इंडियन ऑयल मजदूर हड़ताल पर क्यों
इंडियन ऑयल देश की महारत्न कंपनी है। लाखों करोड़ की मार्केट वैल्यू वाली कंपनी के पानीपत प्लांट में दो दिन से मजदूर हड़ताल पर हैं। CISF द्वारा लाठीचार्ज और गोली चलाने की खबर मिल रही है।
मजदूर हड़ताल पर क्यों है?
- लार्सन एंड टर्बो नाम की देश की सबसे बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी के ठेके में कार्यरत तीन मजदूर गिर गए, जिसमें से दो की मौत और तीसरे के बारे में प्रशासन अस्पताल में इलाज की बात कर रहा है पर वह मजदूर कहां किस हाल में है के बारे में कुछ नहीं बता रहा।
यह ट्रिगर प्वाइंट है इस हड़ताल का, क्योंकि मजदूर मांग कर रहे हैं कि मृतक के परिवार को उचित मुआवजा दिया जाए।
इसके साथ ही मजदूर काफी समय से जो समस्या झेल रहे थे वह भी मुखर हो गई है।
एक) काम के घंटे 8 फिर से किया जाए जिसे 12 घंटा कर दिया गया है। पहले चार घंटे ओवरटाइम करने पर दुगुनी मजदूरी मिला करती थी लेकिन अब नहीं मिलती।
दूसरा) मजदूरी समय पर नहीं मिल रही। हर महीने 7 तारीख तक मजदूरी मिले।
तीसरा) प्रोविडेंड फंड नहीं जमा किया जा रहा और न ही काटा जा रहा है।
चौथा) ट्रेड यूनियन के अधिकार से इंडियन ऑयल और लार्सेन एंड टर्बो के मजदूर वंचित हैं।
और भी कई शिकायतें होंगी।
बड़ा सवाल यह है कि ये दोनों कंपनी देश की दिग्गज कंपनी हैं। इनके मुनाफे हजारों करोड़ प्रति वर्ष के हैं।
इंडियन ऑयल तो भारत सरकार को डिविडेंड के तौर पर हर साल हजारों करोड़ रुपए का चेक दिया करती है। अपने शेयर होल्डर्स को लाभांश, बोनस और दशकों के दौरान लखपति से करोड़पति बना चुकी हैं।
फिर इन्हें गरीब देशवासियों, जो आपके लिए मजदूरी कर मुनाफा कमाने का काम करते हैं, को बेसिक राइट से मरहूम क्यों कर रही हैं? समय पर मजदूरी और श्रमिक कल्याण तथा पीएफ क्यों जमा नहीं कर रही हैं??
अगर IOCL और L&T का यह हाल है तो जो 1000-2000 करोड़ रुपए की कंपनियां हैं, वहां क्या हाल होगा?
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को अगर आप बड़ा मुद्दा नहीं बनाते तो आपके यहां होने का क्या फायदा?? आपके लिए फिर कोई क्यों आवाज उठाए?
अभी भी नहीं लगता कि दोनों कंपनी और सरकार इन ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की मांगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेंगे। उल्टा इसे दबाने के लिए दमनात्मक कार्यवाही की तैयारी जोर शोर पर चल रही होगी क्योंकि इस सरकार में हड़ताल और अपने हक की बात करने का मतलब विदेशी निवेशकों की भगदड़ को बढ़ाना यानि देश विरोधी कृत्य को अंजाम देना हुआ। चुपचाप शोषण सहो और अगर दुर्घटना में कोई मर मरा जाए तो उसे भूल अपने काम पर फोकस रखो।
ये लोकतंत्र है या कंसंट्रेशन कैंप? जरा गौर से अपने हालात पर गौर करें आप पाएंगे कि कहीं न कहीं आपको भी उपभोक्तावाद के लपेटे में लेकर मुंह सीकर जीने का रास्ता दिखा दिया गया है।
Ravindra Patwal की वॉल से

