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इंदौर सफाई में नंबर-1, तो सुरक्षा और यातायात अराजक क्यों? 

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इंदौर स्वच्छता में नंबर वन शहर के आम लोग बाकी सिस्टम ध्वस्त होने से त्रस्त हो गए हैं। समस्याओं का अंबार है, तमाम हेल्पलाइन में शिकायतें लंबित हैं, लेकिन सुधार की उम्मीद नजर नहीं आ रही। लोगों की सुरक्षा का मामला हो या फिर ट्रैफिक व्यवस्था का, या फिर स्वच्छ जल वितरण का, कोई व्यवस्था ही नहीं है। नाकारा साबित होते सिस्टम के जिम्मेेदार जनता की समस्या सुनने तक को तैयार नहीं हैं।
शहर इनसे सबसे ज्यादा परेशान
सुरक्षा: लोगों को सुरक्षा का विश्वास दिलाने के लिए कमिश्नर सिस्टम लागू किया, लेकिन दो साल बाद भी यह विश्वास कायम नहीं हो पाया है। कनाडि़या, बाणगंगा और फिर कनाडि़या में हुई लूट-डकैती ने सभी की नींद उड़ा दी है। बाहरी इलाकों की टाउनशिप के वाट्सऐप ग्रुपों पर वारदातों की जानकारी प्रसारित कर लोगों को अपनी सुरक्षा खुद करने को कहा जा रहा है। कनाडि़या के लोग तो पुलिस पर विश्वास करने के बजाए खुद हाथ में लाठी लेकर गश्त कर रहे हैं।
टॉपिक एक्सपर्ट: एसकेएस तोमर, रिटायर्ड पुलिस अधिकारी पुलिस अफसर बेसिक पुलिसिंग से दूर होकर संसाधन पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं। पुलिस को जनता के बीच जाकर उनसे संवाद स्थापित करने की जरूरत है। जब तक लोगों के बीच नहीं जाएंगे तब तक लोग पुलिस पर विश्वास नहीं करेंगे। पुलिस अफसरों को मैदानी संपर्क बढ़ाना होगा। पहले संसाधन कम थे, लेकिन संवाद होने से हर सूचना समय पर मिल जाती थी। जूनियर में सीनियर का डर भी नहीं रह गया है, जिससे लोगों की समस्याएं नहीं सुनी जाती हैं।
ट्रैफिक: शहर की सड़कों से ट्रैफिक पुलिस गायब है और अफसर जूम मीटिंग में व्यस्त हैं। लोगों से किसी तरह का संवाद ही नहीं है। नतीजा मुख्य सड़क व लगभग हर चौराहे पर वाहन उलझे हैं। अफसर, जनप्रतिनिधि बैठक कर व्यवस्था का दावा कर रहे हैं, लेकिन सड़क पर अव्यवस्था ही अव्यवस्था है। ट्रैफिक सुधारने का दावा करने वाली पुलिस चालान बनाने में व्यस्त है और आम लोग परेशान हो रहे हैं।
टॉपिक एक्सपर्ट: संदीप नारुलकर, ट्रैफिक एक्सपर्ट, प्रोफेसर एसजीएसआइटीएस ट्रैफिक सुधार के लिए सूक्ष्म प्लानिंग बनाकर काम करने की जरूरत है। नए-नए प्रयोग किए जाते हैं, जिसका फायदा नहीं होता है। ट्रैफिक का दबाव कम करने के लिए मुख्य सड़कों को अतिक्रमण मुक्त बनाना होगा। पुलिस व नगर निगम के ट्रैफिक इंजीनियर कंसल्टेंट की सेवाएं लेकर प्लानिंग के अनुसार काम करना होगा।
स्वच्छ जल: शहर नर्मदा के चौथे चरण की तैयारी कर रहा है। तीन चरणों में करीब 650 एमएलडी पाने लाने का दावा है। स्थिति यह है कि शहर की 30 से 40 प्रतिशत कॉलोनियों में नर्मदा का पानी पहुंच नहीं रहा है। जहां नर्मदा लाइन है, वहां भी गंदा-मटमैला पानी आ रहा है। पॉश कॉलोनी स्कीम नं. 54, 74, अनुराग नगर, विजय नगर, नंदा नगर आदि क्षेत्रों में स्वच्छ पानी का संकट है। शिकायतों के बाद भी जिम्मेदार ध्यान नहीं दे रहे हैं। स्थिति यह है कि ऑफिस, दुकानों के बाद अब घरों मेें भी चिल्ड वाटर की कैन बुलाई जा रही है।
टॉपिक एक्सपर्ट:सुधींद्रमोहन शर्मा, जल प्रबंधन विशेषज्ञ
शहर में नर्मदा का पानी पर्याप्त है, लेकिन उसके वितरण की व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। नगर निगम के पास पाइप लाइनों की जानकारी ही नहीं है। एक अलग सेल बनाकर पहले पाइप लाइनों की मैपिंग कर सुधार के लिए लाॅन्ग टर्म प्लानिंग करनी होगी। पाइप लाइनों की मैपिंग से पता चलेगा कि कहां-कितनी पुरानी पाइप लाइन है, कितनी ड्रेनेज लाइन से मिक्स है। इसके बाद नई पाइप लाइन डालनी होगी। अभी जानकारी नहीं होने से हर जगह कई पाइप लाइन डाल दी जाती है, जिससे पानी बर्बाद होता है।

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