भारत विश्व की सबसे बड़ी डेटा अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। 1.4 अरब से अधिक लोगों का डिजिटल डेटा—आधार, यूपीआई, डिजिटल हेल्थ, ई-गवर्नेंस, एआई के लिए एक विशाल संसाधन है।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को 21वीं सदी का नया इंजन कहा जा रहा है। भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। यूनियन बजट में 2047 तक विदेशी क्लाउड सेवा प्रदाताओं को टैक्स हॉलिडे, राज्यों द्वारा हजारों करोड़ के एमओयू, और अरबों डॉलर के निवेश—संदेश साफ है: भारत “डेटा की राजधानी” बनना चाहता है। इस सन्दर्भ में प्रधानमंत्री मोदी भी बड़ी -बड़ी बातें कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है है कि आने वाला समय एआई का ही है और भारत एआई का गढ़ बन सकता है।
मोदी को यह भी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में भारत में दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां अपना डेटा सेंटर खोलेगी और बड़े स्तर पर युवाओं को रोजगार मिलेगा। भारत का नाम रौशन होगा और फिर भारत विश्व गुरु बनकर ही रहेगा।
लेकिन यह एआई के नाम पर देश को मैसेज देने का एक पहलू हो सकता है। भाजपा के लिए एक चुनावी नैरेटिव। अगले चुनाव तक लोगों को छलने का बड़ा खेल। क्योंकि जिस भारत को डेटा सेंटर बनाने की दुदुम्भी बजाती जा रही है उस भारत की असली कहानी तो यही है कि यहाँ पानी का भारी अकाल है। लोग पानी के लिए तरसते हैं और गर्मी के दिनों में पानी की लड़ाई खून खराबे तक पहुँच जाती है।
और यह सब केवल दिल्ली तक नहीं। देश के बाकी सभी मेट्रो शहरों का यही हाल है। खासकर दक्षिण भारत की कहानी तो और भी ख़राब है।
एआई की इस दौड़ में भारत बड़ा डेटा सेंटर का दांव तो खेल रहा है लेकिन बड़े-बड़े डेटा सेंटर को चलाने के लिए पानी कहाँ से आएगा? यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है। वही पानी जिसे पीकर हम प्यास बुझाते हैं। याद रहे भारत पिछले कुछ सालों से पानी की गंभीर समस्या से जूझ रहा है।
दक्षिण भारत जहाँ अभी एआई सेंटर सबसे ज्यादा है वहां पानी की गंभीर समस्या है और नोएडा से लेकर दिल्ली और गुरुग्राम की कहानी तो सब जानते हैं। जहाँ पानी के लिए गर्मी के दिनों छोड़ भी दीजिये तो आये दिन भी लोग पानी-पानी होते रहते हैं। ऐसे में सवाल है है कि भारत अगर डेटा सेंटर का हब बना तो पानी कहाँ से आएगा?
कोई कह सकता है कि आखिर एआई के लिए पानी क्यों ? बता दें कि क्लाउड असल में बादल नहीं, बल्कि विशाल सर्वर-भवन होता हैं। जब हम वीडियो स्ट्रीम करते हैं या चैटजीपीटी पर प्रश्न पूछते हैं, तो सर्वर गर्म होते हैं। उन्हें ठंडा रखने के लिए बड़े पैमाने पर कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है।यूसी रिवरसाइड के 2023 अध्ययन के अनुसार, चैटजीपीटी के 20–30 प्रॉम्प्ट पर लगभग 500 मिलीलीटर पानी की खपत होती है। एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर रोज 11–12 लाख लीटर पानी इस्तेमाल कर सकता है
आईआईटी खड़गपुर के भूजल विशेषज्ञ प्रो. अभिजीत मुखर्जी चेतावनी देते हैं कि “दक्षिण भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, क्योंकि वहां भूजल की उपलब्धता अपेक्षाकृत कम है।”भारत के अधिकांश शहर पहले ही जल-अभाव से जूझ रहे हैं। बेंगलुरु का पानी कावेरी से 100 किमी दूर से पंप कर लाया जाता है—ऊर्जा और लागत दोनों के लिहाज से भारी प्रक्रिया। लेकिन इस डिजिटल महत्वाकांक्षा की एक भौतिक सच्चाई है—पानी।
और यह वही देश है जहां बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और दिल्ली जैसे महानगर हर साल जल-संकट की खबरों में रहते हैं।
पानी की बात तो बाद में भी की जा सकती है। अभी कांग्रेस ने जो सवाल खड़े किये हैं उन पर गौर करने की बात है। कह सकते हैं कि कांग्रेस का एआई से जुड़ा सवाल राजनीतिक विवाद के लिए काफी है और संभव है कि संसद के अगले सत्र में इस पर भारी हंगामा हो सकता है। मोदी सरकार पहले से ही कई मसलों को लेकर विपक्ष के निशाने पर है और स्पीकर से लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर भी विपक्ष हमलावर है। ऐसे में यह नया एआई विवाद मोदी सरकार को और भी मुश्किल में डाल सकता है।
कांग्रेस ने पीएम मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि अमेरिकी व्हाइट हाउस के एआई सलाहकार श्रीराम कृष्णन के बयान पर सरकार की चुप्पी राजनीतिक कमजोरी को दर्शाती है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने ट्वीट करके कहा है कि मोदी सरकार भारत की तकनीकी सम्प्रभुता से समझौता कर रही है।
दरअसल इस विवाद की जड़ में श्रीराम कृष्णन का वह बयान है जिसमे कहा गया है कि ”अमेरिका चाहता है कि सहयोगी देश -भारत समेत -अमेरिका एआई इंफ्रास्ट्रक्चर और मॉडल का उपयोग करें।” कांग्रेस को इसी बात पर ऐतराज है। कांग्रेस का तर्क है कि अगर भारत अपने डेटा और डिजिटल संसाधनों को विदेशी एआई कंपनियों के लिए उपलब्ध कराता है तो वह डेटा कॉलोनी बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
कांग्रेस का डर चाहे जो भी हो लेकिन इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि अभी अमेरिका भारत के साथ बहुत कुछ करने को तैयार है और यह सब ट्रेड डील और एपस्टीन फाइल को लेकर कुछ भी संभव है। पवन खेड़ा ने कहा है कि श्रीराम कृष्णन ने खुले तौर पर एआई इकोसिस्टम में पपेट स्टेट की तरह पेश करने की बात की है और मोदी सरकार ने न तो भारत की तकनीक का बचाव किया और न ही दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों पर स्पष्ट रुख ही अपनाया।
राहुल गांधी पहले ही लोकसभा में चेतावनी दे चुके हैं कि यदि डेटा और डिजिटल ट्रेड पर सख्त बातचीत नहीं हुई तो भारत “डेटा कॉलोनी” बन सकता है। आगे खेड़ा ने सरकार पर व्यापक कूटनीतिक निर्भरता का आरोप लगाते हुए कहा कि सीजफायर से लेकर ट्रेड डील, एनर्जी और अब एआई तक भारत को अमेरिका का क्लाइंट स्टेट बनाया जा रहा है।
यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़े रणनीतिक सवाल को छूता है। क्या भारत को अपना एआई स्टैक और मॉडल स्वतंत्र रूप से विकसित करना चाहिए? या फिर वैश्विक साझेदारी के तहत अमेरिकी टेक्नोलॉजी का उपयोग व्यावहारिक और लाभकारी है?
सरकार का आधिकारिक रुख अभी तक इस बयान पर सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। हालांकि, भारत सरकार “सॉवरेन एआई” की अवधारणा पर जोर देती रही है, जिसमें डेटा लोकलाइजेशन, घरेलू कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और भारतीय भाषाओं के लिए एआई मॉडल विकसित करने की बात शामिल है।
गौरतलब है कि भारत विश्व की सबसे बड़ी डेटा अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। 1.4 अरब से अधिक लोगों का डिजिटल डेटा—आधार, यूपीआई, डिजिटल हेल्थ, ई-गवर्नेंस, एआई के लिए एक विशाल संसाधन है।अगर यह डेटा विदेशी क्लाउड और एआई स्टैक्स पर निर्भर हो जाता है, तो डेटा सुरक्षा, एल्गोरिदमिक नियंत्रण, आर्थिक मूल्य सृजन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे नीति-निर्माताओं के लिए अहम हो जाते हैं।
दूसरी ओर, एआई के विकास में अत्याधुनिक चिप्स, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च में भारी निवेश की जरूरत है, जहां अमेरिका फिलहाल अग्रणी है। ऐसे में रणनीतिक साझेदारी को कुछ विशेषज्ञ व्यवहारिक विकल्प मानते हैं।

