबल नदी पर बना गांधी सागर बांध और उससे करीब से जुड़ी 30 से 40 लाख की आबादी पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। दरअसल, बांध की डाउन स्ट्रीम में स्पिलवे के ठीक नीचे(जलबहाव क्षेत्र) में गहरे गड्‌ढे हो गए हैं और स्पिलवे (उत्प्लव मार्ग) भी डैमेज हो गया है। यदि बांध की जल्द से जल्द मरम्मत नहीं कराई गई तो इसका टूटना तय है और इससे डाउन स्ट्रीम में रहने वाली राजस्थान और मध्यप्रदेश के 7 जिलों की 30 से 40 लाख की आबादी का सबकुछ बर्बाद हो जाएगा।

डैम के नीचे मौजूद राणा प्रताप सागर और कोटा बैराज समेत रावतभाटा न्यूक्लियर पावर प्लांट पर भी खतरा मंडरा रहा है। बांध के टूटने या ओवरॉटॉपिंग (शिखर से ऊपर बहना) से विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं। यह चेतावनी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की हाल ही में जारी रिपोर्ट में मिली है। इसके मुताबिक यह बांध 1960 में बना था।

बांध की मरम्मत और सुधार को लेकर बांध सुरक्षा निरीक्षण पैनल (डीएसआईपी) और केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) की सिफारिशें पिछले 12 साल से मध्यप्रदेश, राजस्थान और भारत सरकार के विभागों में धूल खा रही हैं। 2019 में आई बाढ़ में बांध टूटते-टूटते बच गया था।

बांध से रिसाव, पिचिंग की गड़बड़ी, लिफ्टों का काम न करना जैसी कई खामियां

रिपोर्ट के मुताबिक डीएसआईपी ने पिछले कुछ सालों में प्रदेश के छह बांधों का निरीक्षण किया था और इनमें बड़ी कमियां पाईं थी, जैसे अपर्याप्त स्पिलवे क्षमता, जलनिकासी क्षिद्रों का भरना, स्लूईस द्वारों और बांध से रिसाव, पिचिंग की गड़बड़ी, लिफ्टों का काम न करना। इन बांधों में बाणसागर, गांधी सागर, हरसी, महान, तवा और तिघरा बांध शामिल थे। इनमें से गांधी सागर बांध को लेखा परीक्षा ने केस स्टडी के रूप में चुना और इस पर विस्तृत ब्योरा रिपोर्ट में दिया है।

डिस्चार्ज साइट का ठीक डेटा नहीं मिलता

बाढ़ का पूर्वानुमान 13 रिपोर्टिंग स्टेशनों पर बारिश के आंकड़ों से लगाया जाता था। कुशल कर्मचारियों के अभाव में डिस्चार्ज साइट का डेटा ठीक से नहीं रखा जाता था, इस कारण बारिश और बहाव के बीच कोई सामंजस्य विकसित नहीं किया जा सका। इसलिए बांध पर तुरंत एक कंप्यूटर सेंटर स्थापित कर मौसम विभाग के डेटा सेंटर से जोड़कर बाढ़, बारिश और चक्रवात के पूर्वानुमान के लिए सॉफ्टवेयर विकसित करने की सिफारिश की गई। दो राज्यों में खतरा

स्पिलवे आखिर है क्या?

स्पिलवे एक ऐसी संरचना होती है जो बांध से डाउनस्ट्रीम एरिया में अतिरिक्त पानी के प्रवाह को नियंत्रित करती है। स्पिलवे से यह सुनिश्चित किया जाता है कि पानी का अतिप्रवाह न हो और पानी का प्रवाह बांध को नुकसान नहीं पहुंचा पाए।

दो बार टूटने के कगार पर आ चुका था बांध : कैग

एक्सपर्ट व्यू – स्पिलवे निर्माण की पहल मप्र करे

यहां अतिरिक्त स्पिलवे बनाना होगा। इसका फैसला सिर्फ सेंट्रल वाटर कमीशन ही ले सकता है। लेकिन इसके निर्माण की पहल मध्यप्रदेश को करनी होगी। 2019 में बाढ़ की जो स्थिति बनी थी, उसके बाद फिर से बांध के सर्वे की जरूरत है, क्योंकि पानी छोड़ने की क्षमता बढ़ाते हैं तो कोटा शहर पर पड़ने वाले प्रभाव का भी ध्यान रखना पड़ेगा।

सरकार भी टेंशन में- बांध की स्थिति जानने टीम भेजेंगे

कैग की रिपोर्ट को देखते हुए अफसरों की एक बैठक बुलाने जा रहे हैं। इसके बाद जल्द ही डैम की वस्तुस्थिति के आकलन के लिए एक तकनीकी टीम भी भेजेंगे। – तुलसी सिलावट, जलसंसाधन मंत्री मप्र

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